पटना. जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर ने एक बार नहीं दो बार नहीं सैकड़ों और हजारों बार बोल चुके हैं कि वह बिहार को जाति पॉलिटिक्स से जब तक नहीं निकालेंगे, तब तक दम नहीं लेंगे. पीके की बिहार में हजारों किलोमीटर की यात्रा बीते 2 सालों से चल रही है. पीके हर मीटिंग और रैली में बिहार को पलायन, भ्रष्टाचार, जातिगत पॉलिटिक्स से दूर और रोजागर की बात करते हैं. लेकिन पीके के एक फैसले ने उनकी राजनीति की हवा निकाल दी. दरअसल, गुरुवार को ही पीके ने सासाराम के करगहर सीट से विधानसभा का चुनाव लड़ने का ऐलान किया है.
यह सीट ब्राह्मण बहुल सीट है और यहां से मौजूदा विधायक भी ब्राह्मण ही हैं. ऐसे में सोशल मिडिया पर लोग पीके से सवाल पूछ रहे हैं कि उन्होंने ब्राह्मण बहुल सीट से ही चुनाव लड़ना क्यों चुना? क्या पीके का आदर्श भी लालू यादव के परिवार की तरह एक दिखावा है? लोग सवाल पूछ रहे हैं कि लालू के दोनों लाल तेजस्वी या तेज प्रताप यादव बहुल सीट से ही चुनाव लड़ते हैं. ऐसे में पीके का भी ब्राह्मण बहुल सीट से चुनाव लड़ना क्या गलत मैसेज नहीं दिया है?
पीके ने 24 घंटे पहले ही सासाराम जिले की करगहर विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने का ऐलान किया था. लेकिन यह फैसला उनके ही बयानों के बिल्कुल विपरीत माना जा रहा है. पिछले दो सालों से प्रशांत किशोर अपनी जन सुराज यात्रा के माध्यम से बिहार की हजारों किलोमीटर की दूरी तय कर चुके हैं. इस यात्रा के दौरान उन्होंने बार-बार यह कहा है कि जब तक बिहार को जातिगत राजनीति के चंगुल से नहीं निकालेंगे, तब तक राज्य का विकास संभव नहीं है. वह अपनी हर रैली और मीटिंग में शिक्षा, रोजगार, पलायन और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों को उठाने पर जोर देते रहे हैं.
प्रशांत किशोर ने चुनाव से पहले बड़ा ऐलान किया है.
पीके का दांव कहीं उल्टा न पड़ जाए?
लेकिन गुरुवार को उनके करगहर से चुनाव लड़ने के ऐलान ने उनकी तमाम कोशिशों पर पानी फेर दिया. करगहर एक ब्राह्मण बहुल सीट है और मौजूदा विधायक भी इसी समुदाय से हैं. सोशल मीडिया पर लोग लगातार पीके से सवाल पूछ रहे हैं कि जिस
जातिगत राजनीति के खिलाफ वह मोर्चा खोले हुए थे, क्या अब उन्होंने खुद ही उसी का सहारा ले लिया है? लोग उन्हें लालू प्रसाद यादव के परिवार से तुलना कर रहे हैं. लालू के दोनों बेटे, तेजस्वी और तेज प्रताप भी यादव बहुल सीटों से ही चुनाव लड़ते रहे हैं. ऐसे में पीके का एक ब्राह्मण बहुल सीट से चुनाव लड़ना क्या गलत संदेश नहीं देता?
क्या कहते हैं राजनीतिक विश्लेषक?
राजनीतिक विश्लेषक संजीव पांडेय कहते हैं, ‘पीके का यह फैसला उनकी रणनीति का हिस्सा हो सकता है, लेकिन यह उनकी छवि के लिए एक बड़ा झटका है. एक ओर जहां वह खुद को एक आदर्शवादी नेता के रूप में पेश करते थे जो सभी जातियों को एक साथ लाना चाहता है. वहीं दूसरी ओर उनके इस कदम ने उन पर एक ही जाति को साधने का आरोप लगा दिया है. हालांकि, पीके के समर्थकों का तर्क है कि उनके लिए यह सीट उनकी ‘जन्मभूमि’ है और वह अक्सर बोलते हैं कि या तो कर्मभूमि से चुनाव लड़ना चाहिए या जन्मभूमि से. लेकिन पीके बदलालव की बात करते हैं तो उनको बचना चाहिए. मेरी समझ से उनको चुनाव लड़ने से ज्यादा अपने वसूलों को जिंदा रखने के लिए राजनीति करनी चाहिए.’
क्या पीके सभी जाति के नेता बनने से चूक गए?
जन सुराज का तर्क क्या है?
जन सुराज से जुड़ें लोगों के तर्क में भी दम है. क्योंकि, करगहर सीट का जातीय समीकरण केवल ब्राह्मणों तक सीमित नहीं है. यहां कुर्मी, कोइरी और अनुसूचित जाति के मतदाता भी निर्णायक भूमिका में हैं. पीके का यह कदम न केवल ब्राह्मणों को आकर्षित कर सकता है, बल्कि यह भी संकेत देता है कि वह यादव और राजपूत जैसे अन्य समुदायों के वोटों में भी सेंध लगाना चाहते हैं. उनकी यह रणनीति पारंपरिक दलों जैसे बीजेपी और आरजेडी के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकती है, जो इन समुदायों के वोटों पर निर्भर रहते हैं.
कुलमिलाकर पीके की राजनीति हमेशा लीक से हटकर रही है, लेकिन इस बार उनका यह कदम उनके ही सिद्धांतों के खिलाफ जा रहा है. उनकी यात्रा का उद्देश्य एक नए राजनीतिक विकल्प का निर्माण करना था जो जाति और धर्म की राजनीति से ऊपर हो. लेकिन करगहर जैसे जातीय गढ़ से चुनाव लड़ने का फैसला यह सवाल खड़ा करता है कि क्या पीके भी बिहार की राजनीति की उसी दलदल में फंस गए हैं, जिस दलदल से वह निकालने की बात बीते दो-तीन सालों से कर रहे हैं?