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हिंदी सिनेमा की मशहूर जोड़ी सलीम-जावेद की शुरुआत सिर्फ एक संयोग था. लेकिन दोनों ने हाथ मिलाया और इस जोड़ी ने बॉलीवुड में एक नया इतिहास बना दिया. लेकिन क्या आप जानते हैं इस जोड़ी का बेड़ा पार करने में किसका हाथ था. अगर नहीं तो चलिए बताते हैं… ये वो नामी सुपरस्टार हैं, जिन्होंने खुद भी बॉक्स ऑफिस पर कई बार इतिहास तोड़ा, चलिए बताते हैं कैसे और किसने दोनों को दिया पहला बड़ा ब्रेक.

नई दिल्ली. हिंदी सिनेमा के इतिहास में सलीम-जावेद की जोड़ी को मील का पत्थर माना जाता है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस दिग्गज साझेदारी को पहला बड़ा ब्रेक किसने दिलाया? सलीम-जावेद की जादुई कलम ने कई ब्लॉकबस्टर फिल्में दी. अमिताभ बच्चन को सुपरस्टार बना और खुद भी दोनों ने बॉलीवुड की रूपरेखा बदल के रख दी. लेकिन क्या आप जानते हैं इस जोड़ी को पहली ब्रेक किसने दिया था? दोनों की जोड़ी को हिट कराने के पीछे एक सुपरस्टार का नाम हैं? जानते हैं वो नाम कौन सा है?

दिग्गज पटकथा लेखक सलीम खान इन दिनों वेंटिलेटर सपोर्ट पर हैं और मुंबई के लीलावती अस्पताल में उनका इलाज चल रहा है. 90 साल इस लेखक ने हिंदी सिनेमा की भाषा को ही बदलकर रख दिया. लेकिन कम लोग जानते हैं कि सलीम खान और जावेद अख्तर की इस महान जोड़ी को पहला बड़ा ब्रेक किस सुपरस्टार ने दिया था.जिसके बाद सलीम-जावेद की जोड़ी ने हिंदी सिनेमा को कई यादगार और ऐतिहासिक फिल्में दीं.

सलीम खान का सिनेमा सफर लेखन से नहीं, बल्कि अभिनय से शुरू हुआ था. उन्हें पहला बड़ा अवसर फिल्म ‘बारात’ (1960) में मिला, जिसके लिए उन्हें 1000 रुपये साइनिंग अमाउंट और शूटिंग के दौरान 400 रुपये मासिक वेतन मिलता था. उन्होंने यह ऑफर स्वीकार किया और मुंबई आकर महिमा में किराए के फ्लैट में रहने लगे. ‘प्रिंस सलीम’ के स्क्रीन नाम से काम करते हुए उन्होंने करीब दो दर्जन फिल्मों में काम किया, जिनमें ‘तीसरी मंजिल’ (1966), ‘सरहदी लुटेरा’ (1966) और ‘दीवाना’ (1967) शामिल हैं. ‘तीसरी मंजिल’ में उनका रोल काफी अच्छा था, लेकिन इसके बावजूद स्टारडम उनसे दूर रहा.
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‘सरहदी लुटेरा’ के दौरान ही सलीम खान की मुलाकात जावेद अख्तर से हुई. उस वक्त जावेद अख्तर क्लैपर बॉय का काम करते थे और बाद में निर्देशक एस.एम. सागर ने उन्हें डायलॉग राइटर बना दिया. दोनों अपने-अपने गुरुओं के यहां काम कर रहे थे, जो पड़ोसी हुआ करते थे. सलीम अबरार अल्वी के साथ स्क्रीनप्ले और डायलॉग लिखने में असिस्ट कर रहे थे, जबकि जावेद कैफी आजमी के साथ शायरी सीख रहे थे. इस नजदीकी के चलते दोनों की मुलाकातें बढ़ीं और जल्द ही उन्होंने साथ काम करने का फैसला किया. सलीम कहानी और प्लॉट पर फोकस करते थे, जबकि जावेद डायलॉग और कभी-कभी गीत लिखते थे.

25 फिल्मों में काम करने के बाद सलीम खान को एहसास हो गया था कि एक्टिंग उनका असली क्षेत्र नहीं है. वह लेखन की ओर बढ़ रहे थे. उनकी शुरुआती स्क्रिप्ट में ‘दो भाई’ (1969) शामिल थी. इसी दौरान उनकी मुलाकात राजेश खन्ना से हुई. एक इंटरव्यू में सलीम खान ने बताया था, ‘राजेश खन्ना उस वक्त सुपरस्टार बन चुके थे. उन्हें एक फिल्म की स्क्रिप्ट पसंद नहीं आई थी. उन्होंने हमसे कहा कि अगर तुम इस स्क्रिप्ट को सही कर सकते हो, तो मैं तुम्हें पैसे भी दिलवाऊंगा और क्रेडिट भी.’

वह फिल्म थी ‘हाथी मेरे साथी’ (1971), जो जबरदस्त हिट हुई. इस सफलता ने सलीम-जावेद को एक विश्वसनीय पटकथा लेखक के रूप में स्थापित किया और बड़े अवसरों के द्वार खोल दिए. ‘हाथी मेरे साथी’ की सफलता के बाद जी.पी. सिप्पी ने उन्हें सिप्पी फिल्म्स के लिए रेजिडेंट स्क्रीनराइटर के रूप में हायर किया.

उनकी पहली बड़ी सफलता ‘अंदाज’ (1971) थी, उसके बाद ‘अधिकार’, ‘हाथी मेरे साथी’ और ‘सीता और गीता’ (1972) आईं. इसके बाद तो सुनहरा दौर शुरू ही हो गया. ‘यादों की बारात’ (1973), ‘जंजीर’ (1973), ‘दीवार’ (1975), ‘शोले’ (1975), ‘डॉन’ (1978), ‘त्रिशूल’ (1978), ‘दोस्ताना’ (1980), ‘क्रांति’ (1981) और ‘मिस्टर इंडिया’ (1987) जैसी अमर फिल्में उन्हीं की लेखनी का परिणाम थीं.

कुल मिलाकर उन्होंने 24 फिल्मों में साथ काम किया, जिनमें से 20 सुपरहिट रहीं. सलीम-जावेद को अब तक के सबसे सफल पटकथा लेखक के रूप में वर्णित किया जाता है. सलीम-जावेद ने हिंदी सिनेमा की भाषा बदली. ‘एंग्री यंग मैन’ युग लाए, अमिताभ बच्चन को स्टार बनाया. सबसे खास बात यह है कि वे भारतीय सिनेमा के पहले ऐसे लेखक थे, जिन्होंने सिर्फ लेखक के रूप में स्टार का दर्जा हासिल किया.
February 18, 2026, 15:26 IST





