गवरी उत्सव के दो प्रमुख पात्र हैं- बुडिया, जो भगवान शिव का प्रतीक माने जाते हैं, और राई, जिन्हें देवी पार्वती और शक्ति का स्वरूप माना जाता है. इन दोनों के अभिनय में धार्मिक भावनाओं के साथ-साथ मनोरंजन का भी भरपूर मिश्रण देखने को मिलता है.
लोकनाट्य का स्वरूप और पारंपरिक पात्र
गवरी में 40 से 50 तरह के पारंपरिक स्वांग रचे जाते हैं. इनमें शंकर्या, मीणा, बंजारा, नट, कालबेलिया, फत्ता-फत्ती, खेतू, देवर-भौजाई, बनिया, पुलिस जैसे पात्र शामिल होते हैं. ये पात्र सामाजिक व्यंग्य, हास्य और लोककथाओं का सुंदर मेल प्रस्तुत करते हैं. प्रत्येक प्रस्तुति की शुरुआत और समापन ‘घाई’ नामक समूह नृत्य से होती है, जो पृथ्वी की परिक्रमा का प्रतीक है और पूरे आयोजन को धार्मिक ऊर्जा से भर देता है.
‘गवरी’ शब्द की उत्पत्ति और सांस्कृतिक विस्तार
माना जाता है कि ‘गवरी’ शब्द ‘गहवरी’ से निकला है, जो पृथ्वी के 38 नामों में से एक है. इस प्रकार गवरी केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि प्रकृति और धरती माता के प्रति सम्मान का प्रतीक भी है. गवरी का मंचन गांव-गांव जाकर खुले स्थानों, चौराहों और मंदिरों के पास किया जाता है, जिससे हर वर्ग का व्यक्ति इस उत्सव से जुड़ सके.
गवरी के दिनों में ग्रामीण ही नहीं, बल्कि शहरी क्षेत्रों के लोग भी बड़ी संख्या में इसे देखने के लिए जुटते हैं. यह मेवाड़ के लिए सिर्फ एक सांस्कृतिक आयोजन नहीं, बल्कि आस्था, एकता और अनुशासन का जीवंत उदाहरण है. भील समुदाय की यह परंपरा आज भी अपनी मौलिकता और गरिमा के साथ लोगों को जोड़ती है और आने वाली पीढ़ियों के लिए सांस्कृतिक धरोहर के रूप में जीवित है.
रिपोर्ट: कपिल श्रीमाली





