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एर्दोगन ने यूएन में एक बार फिर कश्मीर का जिक्र किया है, इससे पहले भी तुर्की कर बार यह मुद्दा उठा चुका है, जबकि वह खुद कई देशों की जमीन पर कब्जा किए है.
तुर्किये के राष्ट्रपति रजब तैयब एर्दोआन. (फाइल फोटो)संयुक्त राष्ट्र महासभा UNGA के 80 वें सत्र में एक बार फिर तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैय्यप एर्दोगन ने कश्मीर का जिक्र किया है. एर्दोगन ने भारत और पाकिस्तान से अपील की है कि दोनों देश आतंकवाद के खिलाफ सहयोग बढ़ाएं और कश्मीर को यूएनएससी के प्रस्तावों के आधार पर बातचीत से ही हल करें. यह बयान ठीक ऐसे समय में आया है, जब पहलगाम हमले के बाद ऑपरेशन सिंदूर के दौरान तुर्की ने पाक का खुलकर साथ दिया था.
कश्मीर पर एर्दोगन ने क्या कहा?
एर्दोगन ने न्यूयॉर्क में यूएनजीए को संबोधित करते हुए साउथ एशिया पर बात की, उन्होंने कहा कि ‘हम कश्मीर मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों और हमारे कश्मीरी भाइयों-बहनों की इच्छा के हिसाब से संवाद से हल करने की वकालत करते हैं.’एर्दोगन यही नहीं रुके, उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच हाल के युद्धविराम का स्वागत किया और कहा कि आतंकवाद के खिलाफ सहयोग बढ़ाना जरूरी है.
यूएन में कब कब उठा कश्मीर मुद्दा
कश्मीर विवाद 1947 के भारत-पाकिस्तान बंटवारे से शुरू हुआ था. जब जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरि सिंह ने भारत के साथ विलय पर सहमति दी थी, लेकिन पाकिस्तान ने जबरन इसे कब्जाने की कोशिश की थी. भारत ने 1948 में यूएन में शिकायत की. यूएनएससी ने प्रस्ताव 47 (1948) पास किया, जिसमें जनमत संग्रह (प्लेबिसाइट) का जिक्र था, लेकिन शर्त ये थी, कि पाकिस्तान कब्जे वाले इलाके से अपनी सेना हटाए और भारत न्यूनतम सेना रखे. हालांकि 1972 के बाद भारत इसे द्विपक्षीय मुद्दा मानने लगा. भारत कई बार ये साफ कर चुका है कि कश्मीर उसका आंतरिक मामला है.
भारत ने दी प्रतिक्रिया
एर्दोगन क्यों उठाते हैं कश्मीर मुद्दा?
एर्दोगन कई बार अपनी नियो ऑटोमनवाद नीति का जिक्र कर चुके हैं, इसे और मजबूत बनाने के लिए वह वह लगातार मुस्लिम देशों के मुद्दे उठाते हैं. इसके अलावा तुर्की के पाकिस्तान से मजबूत संबंध हैं, दोनों देश सैन्य, आर्थिक और सांस्कृतिक संबंधों का आदान प्रदान करते हैं. इसी तरह वह मध्य पूर्व में फिलिस्तीन और अन्य मुस्लिम देशों के लिए लगातार मुद्दे उठाते रहते हैं.
एर्दोगन ने किन देशों पर कर रखा है कब्जा
उत्तरी साइप्रस: 1974 में ग्रीक समर्थित तख्तापलट के बाद तुर्की ने साइप्रस के उत्तरी हिस्से पर कब्जा कर लिया था, तब से 30 हजार तुर्की सैनिक वहां तैनात हैं. संयुक्त राष्ट्र इसे तुर्की का ‘कब्जा‘ मानता है, जबकि तुर्की इसे सुरक्षा मिशन कहता है. यूरोपीय संघ और अंतरराष्ट्रीय संगठन इसे अवैध बताते हैं. स्थानीय ग्रीक समुदाय और साइप्रस सरकार लगातार इसका विरोध कर रहे हैं.
इराक: उत्तरी ईराक, जहां कुर्द क्षेत्र हैं वहां पर तुर्की की सेना मौजूद है. यहां तुर्की के 41 सैन्य बेस हैं और 25 किमी अंदर तक के इलाके पर कब्जा है, यहां तुर्की अलगाववादी संगठन पीकेके के खिलापु अभियान के नाम पर कब्जा किए हुए हैं. 2021 में तुर्की ने यहां नई चौकियां भी स्थापित कीं.
September 24, 2025, 13:59 IST
संयुक्त राष्ट्र महासभा UNGA के 80 वें सत्र में एक बार फिर तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैय्यप एर्दोगन ने कश्मीर का जिक्र किया है. एर्दोगन ने भारत और पाकिस्तान से अपील की है कि दोनों देश आतंकवाद के खिलाफ सहयोग बढ़ाएं और कश्मीर को यूएनएससी के प्रस्तावों के आधार पर बातचीत से ही हल करें. यह बयान ठीक ऐसे समय में आया है, जब पहलगाम हमले के बाद ऑपरेशन सिंदूर के दौरान तुर्की ने पाक का खुलकर साथ दिया था.
कश्मीर पर एर्दोगन ने क्या कहा?
एर्दोगन ने न्यूयॉर्क में यूएनजीए को संबोधित करते हुए साउथ एशिया पर बात की, उन्होंने कहा कि ‘हम कश्मीर मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों और हमारे कश्मीरी भाइयों-बहनों की इच्छा के हिसाब से संवाद से हल करने की वकालत करते हैं.’एर्दोगन यही नहीं रुके, उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच हाल के युद्धविराम का स्वागत किया और कहा कि आतंकवाद के खिलाफ सहयोग बढ़ाना जरूरी है.
यूएन में कब कब उठा कश्मीर मुद्दा
कश्मीर विवाद 1947 के भारत-पाकिस्तान बंटवारे से शुरू हुआ था. जब जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरि सिंह ने भारत के साथ विलय पर सहमति दी थी, लेकिन पाकिस्तान ने जबरन इसे कब्जाने की कोशिश की थी. भारत ने 1948 में यूएन में शिकायत की. यूएनएससी ने प्रस्ताव 47 (1948) पास किया, जिसमें जनमत संग्रह (प्लेबिसाइट) का जिक्र था, लेकिन शर्त ये थी, कि पाकिस्तान कब्जे वाले इलाके से अपनी सेना हटाए और भारत न्यूनतम सेना रखे. हालांकि 1972 के बाद भारत इसे द्विपक्षीय मुद्दा मानने लगा. भारत कई बार ये साफ कर चुका है कि कश्मीर उसका आंतरिक मामला है.
भारत ने दी प्रतिक्रिया
एर्दोगन क्यों उठाते हैं कश्मीर मुद्दा?
एर्दोगन कई बार अपनी नियो ऑटोमनवाद नीति का जिक्र कर चुके हैं, इसे और मजबूत बनाने के लिए वह वह लगातार मुस्लिम देशों के मुद्दे उठाते हैं. इसके अलावा तुर्की के पाकिस्तान से मजबूत संबंध हैं, दोनों देश सैन्य, आर्थिक और सांस्कृतिक संबंधों का आदान प्रदान करते हैं. इसी तरह वह मध्य पूर्व में फिलिस्तीन और अन्य मुस्लिम देशों के लिए लगातार मुद्दे उठाते रहते हैं.
एर्दोगन ने किन देशों पर कर रखा है कब्जा
उत्तरी साइप्रस: 1974 में ग्रीक समर्थित तख्तापलट के बाद तुर्की ने साइप्रस के उत्तरी हिस्से पर कब्जा कर लिया था, तब से 30 हजार तुर्की सैनिक वहां तैनात हैं. संयुक्त राष्ट्र इसे तुर्की का ‘कब्जा‘ मानता है, जबकि तुर्की इसे सुरक्षा मिशन कहता है. यूरोपीय संघ और अंतरराष्ट्रीय संगठन इसे अवैध बताते हैं. स्थानीय ग्रीक समुदाय और साइप्रस सरकार लगातार इसका विरोध कर रहे हैं.
इराक: उत्तरी ईराक, जहां कुर्द क्षेत्र हैं वहां पर तुर्की की सेना मौजूद है. यहां तुर्की के 41 सैन्य बेस हैं और 25 किमी अंदर तक के इलाके पर कब्जा है, यहां तुर्की अलगाववादी संगठन पीकेके के खिलापु अभियान के नाम पर कब्जा किए हुए हैं. 2021 में तुर्की ने यहां नई चौकियां भी स्थापित कीं.
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