1948 में इज़राइल ने अपनी आजादी की घोषणा की. उसके बाद अमेरिका ने तुरंत उसको मान्यता दी. इसके साथ वह एक आजाद देश के रूप में स्थापित हो गया. लेकिन साथ ही वहां पर गाजा पट्टी और पश्चिमी तट से लेकर तनाव और हिंसा का नया अध्याय शुरू हो गया. फ़िलिस्तीन को अलग देश नहीं बनने देने के लिए इजरायल ने सारी ताकत झोंकी हुई है.
पिछले करीब तीन सालों से इजरायल ने गाजा शहर में हमास के खिलाफ जंग छेड़ी हुई है. गाजा शहर अब खाली कराया जा रहा है. इस पूरे इलाके को ही ध्वस्त करके इसका नामोनिशान मिटाया जा रहा है. गाजा शहर में तकरीबन 5 लाख लोग रहते हैं. जिनकी जिंदगी बहुत मुश्किल भरी हो चुकी है. उन्हें खाना मिलता नहीं. इलाज की कोई व्यवस्था नहीं. घर छोड़कर भागना पड़ रहा है. एक अनुमान के अनुसार इजरायल के हमलों के बाद से गाजा शहर में 65 हजार से ऊपर लोग मारे जा चुके हैं, जिसमें बच्चे, बूढ़े, महिलाएं, युवक सभी हैं.
जिन चार नए यूरोपीय देशों ने फिलिस्तीन को संयुक्त राष्ट्र महासभा (यूएनजीए) की सालाना बैठक से पहले मान्यता देने की घोषणा की, उसमें आस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, पुर्तगाल और कनाडा शामिल हैं. इससे पहले बेल्जियम, फ्रांस और कई यूरोपीय देश फिलिस्तीन को मान्यता दे चुके हैं.
– फिलिस्तीन को एक देश के रूप में मान्यता देने की घोषणा को प्रतीकात्मक कदम के तौर पर ही देखा जाना चाहिए, खासकर ये देखते हुए गाजा शहर में नरसंहार जैसी रोजाना की स्थिति को ये सभी देश रोकने की अपील करते रहे हैं. वो चाहते हैं कि इस इलाके में कोई स्थायी समाधान निकले और हिंसा – तनाव स्थायी तौर पर खत्म हो जाए.
यह युद्ध हमास द्वारा 7 अक्टूबर, 2023 को दक्षिणी इज़राइल पर किए गए अचानक हमले से शुरू हुआ था, जिसके बाद इज़राइल ने इस समूह के सफाए के लिए एक सैन्य अभियान शुरू किया. इज़राइल ने अपने अभियान में अब तक गाजा के बड़े हिस्से को तबाह कर दिया है. यहां रहने वाले भूखमरी की स्थिति में आ चुके हैं. अगस्त में, संयुक्त राष्ट्र समर्थित वैश्विक भूख निगरानी संस्था ने घोषणा की कि गाजा शहर और उसके आसपास “पूरी तरह से मानव निर्मित” अकाल पड़ रहा है.
सवाल – क्या यूरोपीय देशों का रुख अब इजरायल को लेकर बदल रहा है?
कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि इन देशों की घरेलू राजनीति ही असली वजह है. ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन या फ्रांस जैसे देशों में, जहां मुसलमानों की संख्या यहूदियों से दस गुना ज़्यादा है, फ़िलिस्तीन को मान्यता देना सिर्फ़ या ज़्यादातर विदेश नीति का मुद्दा नहीं है. यह एक घरेलू राजनीतिक कदम है जिसका उद्देश्य मुस्लिम मतदाताओं को आकर्षित करना है.” हालांकि अमेरिका के ट्रंप प्रशासन ने इसकी आलोचना की है. न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार अमेरिका ने अगस्त से फिलिस्तीनी पासपोर्ट धारकों को आमतौर पर आगंतुक वीजा जारी करने बंद कर दिए हैं. इससे ये भी कहा जा सकता है कि अमेरिका फिलिस्तीन को अलग संप्रभु राष्ट्र के तौर पर मान्यता देने के पक्ष में नहीं है.
सवाल – कितने देश फ़िलिस्तीनी राज्य को मान्यता देते हैं?
जुलाई के अंत में फ्रांस पहला देश था जिसने घोषणा की कि वह सितंबर में संयुक्त राष्ट्र महासभा में बिना शर्त एक फ़िलिस्तीनी राज्य को मान्यता देगा. इसके तुरंत बाद ब्रिटेन, फिर कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और बेल्जियम ने भी समर्थन दे दिया. हालांकि इन सभी ने अपने समर्थन के साथ शर्तें भी रखीं कि इन क्षेत्रों का विसैन्यीकरण, चुनाव, हमास द्वारा बंधक बनाए गए लोगों की वापसी और भविष्य की शासन संरचनाओं से हमास को बाहर करना शामिल है. इस बीच, आयरलैंड, नॉर्वे और स्पेन सहित अन्य 15 विदेश मंत्रियों ने दो देश समाधान के लिए इच्छा जाहिर की है.
जुलाई 2025 के आंकड़ों से पता चला है कि केवल 23 प्रतिशत यहूदी इज़राइली दो देश समाधान का समर्थन करते हैं, जबकि 82 प्रतिशत अरब इज़राइली इसका समर्थन करते हैं. हालांकि एक सर्वेक्षण में पाया गया कि आधे से ज़्यादा फ़िलिस्तीनी भी दो देश ढांचे का विरोध करते हैं.
– फिलहाल फिलिस्तीन का संयुक्त राष्ट्र में पर्यवेक्षक देश का दर्जा है, उसे पूर्ण सदस्य की स्थिति नहीं मिली है. 2012 में UN की महासभा ने मतदान कर फिलिस्तीन को नान मेंबर आब्जर्बर स्टेट का दर्जा दिया था. इस दर्जे का मतलब है कि फिलिस्तीन UN की अधिकांश बैठकों में भाग ले सकता है, भाषण कर सकता है, प्रस्ताव रख सकता है, लेकिन महासभा या अन्य मुख्य निकायों में उसको वोट देने का अधिकार नहीं है.
सवाल – पूर्ण सदस्यता प्रदान करने के लिए संयुक्त राष्ट्र की प्रक्रिया क्या है?
– संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता चाहने वाले किसी भी देश को पहले महासचिव के पास आवेदन करना होगा , जो आवेदन को सुरक्षा परिषद को भेजेंगे. आवेदन को परिषद के पंद्रह सदस्यों में से कम से कम नौ सदस्यों की स्वीकृति प्राप्त करनी होगी. पांच स्थायी सदस्यों में किसी के भी वीटो से बचना होगा. सफल होने पर, आवेदन महासभा में भेजा जाएगा, जहां अंतिम अनुमोदन के लिए दो-तिहाई बहुमत की जरूरत होती है.





