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तेजी बच्चन: जिनका नाटक देखने चुपचाप थिएटर पहुंच गए थे पंडित नेहरू, सोनिया गांधी के लिए थीं ‘तीसरी मां’

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विख्यात हिंदी कवि हरिवंश राय बच्चन की पत्नी और सुप्रसिद्ध हिंदी फिल्म अभिनेता अमिताभ बच्चन की मां, किसी महिला के लिए इससे बड़ी पहचान और क्या हो सकती है! लेकिन तेजी बच्चन की पहचान इतने भर तक सीमित नहीं रही. उनकी अपनी एक अलहदा शख्सियत रही. वे देश के दो विख्यात परिवारों (नेहरू-गांधी और बच्चन) के बीच तीन पीढ़ियों के रिश्ते की सबसे मजबूत डोर रहीं. खासकर सोनिया गांधी के साथ उनका रिश्ता सबसे खास रहा. इतना खास कि सोनिया उन्हें अपनी तीसरी मां कहती थीं.

अमिताभ के पिता दिवंगत डॉ. हरिवंश राय बच्चन के मुताबिक गांधी-बच्चन परिवार के बीच रिश्तों की शुरुआत इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में नेहरू-गांधी परिवार के पुश्तैनी घर ‘आनंद भवन’ से हुई थी. सरोजिनी नायडू ने हरिवंश राय और तेजी को आनंद भवन में आमंत्रित किया था. हरिवंश राय ने अपनी आत्मकथा में इसे याद करते हुए लिखा था, ‘यहीं पर तेजी और इंदिरा के बीच घनिष्ठ और आजीवन मित्रता की शुरुआत हुई. श्रीमती नायडू ने इंदिरा के समक्ष हम दोनों की जोड़ी का परिचय ‘कवि और कविता’ के रूप में दिया था. इंदिरा को ये शब्द अरसे तक याद रहे और जब भी वे तेजी को अपने विदेशी मेहमानों से मिलवातीं तो इसका जिक्र करना नहीं भूलती थीं.’

तेजी का आवास बना था भारत में सोनिया का ‘पहला घर’

सोनिया 13 जनवरी 1968 को भारत आई थीं. बारह दिन बाद सोनिया और राजीव की एक सादे समारोह में सगाई हो गई. लेकिन शादी में अभी वक्त था और इसलिए इंदिरा नहीं चाहती थीं कि वह नेहरू-गांधी परिवार की भावी बहू के रूप में अभी उनके साथ रहें. उन्हें किसी होटल में भी नहीं ठहराया जा सकता था. इस पर इंदिरा के सहयोगी तथा विश्वासपात्र टी.एन. कौल और पारिवारिक दोस्त मोहम्मद यूनुस ने सुझाव दिया कि सोनिया को शादी होने तक तेजी बच्चन के यहां रहना चाहिए. इस सुझाव पर राजीव, संजय, अमिताभ और अजिताभ बच्चन ने तुरंत मोहर लगा दी. इस तरह तेजी का आवास एक तरह से भारत में सोनिया का पहला घर बना. शादी में मेहंदी जैसी कुछ रस्में बच्चन के घर पर ही आयोजित की गई थीं. हरिवंश राय बच्चन और तेजी ने गाने गाए थे. अमिताभ ने भी अपने पिता द्वारा रचित हास्य गीत गुनगुनाए थे. शादी के लिए सोनिया की मां पाओला इटली से आई थीं, लेकिन हिंदू विवाह समारोह की रस्मों में मां की भूमिका तेजी ने ही निभाई थीं.

सोनिया ने 1985 में धर्मयुग को दिए एक साक्षात्कार में पुराने दिनों को याद करते हुए कहा था: ‘मम्मी (इंदिरा) ने मुझे बच्चन परिवार के साथ रहने के लिए कहा था, ताकि मैं भारतीय रीति-रिवाजों और संस्कृति को काफी करीब से देख-सीख सकूं. मुझे उस परिवार से काफी कुछ सीखने को मिला. तेजी आंटी मेरी तीसरी मां हैं. मेरी पहली मां इटली में हैं, दूसरी मां मेरी सास इंदिरा गांधी थीं और तीसरी तेजी आंटी हैं. अमित और बंटी (अजिताभ) मेरे भाई हैं.’ सोनिया का तेजी को अपनी ‘तीसरी मां’ बताना इस बात का संकेत था कि गांधी और बच्चन परिवार के संबंधों में कितनी गहराई हुआ करती थी. आपातकाल के दौरान गांधी परिवार को 12 विलिंग्डन क्रिसेंट में शिफ्ट होना पड़ा. उस समय बच्चन परिवार उनका पड़ोसी हुआ करता था. तब सोनिया ने दोनों बंगलों के बीच एक पगडंडी बना दी थी, जिससे तेजी के साथ उनका मिलना-जुलना आसान हो गया था.

आपातकाल की रैली में शामिल होने से कर दिया था इनकार

तेजी इंदिरा गांधी की सबसे करीबी दोस्तों में से एक थीं. 1973 में इंदिरा ने तेजी को भारतीय फिल्म वित्त निगम में एक निदेशक नियुक्त किया था. लेकिन इसके बावजूद तेजी ने कभी भी कोई फैसला गांधी परिवार के दबाव में नहीं लिया. इसके लिए आपातकाल के तुरंत बाद की एक घटना का जिक्र किया जा सकता है. इंदिरा के सत्ता से बेदखल होने के बाद एक रैली में बच्चन परिवार को बुलाने का प्रस्ताव रखा गया, लेकिन तेजी ने अपने बेटे के फिल्मी कॅरियर का हवाला देते हुए उसमें आने से कथित तौर पर इनकार कर दिया. कहा जाता है कि इससे संजय काफी नाराज हो गए थे और माना जाता है कि वहीं से दोनों परिवारों के संबंधों की बुनियाद दरकनी शुरू हुई थी. 21 दिसंबर 2007 को तेजी के निधन के साथ ही दोनों परिवारों ने चार पीढ़ियों से चली आ रही अपनी आखिरी और सबसे मजबूत कड़ी खो दी थी.

बेहतरीन कलाकार थीं, नेहरू भी अभिनय देखने पहुंच गए थे थिएटर

सैन्य अफसरों के परिवार में जन्मीं तेजी ‘सूरी’ को भी हरिवंश राय बच्चन की तरह कविता, साहित्य और थिएटर में खासी रुचि थी. अपनी आत्मकथा में हरिवंश राय बच्चन ने स्वीकारा है कि तेजी के आकर्षक व्यक्तित्व और समाज के लिए कुछ करने की उनकी चाह ने उन्हें मंत्रमुग्ध कर दिया था.

लेखिका और पत्रकार प्रोमिला कल्हण के बच्चन परिवार के साथ काफी नजदीकी संबंध रहे हैं. वे अपनी किताब में बताती हैं कि तेजी बच्चन एक बेहतरीन गायिका और थिएटर आर्टिस्ट थीं. दिल्ली और इलाहाबाद में उन्होंने कई ग्रुपों के साथ परफॉर्म किया था. शादी के बाद उन्होंने शेक्सपियर के एक नाटक पर अभिनय किया था, जिसका अनुवाद उनके पति ने ही किया था. उस समय प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू अचानक ही शेक्सपियर के ‘ओथेलो’ के हिंदी संस्करण में उनका अभिनय देखने पहुंच गए थे. नई दिल्ली के थिएटर हॉल में जब नाटक का मंचन चल रहा था, तभी नेहरू अपने सचिव के साथ चुपचाप वहां पहुंचे और पीछे की सीट पर बैठ गए. हालांकि यह राज ज्यादा देर तक छिप नहीं सका. मंच से ही तेजी बच्चन ने प्रधानमंत्री से आगे की सीट पर आकर बैठने का आग्रह किया.

अमिताभ ने अपनी मां को कहा था- खूबसूरती व अदब की प्रतिमूर्ति!

खालिद मोहम्मद की किताब ‘टु बी ऑर नॉट टु बी’ में अमिताभ ने अपने माता-पिता के अंतरजातीय विवाह की तुलना इंदिरा-फिरोज गांधी की शादी के साथ करते हुए इस पर और विस्तार से प्रकाश डाला है, “एक सिख लड़की एक कायस्थ लड़के से शादी करे, यह बात उनके पिता (मेरे नाना) को मंजूर नहीं थी. यह इलाहाबाद के लिए पहली अंतरजातीय शादी थी. यह एक तरह से फिरोज और इंदिरा की शादी की तरह थी. मां बेहद खूबसूरत थीं. जैसा कि मुझे बताया गया, विजयलक्ष्मी पंडित की बेटियां नयनतारा और चंद्रलेखा तो यह सुनकर बेइंतहा खुश हो गई थीं कि मां उनसे मिलने आनंद भवन आ रही हैं. मां को लाहौर की खूबसूरती व अदब की प्रतिमूर्ति कहा जाता था.’

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