विदेश » दुनिया का वो देश जहां नमाज नहीं पढ़ने पर पहुंच जाएंगे जेल या भरिए जुर्माना, क्या है कानून

दुनिया का वो देश जहां नमाज नहीं पढ़ने पर पहुंच जाएंगे जेल या भरिए जुर्माना, क्या है कानून

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वैसे तो दुनिया के कई मुस्लिम देशों में नमाज पढ़ने को लेकर काफी कड़ाई रहती है. इसे लेकर सख्त नियम हैं. कुछ देशों में हालांकि अब इनमें ढील दी जा रही है लेकिन एक देश अब भी ऐसा है, जहां अगर जुमे के दिन मस्जिद में नमाज पढ़ने नहीं गए तो जेल जाने से कोई नहीं रोक सकेगा. जुर्माना अलग भरना होगा.

ये काम मलेशिया में हो रहा है. वहां के तेरेंगानु राज्य ने बिना किसी वैध कारण के मस्जिद में शुक्रवार की नमाज़ न पढ़ने वाले लोगों को दो साल तक की जेल की सजा देने की धमकी दी है. इस सप्ताह ये नियम वहां लागू हो गए हैं. वहां पर शरिया कानून के तहत पहली बार अपराध करने वालों को दो साल तक की कैद और 3,000 रिंगित (करीब 61000 रुपए) का जुर्माना या दोनों हो सकता है.

इससे पहले वहां लगातार तीन शुक्रवार की नमाज़ नहीं पढ़ने वालों को अधिकतम छह महीने की जेल या 1,000 रिंगित (करीब 20000 रुपए) तक का जुर्माना होता था.

धार्मिक गश्ती दल रिपोर्ट बनाएगा कौन नहीं आया

नमाजियों को मस्जिद के साइनबोर्ड के माध्यम से नियमों की याद दिलाई जाएगी, जबकि नियमों को लागू करने के लिए जनता और धार्मिक गश्ती दल की मदद ली जाएगी. जिसके जरिए तेरेंगानु इस्लामिक मामलों का विभाग रिपोर्ट जारी करेगा. मलेशिया में हर राज्य धार्मिक मामलों में अपना कानून बना सकता है.

यह कानून यहां पहली बार 2001 में लागू किया गया था. 2016 में इसमें संशोधन किया गया. ताकि रमजान का सम्मान न करने और सार्वजनिक रूप से महिलाओं को परेशान करने जैसे अपराधों के लिए अधिक कठोर दंड का प्रावधान किया जा सके.

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दोहरी कानूनी व्यवस्था

मुस्लिम बहुल मलेशिया में दोहरी कानूनी व्यवस्था है, यहां इस्लाम आधिकारिक धर्म है, लेकिन नागरिक कानून के साथ-साथ चलता है. शरिया अदालतें मुसलमानों के निजी और पारिवारिक मामलों पर अधिकार रखती हैं, जो देश की 3.4 करोड़ की आबादी का लगभग दो-तिहाई हिस्सा हैं. वहां बड़ी संख्या में चीनी और भारतीय अल्पसंख्यक भी रहते हैं.

जिस पार्टी ने तेरेंगानु में ये नियम लागू किया है वो मलेशिया की संसद में सबसे बड़ी पार्टी और देश के 13 राज्यों में से चार में सत्तारूढ़ पार्टी है. वो लंबे समय से कठोर धार्मिक दंड की वकालत करती रही है.

धार्मिक कर्तव्य मानी जाती है नमाज़

ज़्यादातर मुस्लिम बहुल देशों में नमाज़ (सलात) को धार्मिक कर्तव्य माना जाता है, लेकिन कानूनन सज़ा देना या जेल याजुर्माना लगाना बहुत ही कम देशों में होता है.

सऊदी अरब में अब कुछ ढील

सऊदी अरब में धार्मिक पुलिस मुतावा पहले दुकानों, दफ्तरों और बाज़ारों को अज़ान होते ही बंद करवा देती थी और लोगों को मस्जिद भेजा जाता था. हालांकि 2016 के बाद से धार्मिक पुलिस की ताक़त कम कर दी गई लेकिन फिर भी सार्वजनिक जगहों पर नमाज़ छोड़ने पर लोगों को पुलिस रोक सकती है या जुर्माना लगा सकती है.

ईरान में नौकरी चली जाती है

ईरान में नमाज़ पढ़ना कानूनी रूप से अनिवार्य है, खासकर सरकारी दफ्तरों, स्कूलों और फौज में. अगर कोई लगातार नमाज़ न पढ़े तो नौकरी से निकाला जा सकता है, और कुछ मामलों में सज़ा भी हो सकती है, इसमें जुर्माना और हिरासत दोनों है.

अफ़ग़ानिस्तान में जरूरी है

तालिबान की सरकार में नमाज़ छोड़ने वालों पर सीधा दबाव डाला जाता है. दुकानदारों और राहगीरों को नमाज़ के वक्त मस्जिद जाना जरूरी है. तालिबान की धार्मिक पुलिस पकड़कर सज़ा दे सकती है , जिसमें मारपीट, हिरासत या जुर्माना कुछ भी हो सकता है.सूडान में अब कुछ ढील है.

कतर में सामाजिक दबाव ज्यादा

क़तर और कुछ खाड़ी देशों में दुकानों को नमाज़ के समय बंद करना पड़ता है, लेकिन व्यक्तिगत तौर पर नमाज़ न पढ़ने पर सीधे जेल नहीं होती, बस सामाजिक दबाव बहुत है. मॉरिटानिया, सोमालिया में इस्लामी क़ानून के तहत नमाज़ न पढ़ना अपराध माना जा सकता है, लेकिन रोज़मर्रा में यह बहुत सख़्ती से लागू नहीं होता.

वे मुस्लिम देश जहां नमाज सबसे पढ़ी जाती है

कजाखस्तान – ये देश पूर्व सोवियत संघ का हिस्सा रहा है, जहां धर्म पर प्रतिबंध लगा दिया गया. आज भी समाज काफी हद तक धर्मनिरपेक्ष है.
अल्बानिया – यूरोप में एक और देश जिसमें कम्युनिस्ट शासन के दौरान धर्म पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया गया था. आज भी समाज बहुत धर्मनिरपेक्ष है.
तुर्की – खासतौर पर बड़े शहरों (इस्तांबुल, अंकारा) और मध्यम वर्ग के बीच, धर्मनिरपेक्षता ज्यादा है. ग्रामीण इलाकों में धार्मिक प्रथाएं अब भी बहुत कॉमन हैं.
बोस्निया और हर्जेगोविना – यहां भी एक धर्मनिरपेक्ष परंपरा है.
पीयू रिसर्च के अनुसार, कजाखस्तान जैसे देशों में, केवल करीब 40-50% लोगों ने कहा कि धर्म उनके जीवन में “बहुत महत्वपूर्ण” है.

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