इस रेफरेंस में सुप्रीम कोर्ट के अप्रैल के उस फैसले पर सवाल उठाया गया है जिसमें राष्ट्रपति और राज्यपाल द्वारा विधेयकों पर निर्णय लेने के लिए 90 दिनों की समय-सीमा निर्धारित की गई थी. बार एंड बेंच में प्रकाशित खबर के मुताबिक, सीजेआई ने सुनवाई के दौरान कहा, “हम इस आधार पर मामले का फैसला नहीं करने जा रहे हैं कि कौन सी राजनीतिक व्यवस्था सत्ता में है या थी.”
सिंघवी ने कहा, “मेरे पास तमिलनाडु और केरल का एक चार्ट है…” इस स्तर पर, सॉलिसिटर जनरल मेहता ने गुण-दोष के आधार पर प्रस्तुतीकरण का विरोध किया और कहा कि उनके पास अन्य राज्यों के चार्ट हैं. उन्होंने कहा, “अगर वह गंदा रास्ता अपनाना चाहते हैं, तो मुझे कोई दिक्कत नहीं है. मैं उस रास्ते पर भी चलने को तैयार हूं, लेकिन यह ज़रूरी नहीं है. यह राष्ट्रपति का रेफरेंस है.” इसके जवाब में सिंघवी ने कहा, ‘मेहता, धमकियां काम नहीं आतीं.”
शीर्ष अदालत ने कहा कि यद्यपि अनुच्छेद 200 कोई समय सीमा निर्दिष्ट नहीं करता है, फिर भी इसकी व्याख्या इस प्रकार नहीं की जा सकती कि राज्यपाल राज्य विधानमंडल द्वारा पारित विधेयकों पर कार्य करने में अनिश्चितकालीन विलंब कर सकें. अनुच्छेद 201 के तहत राष्ट्रपति की शक्तियों के संबंध में, न्यायालय ने कहा कि उनका निर्णय लेना न्यायिक जांच से परे नहीं है और तीन महीने के भीतर होना चाहिए.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि यदि उस अवधि से अधिक कोई विलंब होता है, तो कारण दर्ज किए जाने चाहिए और संबंधित राज्य को सूचित किया जाना चाहिए. इस निर्णय के बाद, राष्ट्रपति ने अनुच्छेद 200 और 201 की निर्णय द्वारा की गई व्याख्या पर चिंता जताते हुए सर्वोच्च न्यायालय को चौदह प्रश्न भेजे.





