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Explainer: अमेरिकी मित्र देश फिलिस्तीन को क्यों मान्यता दे रहे हैं, कहां उसके देश में बनने में रुकावट

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ये तो सवाल उठता ही है कि यूरोपीय और अमेरिकी मित्र देशों को इतने सालों बाद अचानक क्या हो गया है कि वो फिलिस्तीन को मान्यता दे रहे हैं ताकि संयुक्त राष्ट्र संघ में उसको और मजबूत बनाया जाए. फ़िलिस्तीनी क्षेत्र दशकों से राजनीतिक अनिश्चितता की हालत में फ़िलिस्तीनियों की स्वतंत्रता और अंतर्राष्ट्रीय मान्यता की इच्छा विवादास्पद बनी हुई है. 1948 में इजरायल बना था. उसके बाद से इस इलाके के हालात उथल पुथल वाले रहे हैं. यूरोप के देशो ने अचानक इजरायल के विरोध के बावजूद फिलिस्तीन को मान्यता देना शुरू कर दिया है. संयुक्त राष्ट्र संघ करीब 150 सदस्यों की मान्यता और समर्थन के बाद भी फिलिस्तीन को अब तक पूर्ण सदस्य का दर्जा क्यों नहीं मिल सका.

1948 में इज़राइल ने अपनी आजादी की घोषणा की. उसके बाद अमेरिका ने तुरंत उसको मान्यता दी. इसके साथ वह एक आजाद देश के रूप में स्थापित हो गया. लेकिन साथ ही वहां पर गाजा पट्टी और पश्चिमी तट से लेकर तनाव और हिंसा का नया अध्याय शुरू हो गया. फ़िलिस्तीन को अलग देश नहीं बनने देने के लिए इजरायल ने सारी ताकत झोंकी हुई है.

फिलिस्तीन का खुद का भी मसला काफी उलझा हुआ है. वेस्ट बैंक वाले इलाके में फतेह का शासन है. वेस्ट बैंक के इलाके से फतेह की अगुवाई में फिलिस्तीन की सरकार चलती है. पिछले करीब 37 सालों में उसके हिंसा का कोई इतिहास नहीं रहा है. फिलिस्तीन का दूसरा हिस्सा गाजा पट्टी है, जिस पर 2007 में हमास ने कब्जा कर लिया. तब से गाजा पट्टी पर उसकी हुकूमत चलने लगी. लेकिन एक देश के तौर पर वेस्ट बैंक और गाजा पट्टी दोनों इलाके मिलकर फिलिस्तीन बनते हैं. लेकिन हकीकत में फिलिस्तीन का इलाका वेस्ट बैंक का ही इलाका है. हालांकि इस सबके बीच पूर्वी यरूशलम भी है, जिस पर इजरायल और फिलिस्तीन दोनों दावा करते हैं.

पिछले करीब तीन सालों से इजरायल ने गाजा शहर में हमास के खिलाफ जंग छेड़ी हुई है. गाजा शहर अब खाली कराया जा रहा है. इस पूरे इलाके को ही ध्वस्त करके इसका नामोनिशान मिटाया जा रहा है. गाजा शहर में तकरीबन 5 लाख लोग रहते हैं. जिनकी जिंदगी बहुत मुश्किल भरी हो चुकी है. उन्हें खाना मिलता नहीं. इलाज की कोई व्यवस्था नहीं. घर छोड़कर भागना पड़ रहा है. एक अनुमान के अनुसार इजरायल के हमलों के बाद से गाजा शहर में 65 हजार से ऊपर लोग मारे जा चुके हैं, जिसमें बच्चे, बूढ़े, महिलाएं, युवक सभी हैं.

पूरी दुनिया इजरायल से गाजा शहर में कार्रवाई रोक देने की मांग कर रही है लेकिन इजरायल के राष्ट्रपति बेंजामिन नेतन्याहु ने सभी गुहारों और अपीलों को अनसुना कर दिया है. अमेरिका चुपचाप इस सबको देख रहा है. माना जा रहा है कि उसका मूक समर्थन इजराइल के साथ है.

जिन चार नए यूरोपीय देशों ने फिलिस्तीन को संयुक्त राष्ट्र महासभा (यूएनजीए) की सालाना बैठक से पहले मान्यता देने की घोषणा की, उसमें आस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, पुर्तगाल और कनाडा शामिल हैं. इससे पहले बेल्जियम, फ्रांस और कई यूरोपीय देश फिलिस्तीन को मान्यता दे चुके हैं.

सवाल – अचानक अमेरिका के मित्र देश कैसे फिलिस्तीन को मान्यता दे रहे हैं, जबकि ये कदम तो अमेरिका और इजरायल के खिलाफ ही माना जाएगा?

– फिलिस्तीन को एक देश के रूप में मान्यता देने की घोषणा को प्रतीकात्मक कदम के तौर पर ही देखा जाना चाहिए, खासकर ये देखते हुए गाजा शहर में नरसंहार जैसी रोजाना की स्थिति को ये सभी देश रोकने की अपील करते रहे हैं. वो चाहते हैं कि इस इलाके में कोई स्थायी समाधान निकले और हिंसा – तनाव स्थायी तौर पर खत्म हो जाए.

राज्य का दर्जा दिए जाने की बढ़ती मांग सितंबर में होने वाले संयुक्त राष्ट्र महासभा से पहले आई है. यह हमास के खिलाफ इजरायल के युद्ध में फंसे फिलिस्तीनियों के लिए बढ़ती मानवीय स्थितियों के प्रति देशों की बढ़ती चिंताओं को दिखाती है.

यह युद्ध हमास द्वारा 7 अक्टूबर, 2023 को दक्षिणी इज़राइल पर किए गए अचानक हमले से शुरू हुआ था, जिसके बाद इज़राइल ने इस समूह के सफाए के लिए एक सैन्य अभियान शुरू किया. इज़राइल ने अपने अभियान में अब तक गाजा के बड़े हिस्से को तबाह कर दिया है. यहां रहने वाले भूखमरी की स्थिति में आ चुके हैं. अगस्त में, संयुक्त राष्ट्र समर्थित वैश्विक भूख निगरानी संस्था ने घोषणा की कि गाजा शहर और उसके आसपास “पूरी तरह से मानव निर्मित” अकाल पड़ रहा है.

हमास द्वारा संचालित गाजा स्वास्थ्य मंत्रालय ने इस क्षेत्र में कुल 20 लाख की आबादी में मरने वालों की संख्या 60 हज़ार से ज़्यादा बताई है, हालांकि इस आंकड़े को इज़राइल चुनौती देता है.जाहिर सी बात है कि यूरोपीय देश चाहते हैं कि गाजा में ये सब रुके और कोई समाधान निकाला जाए, ताकि युद्ध रुक जाए.

सवाल – क्या यूरोपीय देशों का रुख अब इजरायल को लेकर बदल रहा है?

– दरअसल इजरायल के गाजा में मानवीय दमन के बाद दुनियाभर के देशों में जनता की ओर दबाव बढ़ रहा है कि इसे लेकर कुछ करना चाहिए, लिहाजा ये कहना चाहिए कि यूरोपीय देशों के नेताओं ने अपनी जनता के भारी आंतरिक दबाव के बाद अपनी नीतियों में बदलाव की घोषणा की है. इन सभी देशों में इज़राइल की आलोचना करने वाले लोग हैं. इसी दबाव में इन देशों के नेताओं ने फ़िलिस्तीनी राज्य को मान्यता देने का फैसला किया.

कुछ विशेषज्ञों का मानना ​​है कि इन देशों की घरेलू राजनीति ही असली वजह है. ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन या फ्रांस जैसे देशों में, जहां मुसलमानों की संख्या यहूदियों से दस गुना ज़्यादा है, फ़िलिस्तीन को मान्यता देना सिर्फ़ या ज़्यादातर विदेश नीति का मुद्दा नहीं है. यह एक घरेलू राजनीतिक कदम है जिसका उद्देश्य मुस्लिम मतदाताओं को आकर्षित करना है.” हालांकि अमेरिका के ट्रंप प्रशासन ने इसकी आलोचना की है. न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार अमेरिका ने अगस्त से फिलिस्तीनी पासपोर्ट धारकों को आमतौर पर आगंतुक वीजा जारी करने बंद कर दिए हैं. इससे ये भी कहा जा सकता है कि अमेरिका फिलिस्तीन को अलग संप्रभु राष्ट्र के तौर पर मान्यता देने के पक्ष में नहीं है.

वैसे ये कहा जा सकता है कि अमेरिकी मित्र देश फिलिस्तीन को मान्यता इसीलिए दे रहे हैं ताकि वे गाजा में मानवीय संकट को हाईलाइट कर सकें. क्षेत्र में शांति प्रक्रिया को प्रोत्साहित कर सकें और राजनीतिक दबाव बनाएं ताकि लंबित संघर्ष का समाधान निकले.

सवाल – कितने देश फ़िलिस्तीनी राज्य को मान्यता देते हैं?

– मार्च तक संयुक्त राष्ट्र के 193 सदस्य देशों में से 147 ने राजनयिक रूप से एक फ़िलिस्तीनी राज्य को मान्यता दे दी है. हाल के देशों की मान्यता को जोडे़ं तो ये संख्या 151 से ऊपर चली गई है.

जुलाई के अंत में फ्रांस पहला देश था जिसने घोषणा की कि वह सितंबर में संयुक्त राष्ट्र महासभा में बिना शर्त एक फ़िलिस्तीनी राज्य को मान्यता देगा. इसके तुरंत बाद ब्रिटेन, फिर कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और बेल्जियम ने भी समर्थन दे दिया. हालांकि इन सभी ने अपने समर्थन के साथ शर्तें भी रखीं कि इन क्षेत्रों का विसैन्यीकरण, चुनाव, हमास द्वारा बंधक बनाए गए लोगों की वापसी और भविष्य की शासन संरचनाओं से हमास को बाहर करना शामिल है. इस बीच, आयरलैंड, नॉर्वे और स्पेन सहित अन्य 15 विदेश मंत्रियों ने दो देश समाधान के लिए इच्छा जाहिर की है.

1993 से ट्रंप को छोड़कर हर अमेरिकी राष्ट्रपति ने द्वि-राज्य समाधान का समर्थन किया है. हालांकि अमेरिका में किए गए एक सर्वेक्षण से पता चलता है कि लगभग 60 प्रतिशत अमेरिकी मानते हैं कि संयुक्त राष्ट्र के सभी सदस्यों को एक फ़िलिस्तीनी राज्य को मान्यता देनी चाहिए. इजरायली सरकार इस विचार का कड़ा विरोध करती है क्योंकि उसकी जनता इसके पक्ष में नहीं है.

जुलाई 2025 के आंकड़ों से पता चला है कि केवल 23 प्रतिशत यहूदी इज़राइली दो देश समाधान का समर्थन करते हैं, जबकि 82 प्रतिशत अरब इज़राइली इसका समर्थन करते हैं. हालांकि एक सर्वेक्षण में पाया गया कि आधे से ज़्यादा फ़िलिस्तीनी भी दो देश ढांचे का विरोध करते हैं.

सवाल – फिलिस्तीन की संयुक्त राष्ट्र संघ में वर्तमान स्थिति किस तरह की है?

– फिलहाल फिलिस्तीन का संयुक्त राष्ट्र में पर्यवेक्षक देश का दर्जा है, उसे पूर्ण सदस्य की स्थिति नहीं मिली है. 2012 में UN की महासभा ने मतदान कर फिलिस्तीन को नान मेंबर आब्जर्बर स्टेट का दर्जा दिया था. इस दर्जे का मतलब है कि फिलिस्तीन UN की अधिकांश बैठकों में भाग ले सकता है, भाषण कर सकता है, प्रस्ताव रख सकता है, लेकिन महासभा या अन्य मुख्य निकायों में उसको वोट देने का अधिकार नहीं है.

फिलिस्तीन की कोशिश रही है कि वह UN की पूर्ण सदस्यता प्राप्त करे. इसके लिए UN चार्टर की धारा-4 (Article 4) के अनुरूप आवेदन करना होता है, जिसमें सुरक्षा परिषद की सिफारिश चाहिए होती है और फिर महासभा में दो-तिहाई बहुमत से सदस्यता मंजूर होनी चाहिए. लेकिन अभी तक ऐसा नहीं हुआ क्योंकि सुरक्षा परिषद में एक या अधिक स्थायी सदस्यों ने प्रस्ताव को रोक दिया है. अमेरिका ने इस पर वीटो कर दिया. अप्रैल 2024 में ऐसे ही एक प्रस्ताव पर अमेरिका ने वीटो कर दिया. फिलिस्तीन और इज़राइल के बीच राजनीतिक और भू-राजनीतिक विवादों का हल नहीं होना भी एक बड़ी बाधा है.

सवाल – पूर्ण सदस्यता प्रदान करने के लिए संयुक्त राष्ट्र की प्रक्रिया क्या है?

– संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता चाहने वाले किसी भी देश को पहले महासचिव के पास आवेदन करना होगा , जो आवेदन को सुरक्षा परिषद को भेजेंगे. आवेदन को परिषद के पंद्रह सदस्यों में से कम से कम नौ सदस्यों की स्वीकृति प्राप्त करनी होगी. पांच स्थायी सदस्यों में किसी के भी वीटो से बचना होगा. सफल होने पर, आवेदन महासभा में भेजा जाएगा, जहां अंतिम अनुमोदन के लिए दो-तिहाई बहुमत की जरूरत होती है.

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