अमिताभ के पिता दिवंगत डॉ. हरिवंश राय बच्चन के मुताबिक गांधी-बच्चन परिवार के बीच रिश्तों की शुरुआत इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में नेहरू-गांधी परिवार के पुश्तैनी घर ‘आनंद भवन’ से हुई थी. सरोजिनी नायडू ने हरिवंश राय और तेजी को आनंद भवन में आमंत्रित किया था. हरिवंश राय ने अपनी आत्मकथा में इसे याद करते हुए लिखा था, ‘यहीं पर तेजी और इंदिरा के बीच घनिष्ठ और आजीवन मित्रता की शुरुआत हुई. श्रीमती नायडू ने इंदिरा के समक्ष हम दोनों की जोड़ी का परिचय ‘कवि और कविता’ के रूप में दिया था. इंदिरा को ये शब्द अरसे तक याद रहे और जब भी वे तेजी को अपने विदेशी मेहमानों से मिलवातीं तो इसका जिक्र करना नहीं भूलती थीं.’
सोनिया 13 जनवरी 1968 को भारत आई थीं. बारह दिन बाद सोनिया और राजीव की एक सादे समारोह में सगाई हो गई. लेकिन शादी में अभी वक्त था और इसलिए इंदिरा नहीं चाहती थीं कि वह नेहरू-गांधी परिवार की भावी बहू के रूप में अभी उनके साथ रहें. उन्हें किसी होटल में भी नहीं ठहराया जा सकता था. इस पर इंदिरा के सहयोगी तथा विश्वासपात्र टी.एन. कौल और पारिवारिक दोस्त मोहम्मद यूनुस ने सुझाव दिया कि सोनिया को शादी होने तक तेजी बच्चन के यहां रहना चाहिए. इस सुझाव पर राजीव, संजय, अमिताभ और अजिताभ बच्चन ने तुरंत मोहर लगा दी. इस तरह तेजी का आवास एक तरह से भारत में सोनिया का पहला घर बना. शादी में मेहंदी जैसी कुछ रस्में बच्चन के घर पर ही आयोजित की गई थीं. हरिवंश राय बच्चन और तेजी ने गाने गाए थे. अमिताभ ने भी अपने पिता द्वारा रचित हास्य गीत गुनगुनाए थे. शादी के लिए सोनिया की मां पाओला इटली से आई थीं, लेकिन हिंदू विवाह समारोह की रस्मों में मां की भूमिका तेजी ने ही निभाई थीं.
आपातकाल की रैली में शामिल होने से कर दिया था इनकार
बेहतरीन कलाकार थीं, नेहरू भी अभिनय देखने पहुंच गए थे थिएटर
लेखिका और पत्रकार प्रोमिला कल्हण के बच्चन परिवार के साथ काफी नजदीकी संबंध रहे हैं. वे अपनी किताब में बताती हैं कि तेजी बच्चन एक बेहतरीन गायिका और थिएटर आर्टिस्ट थीं. दिल्ली और इलाहाबाद में उन्होंने कई ग्रुपों के साथ परफॉर्म किया था. शादी के बाद उन्होंने शेक्सपियर के एक नाटक पर अभिनय किया था, जिसका अनुवाद उनके पति ने ही किया था. उस समय प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू अचानक ही शेक्सपियर के ‘ओथेलो’ के हिंदी संस्करण में उनका अभिनय देखने पहुंच गए थे. नई दिल्ली के थिएटर हॉल में जब नाटक का मंचन चल रहा था, तभी नेहरू अपने सचिव के साथ चुपचाप वहां पहुंचे और पीछे की सीट पर बैठ गए. हालांकि यह राज ज्यादा देर तक छिप नहीं सका. मंच से ही तेजी बच्चन ने प्रधानमंत्री से आगे की सीट पर आकर बैठने का आग्रह किया.
खालिद मोहम्मद की किताब ‘टु बी ऑर नॉट टु बी’ में अमिताभ ने अपने माता-पिता के अंतरजातीय विवाह की तुलना इंदिरा-फिरोज गांधी की शादी के साथ करते हुए इस पर और विस्तार से प्रकाश डाला है, “एक सिख लड़की एक कायस्थ लड़के से शादी करे, यह बात उनके पिता (मेरे नाना) को मंजूर नहीं थी. यह इलाहाबाद के लिए पहली अंतरजातीय शादी थी. यह एक तरह से फिरोज और इंदिरा की शादी की तरह थी. मां बेहद खूबसूरत थीं. जैसा कि मुझे बताया गया, विजयलक्ष्मी पंडित की बेटियां नयनतारा और चंद्रलेखा तो यह सुनकर बेइंतहा खुश हो गई थीं कि मां उनसे मिलने आनंद भवन आ रही हैं. मां को लाहौर की खूबसूरती व अदब की प्रतिमूर्ति कहा जाता था.’





