जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने आधार कार्ड नंबर और 11 स्वीकृत दस्तावेजों में से किसी एक के साथ दावा फॉर्म जमा करने की अनुमति दी है. राजनीतिक दलों द्वारा 65 लाख बाहर किए गए वोटर्स से जुड़ी आपत्तियां दर्ज न कराने पर आश्चर्य व्यक्त करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बिहार के मुख्य चुनाव अधिकारी को उन्हें अदालती कार्यवाही में शामिल करने का निर्देश दिया है.
सुप्रीम कोर्ट ने पूछा क्या 12 मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल हैं… ये राज्य स्तर के हैं या राष्ट्रीय स्तर के?
सुप्रीम कोर्ट ने फिर कहा- 12 राष्ट्रीय दल हो भी सकते हैं और नहीं भी, लेकिन ये राज्य स्तर के दल हैं. क्या यहाँ कोई दल है?
इस पर वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा- मैं राष्ट्रीय जनता दल की ओर से पेश हो रहा हूं.
सुप्रीम कोर्ट: तो बताइए कि कितने बूथ लेवल एजेंट नियुक्त किए गए हैं और क्या आपको और नियुक्त करने की जरूरत है?
राजनीतिक दलों से क्या मांगी रिपोर्ट?
पीठ ने कहा है कि सभी राजनीतिक दल अगली सुनवाई की तारीख तक उन दावा फॉर्मों की स्थिति रिपोर्ट दाखिल करेंगे, जिन्हें उन्होंने बाहर किए गए वोटर्स द्वारा दाखिल करने में सहायता की थी. अब सुप्रीम कोर्ट इस मामले की सुनवाई 8 सितंबर को सुनवाई करेगा.
पीठ ने चुनाव अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे राजनीतिक दलों के बूथ स्तर के एजेंटों को जो बाहर किए गए मतदाताओं के दावा फॉर्म भौतिक रूप से जमा करते हैं, एक पावती रसीद प्रदान करें. चुनाव आयोग की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने कहा कि अदालत से ECI को 15 दिन का समय देने का आग्रह किया ताकि यह दिखाया जा सके कि कोई बहिष्कार नहीं हुआ है. द्विवेदी ने कहा कि राजनीतिक दल हंगामा कर रहे हैं और चीजें इतनी बुरी नहीं हैं. हम पर विश्वास रखें और हमें कुछ और समय दें. हम आपको दिखा पाएंगे कि कोई बहिष्कार नहीं हुआ है.
आधार को कोर्ट ने दी मंजूरी
ECI ने पीठ को सूचित किया कि मसौदा सूचियों में बाहर किए गए लगभग 85,000 व्यक्तिगत मतदाताओं ने अपने दावा फॉर्म जमा किए हैं और राज्य में SIR अभ्यास के तहत 2 लाख से अधिक नए मतदाताओं ने अपने नाम चुनावी सूचियों में दर्ज कराने के लिए आगे आए हैं. 14 अगस्त को, शीर्ष अदालत ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया कि वह 19 अगस्त तक मसौदा चुनावी सूचियों से बाहर किए गए 65 लाख मतदाताओं का विवरण प्रकाशित करे ताकि मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) में ‘पारदर्शिता’ बढ़ाई जा सके और पहचान प्रमाण के लिए आधार को एक स्वीकृत दस्तावेज के रूप में अनुमति दी जा सके.
यह देखते हुए कि चुनाव आयोग को उसके खिलाफ ‘बनाई जा रही कथा’ को समाप्त करना चाहिए, पीठ ने यह भी आदेश दिया कि विवरण में चल रहे SIR अभ्यास के दौरान उनकी गैर-शामिलगी के कारण शामिल होने चाहिए. बिहार में मतदाता सूची का पुनरीक्षण – 2003 के बाद से पहला – एक बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा कर चुका है. SIR के निष्कर्षों ने बिहार में पंजीकृत 7.9 करोड़ मतदाताओं की कुल संख्या को घटाकर 7.24 करोड़ कर दिया है.





