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Carlo Acutis: 15 वर्षीय कार्लो एक्यूटिस कंप्यूटर जीनियस थे, जो ल्यूकेमिया से मृत्यु के 19 साल बाद संत बने. पोप लियो XIV ने वेटिकन में उन्हें संत घोषित किया.
इस कार्यक्रम में सेंट पीटर स्क्वायर में हजारों युवा शामिल हुए थे.उन्हें ‘इन्फ्लूएंसर ऑफ गॉड’ के नाम से जाना जाता है. उन्हें डिजिटल दुनिया में चर्च के धर्म प्रचार प्रयासों के अग्रणी के रूप में देखा जाता है. अक्सर जींस, टी-शर्ट और स्नीकर्स पहने हुए दिखाए जाने वाले कार्लो एक्यूटिस पुराने संतों से बहुत अलग दिखते हैं. उन्होंने एक भरोसेमंद संत के रूप में युवाओं के बीच वैश्विक स्तर पर लोकप्रियता हासिल है.
उनका संतीकरण पोप लियो XIV की अध्यक्षता में हुआ था. इस कार्यक्रम में सेंट पीटर स्क्वायर में हजारों युवा शामिल हुए थे. रविवार को वेटिकन सिटी में भारी भीड़ जमा हुई और कार्लो एक्यूटिस की तस्वीर वाले बैनर और झंडे लहराए. पोप लियो द्वारा किशोर को संत घोषित किए जाने पर उत्साहित दर्शकों ने तालियां बजाईं. युवा संत का संतत्व ऐसे समय में हुआ जब कैथोलिक चर्च युवा पीढ़ी को जोड़ने के नए तरीके खोज रहा है. क्योंकि पश्चिमी देशों में युवा लोग मुख्यधारा के धर्म से तेजी से विमुख हो रहे हैं. लेकिन हाल के सर्वेक्षण अमेरिका और यूरोप में जनरेशन जेड के बीच कैथोलिक धर्म में रुचि में वृद्धि की ओर इशारा करते हैं.
एक्यूटिस की 2006 में 15 साल की उम्र में ल्यूकेमिया से मृत्यु हो गई थी. उनको एक सामान्य बच्चे के रूप में याद किया जाता है, जिसकी धर्म में गहरी आस्था थी. उनकी मृत्यु के बाद उनकी कहानी तेजी से फैली खासकर युवा कैथोलिकों के बीच. कई लोगों के लिए वे एक आधुनिक प्रतीक बन गए. एक ऐसा व्यक्तित्व जो चर्च में लंबे समय से नहीं था. इसका एक कारण यह भी है कि वेटिकन ने उन्हें किस तरह से पेश किया. किसी दूर-दराज के संत के रूप में नहीं, बल्कि डिजिटल युग के एक ऐसे लड़के के रूप में जिसे कंप्यूटर से प्यार था और जो अपने विश्वासों को साझा करने के लिए उनका इस्तेमाल करता था. एक्यूटिस को इस डिजिटल युग के पहले संत के रूप में याद किया जाता है. साथ ही उनके चमत्कारों की कहानियां आज भी ध्यान आकर्षित करती हैं.
कौन थे कार्लो एक्यूटिस?
कार्लो एक्यूटिस का जन्म 3 मई 1991 को लंदन में एक धनी इतालवी परिवार में हुआ था. उनके पिता एंड्रिया एक्यूटिस शहर के एक बैंक में काम करते थे और बाद में एक इतालवी बीमा कंपनी के चेयरमैन बने. हालांकि कार्लो ने अपना अधिकांश बचपन मिलान में बिताया, जहां वे खेलों, दोस्तों और कंप्यूटर के बीच पले-बढ़े. उनकी मां एंटोनिया साल्जानो ने सीएनएन को बताया कि कार्लो एक सामान्य जीवन जीते थे. उन्हें फुटबॉल बहुत पसंद था, उनका हास्य-बोध बहुत अच्छा था. यहां तक कि उन्होंने अपनी बिल्लियों और कुत्तों के साथ स्टार वार्स शैली की फिल्में भी बनाईं और हर जानवर की आवाजें खुद ही दीं.
दूसरों की मदद करने की भावना
लेकिन साल्जानो ने भी अपने बेटे में बहुत कम उम्र से ही कुछ असामान्यताएं देखीं. उन्होंने एनपीआर से बात करते हुए बताया कि वह उसे अपना ‘छोटा बुद्ध’ कहती थीं. क्योंकि उन्हें लगता था कि उसमें कुछ खास है. हालांकि उनका घर कोई खास धार्मिक नहीं था. वह याद करती हैं कि कार्लो का विकास असाधारण था. साल्जानो ने बताया कि उसने तीन महीने की उम्र में अपने पहले शब्द बोले थे और पांच महीने की उम्र तक वह बोलने लगा था. शिशु होने पर वह अपने नए खिलौने दूसरों को देने की कोशिश करता था, यह कहते हुए कि उसे इतने खिलौनों की जरूरत नहीं है. बड़े होते हुए कार्लो की करुणा साफ दिखाई देने लगी. उसकी मां ने इतालवी अखबार कोरिएरे डेला सेरा को बताया कि उसने अपने माता-पिता से सड़कों पर सो रहे लोगों के लिए कंबल ले जाने को कहा था. वह उन विकलांग सहपाठियों के लिए खड़ा होता था जिन्हें धमकाया जाता था, अपने दोस्तों की उनके माता-पिता के तलाक के दौरान मदद करता था. अक्सर शहर के बेघर लोगों को खाना और स्लीपिंग बैग देता था.
साल्जानो कहती हैं कि सात साल की उम्र तक वह रोजाना प्रार्थना सभा में जाने की जिद करने लगे थे. नौ साल की उम्र में वह कंप्यूटिंग पर विश्वविद्यालय स्तर की किताबें पढ़ रहे थे और खुद को कई कोडिंग भाषाएं सिखा चुके थे. उनकी सबसे प्रसिद्ध तकनीकी विरासत तथाकथित यूचरिस्टिक चमत्कारों के बारे में बनायी गयी उनकी वेबसाइट है, जो लगभग 20 विभिन्न भाषाओं में उपलब्ध है. यह साइट चर्च के इतिहास में यूचरिस्ट से जुड़ी 196 ऐसी घटनाओं के बारे में जानकारी संकलित करती है जो समझ से परे हैं. जैसा कि साल्जानो ने अपने संस्मरण ‘माई सन कार्लो’ में लिखा है 2006 में वे अचानक बीमार पड़ गए और उन्हें ल्यूकेमिया के एक गंभीर रूप का पता चला. इसके तुरंत बाद केवल 15 वर्ष की आयु में उनकी मृत्यु हो गयी.
साल्जानो के लिए यह क्षति बहुत ही विनाशकारी थी. उस समय वह 39 वर्ष की थीं और उन्हें और बच्चे होने की उम्मीद नहीं थी. लेकिन उन्हें सालों बाद एक पल याद आता है जब कार्लो उन्हें सपने में दिखाई दिए. उन्होंने लिखा, “उन्होंने कहा चिंता मत करो, तुम फिर से मां बनोगी.’” एक महीने बाद 43 वर्ष की उम्र में वह जुड़वां बच्चों के साथ गर्भवती हुईं. साल्जानो ने कहा, “यह उसके माता-पिता के लिए उसका उपहार था. हमें हर दिन कार्लो के चमत्कार की खबर मिलती है, किसी के ठीक होने की. तो जाहिर है माता-पिता को भी चमत्कार मिलता है.”
चमत्कार जो एक्यूटिस ने किए
कार्लो एक्यूटिस के संतत्व की राह ब्राजील के एक लड़के से शुरू हुई. बताया जाता है कि पेंक्रियाज की एक दुर्लभ बीमारी से पीड़ित सात साल का एक बच्चा कार्लो की एक टी-शर्ट छूने के बाद ठीक हो गया. जबकि एक पादरी ने उसकी प्रार्थना की. इस रिकवरी की जांच वेटिकन द्वारा की गई और पोप फ्रांसिस द्वारा व्यक्तिगत रूप से अधिकृत किया गया, जिन्होंने इसे चमत्कार घोषित किया. दूसरा मामला कई साल बाद फ्लोरेंस में आया. वेटिकन न्यूज के अनुसार एक विश्वविद्यालय की छात्रा को साइकिल दुर्घटना के बाद मस्तिष्क में ब्लीडिंग हुई. जिसके कारण डॉक्टरों ने उसे गंभीर सिर की चोट बताया. दबाव कम करने के लिए सर्जनों को उसकी खोपड़ी का एक हिस्सा निकालना पड़ा. लेकिन फिर भी उसके बचने की संभावना कम ही दिख रही थी. उसकी मां असीसी में कार्लो की कब्र पर गईं और अपनी बेटी के स्वास्थ्य लाभ के लिए प्रार्थना की. सिर्फ दस दिन बाद स्कैन से पता चला कि मस्तिष्क की चोट गायब हो गई थी. डॉक्टर इस बदलाव का कारण नहीं बता पाए. वेटिकन ने इसे कार्लो का दूसरा चमत्कार माना, जो संत की उपाधि के लिए जरूरी था.
असीसी में दफनाया गया
उनकी मां एंटोनिया साल्जानो ने बताया कि उन्हें असीसी में दफनाया गया ताकि वे सेंट फ्रांसिस के करीब रह सकें, जिनके प्रति वे समर्पित थे. पोप फ्रांसिस का मानना था कि चर्च को कार्लो एक्यूटिस जैसे व्यक्ति की आवश्यकता है जो युवा पीढ़ी से जुड़ सके और डिजिटल युग की चुनौतियों के साथ आस्था की दुनिया को जोड़ने में सक्षम हो. दुनिया भर में उनके अनुयायियों की संख्या तेजी से बढ़ी है और कई युवा कैथोलिक उन्हें एक ऐसे व्यक्ति के रूप में देखते हैं जिसने उनके जैसा ही जीवन जिया. जो लोग असीसी की यात्रा नहीं कर सकते, उनके लिए एक लाइव वेबकैम द्वारा उनकी कब्र पर आगंतुकों की गतिविधियों को देखा जा सकता है. उनकी मां एंटोनिया साल्जानो कहती हैं कि उनका बेटा इंटरनेट के ‘अंधेरे पक्ष’ को जानता था और वीडियो गेम की लत के प्रति सचेत था. इसलिए वह सप्ताह में केवल एक घंटा ही प्लेस्टेशन पर गेम खेलना पसंद करता था.
New Delhi,Delhi
September 09, 2025, 18:18 IST





