दुनिया भर में विकास का मसीहा बनकर कर्ज बांटने वाले चीन का असली चेहरा एक बार फिर बेनकाब हो गया है. दक्षिण अमेरिकी देश पेरू इस समय चीन की उस डेट-ट्रैप डिप्लोमेसी का सबसे ताजा शिकार बना है. पेरू ने बड़े अरमानों के साथ अपनी जमीन चीन को सौंपी थी ताकि वहां एक मेगापोर्ट बने और उसकी अर्थव्यवस्था चमक उठे, लेकिन आज हकीकत यह है कि वह देश अपने ही बंदरगाह पर नियंत्रण खो चुका है और चीन वहां का शासक बन बैठा है. यह बताती है कि चीन कैसे किसी मुल्क की जमीन पर कब्जा कर लेता है.
अदालत के जरिए सरकार के हाथ बांधे
हाल ही में पेरू की एक निचली अदालत ने एक ऐसा आदेश जारी किया जिसने पेरू की सरकार को ही पंगु बना दिया. अदालत ने आदेश दिया कि पेरू की सरकारी अथॉरिटीज इस पोर्ट के कामकाज, देखरेख और यहां तक की निगरानी में भी हस्तक्षेप नहीं कर सकतीं. मतलब पेरू का ही पोर्ट लेकिन वहां की सरकार का अब उस पर हक नहीं.
पेरू के सरकारी नियामक ओसिट्रान की अध्यक्ष वेरोनिका जाम्बानो ने एक इंटरव्यू में अपना दर्द बयां किया. उन्होंने कहा कि चीन की यह कंपनी अब पेरू में सरकार और कानून से भी ऊपर हो गई है. यह एकमात्र ऐसी कंपनी होगी जो जनता को सेवा तो देगी, लेकिन जिसे पेरू की सरकार देख या टोक तक नहीं सकती.
445 एकड़ की चीनी रियासत
यह विशाल बंदरगाह पेरू की करीब 445 एकड़ भूमि पर फैला है. अब स्थिति यह है कि यह जमीन पेरू की है, लेकिन कानून चीन की कंपनी कॉस्को का चलेगा.
अमेरिका क्यों आया खौफ में
पेरू की इस बेबसी पर अमेरिका ने पूरी दुनिया को आगाह किया है. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि पेरू ने सस्ते चीनी पैसे के लालच में अपनी संप्रभुता चीन के चरणों में डाल दी है. अमेरिकी विदेश मंत्रालय के वेस्टर्न हेमिस्फीयर ब्यूरो ने इस पर एक आधिकारिक बयान जारी कर कहा, यह पूरी दुनिया के लिए एक चेतावनी है. सस्ता चीनी पैसा अंततः आपकी संप्रभुता की कीमत वसूलता है.
अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि चीन इस क्षेत्र में प्रेडेटरी ओनर यानी हिंसक मालिक की तरह व्यवहार कर रहा है. इसे डॉन-रो डॉक्ट्रिन का हिस्सा माना जा रहा है, जिसके तहत अमेरिका अब अमेरीकी महाद्वीप में चीन के किसी भी विस्तार को अपनी सुरक्षा के लिए सीधा खतरा मान रहा है और कड़ी कार्रवाई की तैयारी में है.
कैसे फंसते हैं देश?
- कूटनीति मामलों के जानकार डॉ. ब्रह्मा चेलानी ने पेरू के संकट को गहराई से समझाया. उन्होंने कहा, यह चीनी चक्रव्यहू का हहिस्सा है.
- चीन किसी भी देश को फंसाने के लिए एक सुनियोजित रणनीति अपनाता है. चीन ऐसे प्रोजेक्ट्स के लिए कर्ज देता है जिनकी आर्थिक व्यवहार्यता संदिग्ध होती है, लेकिन जो रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होते हैं.
- कर्ज की शर्त यह होती है कि सारा काम चीन की सरकारी कंपनियां ही करेंगी और सारा कच्चा माल भी चीन से आएगा.
- जब देश कर्ज नहीं चुका पाता या कोई विवाद खड़ा होता है, तो चीन वहां की कानूनी और राजनीतिक व्यवस्था में सेंध लगाकर उस प्रोजेक्ट पर पूरा मालिकाना हक हासिल कर लेता है.
- पेरू का उदाहरण दिखाता है कि चीन अब केवल कर्ज नहीं देता, बल्कि वह उन देशों की संस्थाओं को भी इतना कमजोर कर देता है कि वे जांच करने की हिम्मत न जुटा सकें.
चीन का दोहरा चेहरा
चीन के विदेश मंत्रालय ने अमेरिका के इन आरोपों को झूठा और भ्रामक करार दिया है. बीजिंग का दावा है कि वह पेरू की संप्रभुता का सम्मान करता है. लेकिन हकीकत यह है कि कॉस्को जैसी कंपनियां केवल नाम के लिए निजी हैं, असल में उनका रिमोट कंट्रोल बीजिंग के हाथों में होता है. श्रीलंका के हंबनटोटा से लेकर पाकिस्तान के ग्वादर तक, चीन ने हर जगह यही कहानी दोहराई है, पोर्ट बनाओ, कर्ज लादो और फिर उस देश को बेबस कर दो.
ड्रैगन की ‘दहशत’ और दुनिया की चिंता
पेरू का चांके पोर्ट आज उस खतरे का जीता-जागत प्रमाण बन गया है जहां कागजों पर तो विदेशी निवेश और तरक्की दिखती है, लेकिन हकीकत में वह राष्ट्र अपने ही घर में बेगाना हो जाता है. चीन का निवेश कभी भी फ्री नहीं होता, इसकी असल कीमत देश की आजादी और स्वाभिमान गिरवी रखकर चुकानी पड़ती है. पेरू की यह बेबसी उन तमाम देशों के लिए एक अंतिम चेतावनी है जो चीनी पैसों की चमक में अपनी संप्रभुता का सौदा करने को तैयार हैं.





