टोक्यो: जापान के टॉप जनरल उचिकुरा हिरोआकी पिछले दिनों मीडिया के सामने थे. जब उनसे लॉन्ग रेंज मिसाइलों की तैनाती पर जनता की चिंता के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने इसे बेहद हल्के में लेते हुए कहा कि इसके फायदे चिंताओं से कहीं ज्यादा बड़े हैं. जनरल का यह बयान सीधा बीजिंग को एक कड़ा संदेश था कि जापान अब रक्षात्मक मुद्रा से बाहर निकल चुका है. जापान की नई ‘काउंटरस्ट्राइक कैपेबिलिटी’ डॉक्ट्रिन के तहत अब वह दुश्मन के ठिकानों पर हमला करने की क्षमता रखता है. ये मिसाइलें 1,000 किलोमीटर से ज्यादा की दूरी तक मार कर सकती हैं, जिसका मतलब है कि चीन का मुख्य हिस्सा अब जापान की सीधी जद में है. जापान की रक्षा नीति में आया यह बदलाव जमीन पर भी दिख रहा है. जापान ने साल 2031 तक योनागुनी द्वीप पर मिसाइलें तैनात करने की पुष्टि की है, जो ताइवान से महज 110 किलोमीटर दूर है.
प्रधानमंत्री साने ताकाइची ने तो यहां तक कह दिया है कि ताइवान पर चीनी हमला जापान की सैन्य प्रतिक्रिया को दावत दे सकता है. यह किसी भी जापानी नेता द्वारा दिया गया अब तक का सबसे सीधा और आक्रामक बयान है. इन गतिविधियों ने पूरे इलाके में तनाव को चरम पर पहुंचा दिया है और चीन इसे जापान के सैन्यवाद का पुनर्जन्म मान रहा है.
चीन ने जापान की 40 कंपनियों पर बैन क्यों लगाया?
चीन का उद्देश्य जापान को उन महत्वपूर्ण कच्चे माल और टेक्नोलॉजी से दूर करना है, जो डिफेंस इलेक्ट्रॉनिक्स और सेमीकंडक्टर बनाने में काम आते हैं.
चीनी मीडिया इसे ‘कंट्रोल्ड डिकपलिंग’ कह रहा है, जिसका सीधा मतलब है कि वह धीरे-धीरे जापान पर अपनी निर्भरता खत्म करना चाहता है. चीन ने जापान से समुद्री भोजन का आयात पहले ही रोक दिया था और अब पांडा वापस लेकर अपने कड़े तेवर दिखा दिए हैं.
अमेरिका के ‘गोल्डन डोम’ प्रोजेक्ट में जापान की क्या भूमिका है?
जापान केवल अपनी मिसाइलें ही नहीं बना रहा, बल्कि वह अमेरिका के महत्वाकांक्षी ‘गोल्डन डोम’ मिसाइल डिफेंस सिस्टम में भी शामिल होने जा रहा है. पीएम ताकाइची 19 मार्च को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से मिलकर इसकी आधिकारिक घोषणा कर सकती हैं.
ट्रंप से मुलाकात के दौरान ‘गोल्डन डोम’ प्रोजेक्ट में शामिल होने का ऐलान कर सकती हैं जापान की पीएम. (File Photo : Reuters)
यह प्रोजेक्ट अंतरिक्ष आधारित तकनीक का उपयोग करके दुश्मन की मिसाइलों को ट्रैक और नष्ट करने के लिए बनाया गया है. जापान को उम्मीद है कि इस तकनीक से वह चीन और रूस द्वारा विकसित किए जा रहे हाइपरसोनिक हथियारों का मुकाबला कर पाएगा.
इसके अलावा, अमेरिका चाहता है कि जापान मिसाइलों का उत्पादन तेज करे ताकि यूक्रेन और मध्य पूर्व में खत्म हो रहे अमेरिकी हथियारों के स्टॉक की भरपाई की जा सके.
क्युशू में टाइप-12 मिसाइलों की तैनाती से क्या बदलेगा?
- जापान इसी महीने अपने दक्षिणी द्वीप क्युशू में अपग्रेड की गई टाइप-12 सरफेस टू शिप मिसाइलें तैनात करने जा रहा है.
- इन मिसाइलों की रेंज पहले के मुकाबले दस गुना बढ़कर 620 मील हो गई है.
- कैंप केंगून पर होने वाली यह तैनाती चीन के तटवर्ती इलाकों और उत्तर कोरिया तक पहुंच सकती है.
सुरक्षा विश्लेषकों का मानना है कि यह जापान की अपनी शांतिवादी छवि को बदलकर एक प्रोएक्टिव डिफेंस वाली शक्ति बनने की दिशा में बड़ा कदम है.
अमेरिका, फिलीपींस और जापान मिलकर अब ‘फर्स्ट आइलैंड चेन’ की सुरक्षा मजबूत कर रहे हैं ताकि चीनी नौसेना के दबदबे को समुद्र में ही रोका जा सके.
क्या स्थानीय विरोध जापान की सैन्य रफ्तार को रोक पाएगा?
जापान सरकार जहां युद्ध स्तर पर तैयारी कर रही है, वहीं कुमामोटो जैसे इलाकों में स्थानीय लोग इस तैनाती का विरोध कर रहे हैं. लोगों का आरोप है कि सरकार ने उनकी सहमति लिए बिना और बिना किसी पब्लिक टाउन हॉल मीटिंग के ये फैसले लिए हैं. लोगों को डर है कि युद्ध की स्थिति में उनके इलाके सबसे पहले दुश्मन के निशाने पर होंगे.
विरोध के बावजूद जापान पीछे हटने को तैयार नहीं है और कैंप फुजी जैसे अन्य ठिकानों पर भी नई यूनिट्स भेजने की तैयारी पूरी कर ली गई है. जापान की यह रेस अब रुकने वाली नहीं है और ताइवान इस पूरी खींचतान का केंद्र बना हुआ है.





