बात, 30 नवंबर 1960 की है. लोकसभा में सिंधु जल संधि पर चर्चा हुई. चर्चा छोटी थी लेकिन बेहद तीखी. इसने जवाहरलाल नेहरू की सरकार और तमाम दलों के सांसदों, यहां तक कि कांग्रेसियों के बीच गहरा मतभेद उजागर किया. नेहरू सरकार ने इस संधि का बचाव किया, लेकिन अधिकांश सांसदों को लगा कि भारत ने पाकिस्तान के सामने समर्पण कर दिया. यह डील संसद या विपक्षी नेताओं को विश्वास में लिए बिना की गई. संसद में बहस से पहले ही इस पर साइन किए जा चुके थे. 19 सितंबर 1960 को कराची में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के सैन्य शासक राष्ट्रपति अयूब खान ने इस पर सिग्नेचर किए थे. इतना ही नहीं, वर्ल्ड बैंक को गारंटी भी दे दी थी.
यह नेहरू के करियर की सबसे तीखी आलोचनाओं में से एक थी. संसद में लगभग हर वक्ता ने इस संधि की निंदा की, इसे अनुचित, धोखा, यहां तक कि ‘दूसरा बंटवारा’ तक कहा गया. बलरामपुर से सांसद अटल बिहारी वाजपेयी ने इसे एक खतरनाक रियायत बताया, जो स्थायी दोस्ती नहीं ला सकती थी. यह संधि केवल पानी के बंटवारे तक सीमित नहीं थी, बल्कि इसमें एक स्थायी ‘सिंधु आयोग’ (Indus Commission) की भी स्थापना की गई थी. इस आयोग में भारत और पाकिस्तान दोनों के अधिकारी शामिल थे. उनका काम था जलस्रोतों के इस्तेमाल से जुड़े विवादों का निपटारा करना.
जब जरूरत नहीं थी तो क्यों दिया
आजादी के बाद 1947 से ही नदियों का मुद्दा दोनों देशों के बीच तनाव का कारण रहा था. भारत और पाकिस्तान, दोनों ही, नदियों के पानी पर अपने-अपने दावे कर रहे थे. इस संधि ने छह प्रमुख नदियों को विभाजित कर दिया. तीन नदियां- सतलज, व्यास और रावी भारत को मिलीं. जबकि तीन बड़ी नदियां- इंडस, झेलम और चिनाब पाकिस्तान के हिस्से में गईं. चौंकाने वाली बात यह थी कि इन नदियों का पानी भारत के भूगोल और कृषि क्षेत्र का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा छोड़ चुका था. फिर भी भारत को इनका अधिकांश हिस्सा पाकिस्तान को देना पड़ा. यह समझौता इसीलिए विवादित था.
इस संधि की सबसे बड़ी आलोचना यही रही कि इसे संसद में पेश नहीं किया गया. न ही उस समय विपक्ष से राय ली गई. राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, पंडित नेहरू ने यह समझौता एक तरह से ‘गुपचुप तरीके’ से किया था. विपक्ष ने आरोप लगाया कि भारत ने अपने हिस्से का पानी बिना जरूरत के पाकिस्तान को सौंप दिया. कई विशेषज्ञों का मानना है कि अगर उस समय संसद में चर्चा होती तो इतनी बड़ी रियायतें कभी मंजूर नहीं होतीं. पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भी बाद में इस समझौते को लेकर सवाल उठाए थे. उनका कहना था कि नेहरू ने देश के हितों से समझौता किया. वहीं, कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता भी इस बात से सहमत रहे कि संसद की अनदेखी करके समझौता करना नेहरू की एक बड़ी भूल थी.
भारत को सिर्फ 20% पानी का अधिकार मिला
इंडस वॉटर ट्रीटी के तहत भारत को सिर्फ 20% पानी का अधिकार मिला, जबकि 80% पानी पाकिस्तान के हिस्से में चला गया. यह वही पानी है जिससे पंजाब, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के किसानों को सबसे ज्यादा फायदा मिल सकता था. विशेषज्ञ कहते हैं कि यह समझौता उस दौर में पाकिस्तान के लिए ‘लाइफलाइन’ बन गया, क्योंकि उसके कृषि क्षेत्र को सींचने के लिए यही पानी जरूरी था. भारत के अंदर कई आवाजें उठीं कि ये फैसला जल्दबाजी में और दबाव में लिया गया था. आजादी के बाद जब भारत अपने संसाधनों पर दावा ठोक रहा था, उसी समय इतना बड़ा जलस्रोत पाकिस्तान को सौंप देना कई लोगों को समझ से परे लगा. यही वजह है कि इस समझौते को अब भी ‘नेहरू की सबसे विवादित डील’ कहा जाता है.
अपने हिस्से के पानी से वंचित होना पड़ा
आज भी इंडस वॉटर ट्रीटी पर बहस जारी है. कई लोग मानते हैं कि अगर संसद की मंजूरी ली गई होती, तो शायद समझौते की शर्तें अलग होतीं. 1960 में जिस गुपचुप अंदाज में यह डील हुई, उसने आने वाली पीढ़ियों को गहरे असर में डाल दिया. भारत को अपने ही हिस्से के पानी से वंचित होना पड़ा, जबकि पाकिस्तान ने उसी पानी से अपनी खेती और अर्थव्यवस्था को मजबूत किया. आलोचक कहते हैं कि नेहरू ने अंतरराष्ट्रीय छवि और शांति का हवाला देकर राष्ट्रीय हितों को पीछे छोड़ दिया. यही वजह है कि आज भी यह सवाल गूंजता है- क्या नेहरू ने वाकई भारत का पानी ‘बेच’ दिया था?





