फरीद जकारिया ने ‘वॉशिंगटन पोस्ट’ में लिखा कि भारत के लिए डोनाल्ड ट्रंप के रुख में अचानक आए बदलाव से अमेरिका को नुकसान के सिवाए कुछ हासिल नहीं होगा. उन्होंने अपने लेख में कहा, “शीत युद्ध के बाद, अमेरिका ने भारत के प्रति लगातार संपर्क बढ़ाने की नीति अपनाई. वर्ष 2000 में राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की सफल भारत यात्रा ने एक गर्मजोशी भरे नए संबंध की संभावना खोली. हालांकि निर्णायक बदलाव राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश के कार्यकाल में आया. उनके प्रशासन ने यह मान्यता दी कि उभरता हुआ चीन अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को बदल रहा है और चीन के लिए सबसे महत्वपूर्ण संतुलन भारत हो सकता है… तब दुनिया का दूसरा सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश, जो अपनी अर्थव्यवस्था में सुधार और वैश्विक एकीकरण की दिशा में कदम बढ़ा रहा था. वॉशिंगटन और नई दिल्ली के बीच करीबी रिश्ते एशिया में चीनी प्रभुत्व को रोकने और क्षेत्र में अमेरिकी हितों की रक्षा करने की कुंजी थे.”
लेख में कहा गया है, “इसके बाद वॉशिंगटन और नई दिल्ली कई क्षेत्रों में करीब आते गए. ओबामा प्रशासन ने, एशिया में अमेरिका की ‘पिवट’ नीति के तहत, भारत को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बनाने के प्रयास का समर्थन किया और दोनों अर्थव्यवस्थाओं के बीच व्यापार को काफी बढ़ाया. पहले ट्रंप प्रशासन ने राजनीतिक रूप से और आगे बढ़कर ‘क्वाड’ (अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, जापान और भारत का एक रक्षा-उन्मुख समूह) को नई मजबूती दी. ट्रंप को भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ अपने व्यक्तिगत संबंधों पर भी गर्व था.”
एक बड़े, विविधतापूर्ण और जटिल लोकतंत्र के रूप में, भारत के पास हमेशा घरेलू हित रहे हैं जिन्हें उसके नेता अनदेखा नहीं कर सकते. इसके बावजूद, वॉशिंगटन भारत को धीरे-धीरे अपने करीब लाने में सफल रहा, ताकि दोनों देशों के हित और कार्रवाइयां अधिक मेल खाएं. लेकिन अब ट्रंप 2.0 के आगमन के साथ, अमेरिकी राजनयिकों की दशकों की मेहनत एक झटके में उलट गई है. उन्होंने भारत को अमेरिकी टैरिफ की सबसे ऊंची श्रेणी में डाल दिया है – जो अब 50% है – और इसमें सीरिया और म्यांमार जैसे देश शामिल हैं.
ट्रंप ने भारत की अर्थव्यवस्था को ‘मरी हुई’ कहा, जबकि पिछले कई वर्षों से भारत दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था रहा है और अब यह चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है. (2028 तक इसके जर्मनी को पीछे छोड़कर अमेरिका और चीन के बाद तीसरे स्थान पर आने की संभावना है.) यह दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा हथियार आयातक है और यहां स्मार्टफोन उपयोगकर्ताओं की संख्या भी दूसरी सबसे बड़ी है.
भले ही ट्रंप आगे चलकर अपना रुख बदल लें, नुकसान हो चुका है. भारतीयों का मानना है कि अमेरिका ने अपना असली चेहरा दिखा दिया है – उसकी अविश्वसनीयता और अपने दोस्तों के साथ बुरा व्यवहार करने की प्रवृत्ति. वे स्वाभाविक रूप से महसूस करेंगे कि उन्हें रूस के करीब रहना चाहिए – और यहां तक कि चीन से भी संबंध सुधारने चाहिए. ट्रंप के अपमानजनक व्यवहार पर देश भर में सदमे और गुस्से की लहर है.
जब मैं भारत में होता हूं, तो अक्सर वहां के नेताओं से अमेरिका के साथ और घनिष्ठ संबंध बनाने का आग्रह करता हूं, यह तर्क देते हुए कि उनका भविष्य दुनिया के सबसे पुराने और सबसे बड़े लोकतंत्र के बीच महान साझेदारी में निहित है. अब, मुझे स्वीकार करना होगा, उन्हें यह सलाह मानने के लिए मनाना मुश्किल होगा.





