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SCO Summit 2025: Shanghai Cooperation Organisation Kya Hai | SCO Summit News| मोदी पुतिन शी मुलाकात भारत रूस चीन रिश्तों और पाकिस्तान पर असर

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SCO Summit 2025: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से शंघाई सहयोग संगठन (SCO) की समिट में मुलाकात करने वाले हैं. यह मुलाकात क्यों इतनी अहम है, इसे समझने के लिए सबसे पहले ये जानना जरूरी है कि आखिर यह SCO संगठन है क्या, इसकी नींव कैसे पड़ी और आज के हालात में भारत के लिए इसकी अहमियत क्या है.

SCO की शुरुआत कैसे हुई?

SCO यानी शंघाई को-ऑपरेशन ऑर्गेनाइजेशन. नाम से साफ है कि यह संगठन चीन के शहर शंघाई से जुड़ा है. दरअसल, 1991 में सोवियत संघ के टूटने के बाद जब 15 नए देश बने, तो मध्य एशिया में कजाखस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान, उजबेकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान जैसे नए मुस्लिम बहुल राष्ट्र अस्तित्व में आए. इनमें से तीन देशों की सीमाएं सीधे चीन से जुड़ी थीं.

उस दौर में रूस कमजोर हो चुका था और चीन उतनी बड़ी ताकत नहीं बना था, जितना आज है. रूस और चीन दोनों को खतरा था कि अमेरिका इन नए देशों को अपने पाले में ले सकता है. पहले से ही अमेरिका यूरोप के साथ मिलकर NATO जैसा सैन्य संगठन चला रहा था. उन्हें डर था कि कहीं अमेरिका या यूरोपीय संघ इन देशों में अपनी पकड़ न बना लें. साथ ही, यह भी आशंका थी कि इस्लामी कट्टरवाद और अल-कायदा जैसे आतंकी संगठन यहां पैर जमा सकते हैं.

इसी खतरे को देखते हुए 1996 में चीन और रूस ने शंघाई में कजाखस्तान, किर्गिस्तान और ताजिकिस्तान को बुलाकर एक बैठक की. इसमें तय हुआ कि क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने, व्यापारिक सहयोग बढ़ाने और आतंकवाद रोकने के लिए आपसी सहयोग किया जाएगा. इसे ही ‘शंघाई फाइव’ कहा गया. बाद में उजबेकिस्तान भी जुड़ा और 2001 में इन छह देशों ने मिलकर SCO की स्थापना की.

सदस्य देश कौन-कौन हैं?

आज SCO के कुल 10 सदस्य देश हैं- रूस, चीन, कजाखस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान, उजबेकिस्तान, भारत, पाकिस्तान, ईरान और बेलारूस. भारत 2017 में इसका हिस्सा बना. शुरुआत में तुर्कमेनिस्तान को भी शामिल करने की कोशिश हुई थी, लेकिन उसने किसी भी समूह में शामिल न होकर सबके साथ स्वतंत्र रिश्ते बनाए रखने का फैसला किया.

संगठन का मकसद

SCO मूल रूप से कोई सैन्य गठबंधन नहीं है. इसका प्रमुख उद्देश्य मध्य एशिया में कट्टरवाद और आतंकवाद को फैलने से रोकना, क्षेत्रीय सुरक्षा बनाए रखना और सदस्य देशों के बीच आर्थिक व रणनीतिक सहयोग को मजबूत करना है. यही वजह है कि SCO को रूस और चीन का साझा मोर्चा भी कहा जाता है.

भारत के लिए SCO क्यों अहम?

  • भारत के लिए इस संगठन की अहमियत कई वजहों से है.
  • पहला, भारत इस मंच का इस्तेमाल आतंकवाद के मुद्दे पर पाकिस्तान को बेनकाब करने के लिए करता है.
    दूसरा, रूस भारत का पारंपरिक साझेदार है और SCO भारत-रूस रिश्तों को मजबूत करने का एक अवसर देता है.
  • तीसरा, चीन के साथ भारत के संबंध जटिल हैं. लेकिन इस मंच पर दोनों देश आमने-सामने बैठकर क्षेत्रीय और वैश्विक मसलों पर बातचीत कर सकते हैं.
  • चौथा, अमेरिका और चीन के बीच बढ़ती ट्रेड वॉर में SCO भारत को एक रणनीतिक संतुलन बनाने का मौका देता है.

पाकिस्तान की मुश्किल

अब सवाल उठता है कि अगर यह संगठन आतंकवाद के खिलाफ है, तो इसमें पाकिस्तान की जगह क्यों है? यही सबसे बड़ा विरोधाभास भी है. पाकिस्तान की आतंकी गतिविधियों को SCO के मंच पर भारत बार-बार उठाता है. इस वजह से भारत के लिए SCO छोड़ना विकल्प नहीं है, क्योंकि ऐसा करने पर पाकिस्तान को खुला मैदान मिल जाएगा.

पाकिस्तान ने हाल के वर्षों में अमेरिका से नजदीकियां बढ़ाई हैं. SCO के अन्य सदस्य देश इसे ध्यान से देख रहे हैं. रूस और ईरान जैसे देशों की मौजूदगी के बीच पाकिस्तान की पोजिशन कमजोर पड़ रही है.

सौ बात की एक बात

सीधी भाषा में कहें तो शंघाई सहयोग संगठन वह बड़ा खेल है, जहां भारत को हर हाल में मौजूद रहना है. यह संगठन भारत को आतंकवाद के मुद्दे पर पाकिस्तान को घेरने का मौका देता है, रूस और चीन जैसे देशों के साथ रणनीतिक संतुलन बनाने का मौका देता है और बदलते वैश्विक व्यापारिक समीकरणों में भारत की भूमिका को और मजबूत करता है.

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