ये काम मलेशिया में हो रहा है. वहां के तेरेंगानु राज्य ने बिना किसी वैध कारण के मस्जिद में शुक्रवार की नमाज़ न पढ़ने वाले लोगों को दो साल तक की जेल की सजा देने की धमकी दी है. इस सप्ताह ये नियम वहां लागू हो गए हैं. वहां पर शरिया कानून के तहत पहली बार अपराध करने वालों को दो साल तक की कैद और 3,000 रिंगित (करीब 61000 रुपए) का जुर्माना या दोनों हो सकता है.
धार्मिक गश्ती दल रिपोर्ट बनाएगा कौन नहीं आया
नमाजियों को मस्जिद के साइनबोर्ड के माध्यम से नियमों की याद दिलाई जाएगी, जबकि नियमों को लागू करने के लिए जनता और धार्मिक गश्ती दल की मदद ली जाएगी. जिसके जरिए तेरेंगानु इस्लामिक मामलों का विभाग रिपोर्ट जारी करेगा. मलेशिया में हर राज्य धार्मिक मामलों में अपना कानून बना सकता है.

दोहरी कानूनी व्यवस्था
जिस पार्टी ने तेरेंगानु में ये नियम लागू किया है वो मलेशिया की संसद में सबसे बड़ी पार्टी और देश के 13 राज्यों में से चार में सत्तारूढ़ पार्टी है. वो लंबे समय से कठोर धार्मिक दंड की वकालत करती रही है.
धार्मिक कर्तव्य मानी जाती है नमाज़

सऊदी अरब में अब कुछ ढील
ईरान में नौकरी चली जाती है
ईरान में नमाज़ पढ़ना कानूनी रूप से अनिवार्य है, खासकर सरकारी दफ्तरों, स्कूलों और फौज में. अगर कोई लगातार नमाज़ न पढ़े तो नौकरी से निकाला जा सकता है, और कुछ मामलों में सज़ा भी हो सकती है, इसमें जुर्माना और हिरासत दोनों है.
अफ़ग़ानिस्तान में जरूरी है
कतर में सामाजिक दबाव ज्यादा
क़तर और कुछ खाड़ी देशों में दुकानों को नमाज़ के समय बंद करना पड़ता है, लेकिन व्यक्तिगत तौर पर नमाज़ न पढ़ने पर सीधे जेल नहीं होती, बस सामाजिक दबाव बहुत है. मॉरिटानिया, सोमालिया में इस्लामी क़ानून के तहत नमाज़ न पढ़ना अपराध माना जा सकता है, लेकिन रोज़मर्रा में यह बहुत सख़्ती से लागू नहीं होता.
वे मुस्लिम देश जहां नमाज सबसे पढ़ी जाती है
कजाखस्तान – ये देश पूर्व सोवियत संघ का हिस्सा रहा है, जहां धर्म पर प्रतिबंध लगा दिया गया. आज भी समाज काफी हद तक धर्मनिरपेक्ष है.
अल्बानिया – यूरोप में एक और देश जिसमें कम्युनिस्ट शासन के दौरान धर्म पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया गया था. आज भी समाज बहुत धर्मनिरपेक्ष है.
तुर्की – खासतौर पर बड़े शहरों (इस्तांबुल, अंकारा) और मध्यम वर्ग के बीच, धर्मनिरपेक्षता ज्यादा है. ग्रामीण इलाकों में धार्मिक प्रथाएं अब भी बहुत कॉमन हैं.
बोस्निया और हर्जेगोविना – यहां भी एक धर्मनिरपेक्ष परंपरा है.
पीयू रिसर्च के अनुसार, कजाखस्तान जैसे देशों में, केवल करीब 40-50% लोगों ने कहा कि धर्म उनके जीवन में “बहुत महत्वपूर्ण” है.





