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Explainer: क्या भारत की विदेश नीति में बदलाव हो रहा है या ये ‘वेट एंड वॉच’ की स्थिति है

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सितंबर के शुरुआत में ही शंघाई सहयोग संगठन यानि एससीओ के शिखर सम्मेलन में भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच गर्मजोशी नजर आई. तीनों नेताओं की एक साथ ली गईं कई तस्वीरें अमेरिका समेत दुनियाभर में सुर्खियां बनीं. इसके बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने व्यंग्यात्मक बयानों की एक सीरीज शुरू की. अमेरिका ने भारत पर इसके बाद फिर धौंसबाजी करने की कोशिश की, हालांकि हफ़्ते के अंत तक मोदी और ट्रंप के बीच सुलह की स्थिति दिखने लगी.

दरअसल जिस तरह से अमेरिकी प्रेसीडेंट डोनाल्ड ट्रंप ने भारत पर 50 फीसदी टैरिफ लगाया और उसके बाद ट्रंप और उनक सलाहकारों ने भारत पर आपत्तिजनक टिप्पणियां शुरू कीं, उसको भारत में बहुत गंभीरता से लिया गया. भारत ने साफ दिखा दिया कि वो किसी भी तरह की धौंस में नहीं आना वाला. लिहाजा भारत ट्रंप को इस पूरे मामले में मनाने की कोशिश भी नहीं की. उसने अपना एक स्टैंड ले लिया.

सवाल – भारत ने शंघाई सहयोग संगठन की बैठक में जाकर क्या संदेश दिया?

– 1 सितंबर को चीन में हुई शंघाई सहयोग संगठन की बैठक में जिस तरह मोदी, जिनपिंग और पुतिन की गर्मजोशी से भरी बातचीत हुई. उसकी तस्वीरें पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बनीं. अमेरिकी मीडिया ने इसे प्रमुखता दी. आमतौर पर इसमें ट्रंप की विदेश नीति की आलोचना की गई. ये कहा गया कि अमेरिकी प्रेसीडेंट ट्रंप के बुली व्यवहार के बाद भारत ने अमेरिकी धौंस में नहीं आने का संकेत दिया है. भारत ने अमेरिका को साफ संदेश दिया है कि वो झुकेगा नहीं. साथ ही अपने हितों के लिए चीन और रूस के और करीब जा सकता है.

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SCO समिट की मोदी-पुतिन-शी की तस्वीर से ट्रंप पर दबाव बढ़ा. (फोटो AP)
सवाल – शंघाई सहयोग संघठन की जियानजिन मीटिंग में क्या हुआ?

– मोटे तौर पर इस शिखर सम्मेलन को चीन की शक्ति प्रदर्शन के रूप में देखा गया. तियानजिन में एससीओ शिखर सम्मेलन में 10 देशों ने हिस्सेदारी की. तुर्की, नेपाल, मालदीव, अजरबैजान, आर्मेनिया, इंडोनेशिया और मलेशिया सहित कई देशों के नेता इसमें पहुंचे. इससे ऐसा लगता है कि चीन ने ये दिखाना शुरू कर दिया है कि वैश्विक राजनीति में वो भी अमेरिका की तरह एक महाशक्ति है. मोदी ने एससीओ देशों के बीच नेताओं के साथ संवाद किया. शी जिनपिंग और व्लादिमीर पुतिन के साथ द्विपक्षीय बातचीत की. ये सौहार्दपूर्ण रही. तो दुनिया ने ये देखा कि तीन बड़े शक्तिशाली देश करीब आ चुके हैं.

सवाल – भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसके जरिए क्या संदेश दिया, क्या ये दिखा रहा है कि भारत की विदेश नीति बदल रही है?

– शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) शिखर सम्मेलन के लिए चीन जाने का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का फैसला सरकार की विदेश नीति के दृष्टिकोण में बदलाव का एक स्पष्ट संदेश था. मोदी चीन की यात्रा पर 7 साल के बाद गए. चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ उनकी बैठक 2020 के सैन्य गतिरोध के बाद पहली बार द्विपक्षीय मुलाकात के रूप में हुई. मोदी तीन साल बाद एससीओ शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने भी गए. इस यूरेशियन समूह को निश्चित रूप से पश्चिम और अमेरिका विरोधी माना जाता है.

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चीन के तियानजिन में मिले पीएम नरेंद्र मोदी और शी जिनपिंग. ये मुलाकात गर्मजोशी से भरी हुई थी. इससे पिछले गिलेशिकवे दूर हुए और दोनों देशों ने संबंधों को बेहतर बनाने का काम भी शुरू कर दिया.
चीन के साथ द्विपक्षीय बैठक में दोनों नेताओं ने अक्टूबर 2024 में शुरू की गई सामान्यीकरण प्रक्रिया को अपनी मंजूरी दी. चीन के साथ सीधी उड़ानों की बहाली, वीज़ा सुविधा और “विश्व व्यापार को स्थिर” करने के लिए आर्थिक संबंधों को फिर बेहतर करने को हरी झंडी दी गई.चीन ने भी जो गर्मजोशी दिखाई, उसको एक साल पहले सोचा भी नहीं जा सकता था.

सवाल – क्या भारत की विदेश नीति में ये बदलाव अमेरिकी टैरिफ और ट्रंप व उनके सलाहकारों के हालिया बयानबाजी के बाद आया है?

– ये तो जाहिर ही है कि भारत को अमेरिकी प्रेसीडेंट ट्रंप का भारत पर 50 फीसदी टैरिफ लगाने के साथ उनकी कुछ टिप्पणियां रास नहीं आईं. इस वजह से भारत ने ये दिखाना शुरू किया कि वो अपना रास्ता अपने तरीके से बदल भी सकता है.

हालांकि ये बदलावों केवल एक इसी वजह से नहीं आए बल्कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान अमेरिका का पाकिस्तान को उसका समर्थन, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधारों और एनएसजी की सदस्यता पर भारतीय कदमों को रोकना और पाकिस्तान स्थित आतंकवादियों को नरम रुख जैसी बातें भी शामिल हैं.

वहीं तियानजिन घोषणापत्र में आतंकवाद को लेकर भारत की चिंताओं को शामिल किया गया. इसके घोषणापत्र में “आतंकवादियों की सीमा पार गतिविधि” के खिलाफ कड़ी भाषा शामिल थी. घोषणापत्र में सभी एससीओ सदस्यों ने गाजा में मानवीय संकट और ईरान पर अमेरिका-इजरायल के हमलों की भी निंदा की.

मोदी - पुतिन - जिनपिंग
मोदी – पुतिन – जिनपिंग…ये मुस्कुराहटें और ये गर्मजोशी क्या कहती है.

सवाल – अमेरिका ने इन बैठकों को किस प्रकार देखा?

– वाशिंगटन में तियानजिन मीटिंग की तीनों नेताओं की गर्मजोशी से भरी तस्वीरों को अमेरिका और पश्चिमी व्यवस्था के लिए एक चुनौती के रूप में देखा गया, अमेरिका में ट्रंप समेत सभी ने मान लिया कि भारत ने अब “पक्ष बदल लिया है”.

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म “ट्रुथ” पर ट्रंप ने एससीओ शिखर सम्मेलन की एक तस्वीर पोस्ट करते हुए कहा कि ऐसा लग रहा है कि अमेरिका ने “भारत और रूस को सबसे गहरे, सबसे अंधकारमय चीन के हाथों खो दिया है”.

व्हाइट हाउस के व्यापार सलाहकार पीटर नवारो , जिन्हें भारत के खिलाफ टैरिफ लगाने वाले अधिकारियों में एक माना जाता है, उन्होंने कहा कि यह “शर्मनाक” है कि एक लोकतंत्र के रूप में भारत रूस और चीन के करीब जा रहा है. मोदी सरकार की आलोचना करते हुए कई अन्य टिप्पणियां भी आईं, जिनमें यूक्रेन संघर्ष को “मोदी का युद्ध” कहना भी शामिल था, जिसे विदेश मंत्रालय ने “गलत और भ्रामक” बताकर खारिज कर दिया.

भारत 8 सितंबर को ब्राज़ील की अध्यक्षता में ब्रिक्स ऑनलाइन शिखर सम्मेलन में भी भाग लेगा, जिसमें अमेरिकी टैरिफ पर एक साझा प्रतिक्रिया पर चर्चा की जाएगी, जो अमेरिका के सामने खतरे की और भी घंटी बजा सकता है.

सवाल – क्या इस तनाव के बीच भारत और अमेरिका के बीच सुधार के कुछ संकेत दीख रहे हैं?

– दिल्ली-वाशिंगटन संबंध कई मुद्दों पर तनावपूर्ण रहे हैं, जिनमें वीज़ा, आव्रजन और व्यापार नीतियां और ट्रंप द्वारा ऑपरेशन सिंदूर में युद्धविराम की मध्यस्थता के बार-बार दावे शामिल हैं. हालांकि इस तनाव के बीच एक और मोड़ आया. ट्रंप ने बीते शुक्रवार को कहा कि भारत और अमेरिका के बीच एक “विशेष संबंध” है. वह “प्रधानमंत्री मोदी के हमेशा अच्छे दोस्त” रहेंगे. मोदी ने इसका स्वागत किया.

अमेरिका ने पहले तो शंघाई सहयोग संगठन की मीटिंग में मोदी की जिनपिंग और पुतिन के साथ मुलाकात पर तीखी प्रतिक्रिया जाहिर की लेकिन फिर उसके सुर बदलने लगे.
सवाल – अब आगे भारत किधर जाएगा, अमेरिका की ओर या चीन की तरफ?

– कई विदेश नीति पर्यवेक्षकों को लग रहा है कि भारतीय नीति बदल गई है. क्योंकि पिछले कुछ बरसों से लग रहा है कि भारत अमेरिका के करीब जा चुका है, चीन से तनाव के चलते भारत की उससे दूरियां भी बढ़ गईं थीं लेकिन अब चीजें बदल रही हैं. मान रहे हैं भारत और अमेरिका के बीच अब वैसे रिश्ते नहीं रह गए. भारत को अमेरिकी रुख से झटका लगा है. भारत ने रूस और चीन दोनों से संबंध बेहतर करने पर ध्यान देना शुरू कर दिया है.

हालांकि ये कहना अभी जल्दीबाजी होगी कि भारत ने अमेरिका के साथ संबंधों को पूरी तरह खत्म कर दिया है. आधिकारिक आदान-प्रदान और सैन्य अभ्यास बंद नहीं हुए हैं. अब आगे ये देखने वाली बात होगी भारत और अमेरिका किन मुद्दों को अनदेखा करते हैं और किन मुद्दों पर समझौता कर पाते हैं. इस महीने श्री जयशंकर संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक के लिए अमेरिका जा रहे हैं. वहीं क्वाड शिखर सम्मेलन भारत में होने वाला है, जिसमें ट्रंप के आने की उम्मीद है.

सवाल – क्या ये कह सकते हैं कि भारत की विदेश नीति अभी वेट एंड वॉच की स्थिति में है?

– बिल्कुल, फिलहाल ऐसा ही लगता है. वर्तमान स्थिति को समझने के लिए “Wait and Watch” कहना बिल्कुल ठीक रहेगा. इसकी वजह वैश्विक शक्ति संतुलन में अनिश्चितता है. अमेरिका-चीन टकराव लगातार बढ़ता जा रहा है. रूस-यूक्रेन युद्ध ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कई अनिश्चितताएं पैदा कर दी हैं. ब्रिक्स जैसे मंच भी एक नए प्रकार के ग्लोबल अलायंस की दिशा में बढ़ रहे हैं, हालांकि ये अभी साफ नहीं है कि इसका भारत को कितना फायदा होगा. इन अनिश्चितताओं के कारण भारत अपनी विदेश नीति में बहुत अधिक साहसिक कदम नहीं उठा रहा, बल्कि परिस्थिति का आकलन कर रहा है.

हालिया अमेरिका के टैरिफ निर्णय से भारत-अमेरिका के व्यापारिक रिश्ते बेशक तनावग्रस्त हुए हैं लेकिन भारत पूरी तरह से अमेरिका से दूरी नहीं बना रहा, लेकिन व्यापारिक क्षेत्र में वैकल्पिक रास्ते तलाश रहा है. रूस से भी रक्षा और ऊर्जा सहयोग बढ़ाया जा रहा है. रूस पर पश्चिमी प्रतिबंधों के बीच भारत का संतुलित रुख महत्वपूर्ण माना जा रहा है. चीन से भी व्यापारिक संबंध और बेहतर हो रहे हैं, हालांकि सीमा विवाद की वजह से तनाव भी है. चीन-रूस के करीब दिखना भारत की मजबूरी और रणनीतिक बैलेंसिंग का नतीजा है, न कि स्पष्ट समर्थन.

हाल की SCO मीटिंग में भारत ने सक्रिय भागीदारी जरूर दिखाई लेकिन इसके आधार पर ये नहीं कह सकते कि भारत पूरी तरह चीन और रूस की ओर झुक गया है. इस मंच पर भारत अपनी जगह मजबूत करने की कोशिश में है ताकि भविष्य में जरूरत के हिसाब से विकल्प खुले रहें. फिलहाल तो यह स्थिति “Wait and Watch” ही है.

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