खेल » डराने वाला खलनायक जब बना कॉमेडी का बादशाह… उत्पल दत्त का सफर रहा बॉलीवुड का सबसे बड़ा ‘गोलमाल’

डराने वाला खलनायक जब बना कॉमेडी का बादशाह… उत्पल दत्त का सफर रहा बॉलीवुड का सबसे बड़ा ‘गोलमाल’

Facebook
Twitter
WhatsApp

बड़ी-बड़ी आंखें, घनी मूंछें और गंभीर आवाज, ऐसी दमदार पर्सनैलिटी, जिसने पर्दे पर धमाल मचा दिया था. ये कोई और नहीं बल्कि उत्पल दत्त थे जो पर्दे पर एक खतरनाक खलनायक का रूप दिया, लेकिन जैसे ही वह संवाद बोलते, दर्शकों की हंसी छूट जाती. उत्पल दत्त एक ऐसा नाम है, जो अभिनय की गंभीरता में हास्य का रस भरना जानते थे. 19 अगस्त को उनकी पुण्यतिथि है. दत्त ने दिल से अभिनय किया, हर किरदार में जादू भरने वाले ‘अच्छा…’ को अभिनय का जादूगर कहना गलत नहीं होगा.

उत्पल दत्त का जन्म 29 मार्च 1929 को बांग्लादेश के बारिसाल में हुआ था. पढ़ाई के दौरान ही उन्होंने थिएटर की दुनिया में कदम रख दिया था. उन्होंने शेक्सपियर के नाटकों में अंग्रेजी में अभिनय किया और बाद में बंगाली थिएटर के स्तंभ बन गए. उनकी पहली बंगाली फिल्म ‘माइकल मधुसूदन’ 1950 में आई थी. हिंदी सिनेमा में दत्त ने कम लेकिन यादगार फिल्में कीं. ‘गोलमाल’ (1979) में ‘भावुक और अनुशासनप्रिय’ भास्कर शंकराचार्य की भूमिका आज भी क्लासिक मानी जाती है. इसके अलावा ‘नरम गरम’, ‘शौकीन’, ‘किसी से न कहना’, और ‘अंगूर’ जैसी फिल्मों में उन्होंने अपनी कॉमिक टाइमिंग से दर्शकों को खूब हंसाया.

गंभीर से कॉमेडी तक
एक दिलचस्प तथ्य यह है कि उत्पल दत्त की शुरुआत एक गंभीर थिएटर कलाकार के रूप में हुई थी और उन्हें खूब पसंद किया जाता था. लेकिन जब उन्होंने कॉमेडी की, तो दर्शकों को उनका दूसरा रूप भी बेहद पसंद आया. दत्त वह अभिनेता थे, जो एक ही फ्रेम में डर भी पैदा कर सकते थे और हंसी भी. उनकी आवाज और एक्सप्रेशन इतने प्रभावशाली थे कि बिना कुछ बोले ही सीन में छा जाते थे.

गोलमाल से छाए
दत्त ने एक इंटरव्यू में खुद स्वीकारा था, “कॉमेडी करना आसान नहीं, लेकिन अगर आप किरदार को पूरी तरह समझ लें, तो हर हाव-भाव में हंसी होती है.” उनकी कुछ फिल्मों और निभाए यादगार किरदारों पर नजर डालें तो उनमें ‘गोलमाल’ है, जो उत्पल दत्त के करियर की सबसे शानदार फिल्मों में से एक है, जिसका निर्देशन ऋषिकेश मुखर्जी ने किया था. साल 1979 में रिलीज हुई फिल्म ‘भवानी’ (उत्पल दत्त) और राम प्रसाद (अमोल पालेकर) नाम के दो किरदारों की कहानी है. भवानी अमीर है, लेकिन उसे ऐसे लड़कों से नफरत है, जो आधुनिक तरीके से जीते हैं और अय्याशी करते हैं. इस फिल्म के जरिए दत्त ने दर्शकों को खूब हंसाया. अमोल पालेकर फिल्म में दोहरी भूमिका में नजर आए थे. फिल्म में बिंदिया गोस्वामी भी मुख्य भूमिका में दिखीं.

इन सुपरस्टार्स के साथ किया काम
उत्पल दत्त की फिल्म ‘शौकीन’ साल 1982 में आई थी, जिसे बासु चटर्जी ने निर्देशित किया था. ‘शौकीन’ तीन ऐसे बुजुर्गों की कहानी है, जिनकी कमजोरी महिलाएं हैं और इसी घेरे में वे खूब हंसाते हैं. फिल्म में उत्पल दत्त के साथ अशोक कुमार, एके हंगल, मिथुन चक्रवर्ती और रति अग्निहोत्री मुख्य भूमिकाओं में हैं.

पिता का किरदार निभाया
उत्पल दत्त ने ‘कैलाश पति’ के किरदार से भी दर्शकों का खूब मनोरंजन किया. ऋषिकेश मुखर्जी के निर्देशन में बनी फिल्म ‘किसी से ना कहना’ 1983 में रिलीज हुई थी. इसमें दत्त ने एक ऐसे पिता का किरदार निभाया था, जो बेटे की शादी किसी ऐसी लड़की से करवाना चाहता है, जो अनपढ़ हो और जिसे अंग्रेजी न आती हो, लेकिन लड़के (फारुख शेख) को पढ़ी-लिखी लड़की रमोला (दीप्ति नवल) से प्यार हो जाता है. फिल्म में कई मजेदार घटनाएं घटती हैं.

‘नरम गरम’ को नहीं भुलाया जा सकता
उत्पल दत्त और कॉमेडी की बात हो तो साल 1981 की ‘नरम गरम’ को नहीं भुलाया जा सकता. फिल्म कुसुम (स्वरूप संपत) और उसके पिता विष्णु प्रसाद (एके हंगल) की कहानी है, जो स्थानीय साहूकार से कर्ज न चुका पाने के कारण बेघर हो जाते हैं और उनकी मदद रामप्रसाद (अमोल पालेकर) करता है, जो कुसुम से प्यार करता है. फिल्म में उत्पल दत्त ने एक बूढ़े जमींदार का किरदार निभाया था. उनकी कॉमिक टाइमिंग को खूब पसंद किया गया.

जुड़वा बच्चों की कहानी
विलियम शेक्सपियर के नाटक ‘ए कॉमेडी ऑफ एरर्स’ से प्रेरित फिल्म ‘अंगूर’ साल 1982 में रिलीज हुई थी, जिसमें उत्पल दत्त ने संजीव कुमार और देवेन वर्मा के साथ खूब हंसाया था. फिल्म में संजीव कुमार और देवेन वर्मा दोहरी भूमिका में हैं और दत्त ने उनके पिता का रोल प्ले किया था. जुड़वा बच्चों की कहानी को दिखाती फिल्म का निर्देशन मशहूर गीतकार गुलजार ने किया था.

विचारक और लेखक भी
उत्पल दत्त केवल अभिनेता ही नहीं, बल्कि एक क्रांतिकारी विचारक और लेखक भी थे. उन्होंने कई नाटक लिखे, जो राजनीति, समाज और व्यवस्था पर तीखा प्रहार करते थे. उन्होंने 1949 में ‘लिटिल थिएटर ग्रुप’ की स्थापना की. बंगाल में उन्हें ‘नाटककारों का गांधी’ कहा जाता था. उनके नाटक ‘टीनेर तलवार’ और ‘बरे बांगाली’ आज भी थिएटर प्रेमियों के बीच लोकप्रिय हैं.

उत्पल दत्त का निधन
उत्पल दत्त एक बेहतरीन कलाकार ही नहीं बल्कि आंदोलनकारी भी थे. देश में जब इमरजेंसी लगी, तो उन्होंने इसका रचनात्मक विरोध किया. इमरजेंसी के खिलाफ उन्होंने उस वक्त तीन नाटक ‘बैरीकेड’, ‘सिटी ऑफ नाइटमेयर्स’ और ‘इंटर द किंग’ लिखे. सरकार ने इन नाटकों को बैन कर दिया, लेकिन जहां भी ये नाटक हुए, लोगों ने खूब पसंद किया. उत्पल दत्त का निधन 19 अगस्त 1993 को हुआ था.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Share Market

Share Market

Gold & Silver Price

Should NEET exam be conducted again?

टॉप स्टोरी