भारत » ठंडा दिमाग, कूल अंदाज पर तेवर तल्ख…’खामोश हुंकार’ भर रहे तेज प्रताप! क्या बिहार की राजनीति को नई दिशा दे रहे?

ठंडा दिमाग, कूल अंदाज पर तेवर तल्ख…’खामोश हुंकार’ भर रहे तेज प्रताप! क्या बिहार की राजनीति को नई दिशा दे रहे?

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पटना. बेगूसराय के नौला पंचायत के गाड़ा गांव में तेज प्रताप यादव ने जन संवाद सभा में हजारों लोगों को संबोधित किया. युवाओं की चमकती आंखें, महिलाओं का उत्साह और बुजुर्गों का आशीर्वाद… यह नजारा किसी सियासी रणबांकुरे की ताकत को बयां कर रहा था. तेज प्रताप ने माइक्रो ब्लॉगिंग साइट X पर लिखा, जनता जनार्दन के इस प्यार के लिए सदा आभारी रहूंगा. वह बेहद सधे अंदाज में टिप्पणी कर रहे हैं, लोगों के बीच पहुंच रहे हैं और कई बार तो वह भारी भीड़ के बीच अपनी गाड़ी की छत पर सवार हो जाते हैं, फिर ठीक लालू यादव के अंदाज में लोगों से सीधा संवाद करते हैं. चार दिन पहले मनेर में भाई वीरेंद्र को ‘जयचंद’ कहकर तंज कसने वाले तेज प्रताप यादव जो संदेश देना चाह रहे हैं, वह बखूबी दे रहे हैं और साथ ही जनता के बीच अपनी नई पहचान भी बनाने में कामयाब होते दिख रहे हैं.

तेज प्रताप यादव के बागी तेवर सुर्खियों में

बता दें कि बीते 25 मई को लालू प्रसाद यादव ने जब तेज प्रताप को आरजेडी और परिवार से छह साल के लिए बाहर का रास्ता दिखाया, तो कईयों ने सोचा कि यह ‘बबुआ’ शांत हो जाएगा. मगर तेज प्रताप ने महुआ विधानसभा से निर्दलीय लड़ने का ऐलान कर सबको चौंका दिया. उन्होंने विकास वंचित इंसान पार्टी (VVIP), भोजपुरिया जन मोर्चा, प्रगतिशील जनता पार्टी, वाजिब अधिकार पार्टी और संयुक्त किसान विकास पार्टी जैसी पांच छोटी पार्टियों के साथ गठजोड़ किया. यह गठबंधन यादव, मुस्लिम और निषाद समुदायों को साधने की कोशिश मानी जा रही है. वहीं, जानकारों की नजर में बिहार की सियासत में तेज प्रताप यादव का यह कूल अंदाज, ठंडा दिमाग और तीखा तेवर राजद के लिए खतरे की घंटी बजा रही है.
तेज प्रताप यादव के जन संवाद में उमड़ रही भीड़, जनता के बीच से सियासी संदेश.

महागठबंधन के वोटबैंक में दरार तो नहीं पड़ेगा!

बता दें कि बिहार में यादव समुदाय की आबादी 14% है और मुस्लिमों की संख्या 18% है. ये दोनों की समूह आरजेडी के परंपरागत मतदाता हैं. इन दोनों का समीकरण जहां जुट जाता है तो विधानसभा की 50 से ज्यादा सीटों पर निर्णायक हो जाते हैं. इससे अलग तेज प्रताप की सभाओं में उमड़ रही भीड़-खासकर युवा और मुस्लिम चेहरों की मौजूदगी यह सवाल खड़ा कर रहा है कि क्या तेज प्रताप यादव इस समीकरण में सेंध लगा सकते हैं? जानकार तेज प्रताप यादव की इस राजनीति को अपनी नजर से पढ़ रहे हैं. वरिष्ठ पत्रकार अशोक कुमार शर्मा कहते हैं कि मनेर में भाई वीरेंद्र पर हमला और बेगूसराय में उनकी सक्रियता दिखाती है कि वह न सिर्फ राजद, बल्कि तेजस्वी यादव की सियासी जमीन को भी चुनौती दे रहे हैं. सवाल यह भी कि क्या यह महागठबंधन की एकता को तोड़ने वाला कदम है?

तेजस्वी-राहुल की यात्रा के समानांतर तेज प्रताप

तेजस्वी यादव और राहुल गांधी की वोटर अधिकार यात्रा 17 अगस्त से शुरू हुई थी. मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों को लेकर राहुल गांधी का दावा है कि दलित, पिछड़े और मुस्लिम वोटरों के नाम काटे जा रहे हैं. उनकी सभाओं में भी हजारों लोग जुट रहे हैं. साथ में तेजस्वी यादव भी हैं तो सियासी ताकत और भी मजबूत दिखती है. राजद कांग्रेस के समर्थक एक साथ जब आ जाते हैं तो माहौल बनता दिखता है. मगर इसके समानांतर तेज प्रताप की जन संवाद यात्रा ने सियासी पारा चढ़ा दिया है. अलग-अलग जिलों में ये दौरे हो रहे हैं और एक दूसरे से सीधा टकराव तो नहीं दिख रहा है, लेकिन यह साफ हो गया है कि दोनों भाइयों की राहें अलग-अलग हो गई हैं. ऐसे में आरजेडी के कार्यकर्ता असमंजस में हैं. तेजस्वी रोजगार और स्वास्थ्य को मुद्दा बना रहे हैं तो तेज प्रताप स्थानीय मुद्दों यानी जनता से जुड़े जमीन के मुद्दे के साथ लोगों के गुस्से को भुनाने की कोशिश कर रहे हैं.

तीसरे मोर्चे की सुगबुगाहट, बिहार में नया सियासी खेल?

तेज प्रताप की सियासी चाल से तीसरे मोर्चे की चर्चाएं जोर पकड़ रही हैं. असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM के साथ उनके संभावित गठजोड़ की अटकलें और’महुआ का बबुआ’ जैसे नारे उनकी ब्रांडिंग को दर्शाते हैं. एक और खास बात यह है कि तेज प्रताप यादव किसी पार्टी के चिन्ह पर नहीं, बल्कि अपनी पहचान पर चुनाव लड़ना चाहते हैं. इसके साथ ही आरजेडी के कुछ नेताओं को ‘जयचंद’ कहना-उनके रणनीतिक अंदाज को भी बताता है. हालांकि, तेजस्वी यादव के नाम के साथ लालू यादव का हाथ है, लेकिन जनता के बीच जिस तरह से तेज प्रताप यादव खुलकर आ गए हैं, वह तेजस्वी यादव की नीतियों की आलोचना करने लग गए हैं, ऐसे में सियासी संकेत के साथ ही बिहार में राजनीति की नई दिशा भी तय होती दिख रही है. दरअसल, बिहार में पहले से ही जटिल सियासी समीकरणों के बीच तेज प्रताप यादव के रूप में सामने आया यह नया मोड़ राजद और कांग्रेस के लिए मुश्किलें बढ़ा सकता है.

बीते 12 अगस्त को यप्रकाश यादव उर्फ गांधी यादव की अगुवाई में घोसी विधानसभा के सैकड़ों लोगों ने टीम तेज प्रताप याद ज्वॉइन किया.

जनता का मूड, भाने लगे सीधे और बेबाक तेज प्रताप!

बेगूसराय और मनेर में तेज प्रताप की सभाओं में उमड़ी भीड़ दर्शाती है कि वह जनता के बीच अपनी पैठ बना रहे हैं. युवा उनकी सादगी और बेबाकी को पसंद कर रहे हैं तो महिलाएं उनके सामाजिक कल्याण के वादों से प्रभावित हैं. राजनीति के जानकार कहते हैं कि अगर तेज प्रताप यादव नई पार्टी बनाते हैं या निर्दलीय उम्मीदवार उतारते हैं तो राजद और महागठबंधन को नुकसान हो सकता है. बेगूसराय और मनेर में उनकी सभाओं में उमड़ी भीड़ दर्शाती है कि उनके पास समर्थकों का आधार है. हालांकि, JDU प्रवक्ता मनीष यादव का कहना है कि उनका प्रभाव सीमित है. फिर भी 2025 चुनाव में तेज प्रताप का कदम सियासी खेल अगर बदल नहीं सकता है तो भी महागठबंधन का खेल भंडोल तो कर ही सकता है.

सियासत का सवाल: तेज प्रताप की मंजिल क्या होगी?

तेज प्रताप की जन संवाद यात्रा सिर्फ सियासी शोर नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत का संकेत है. अगर वह नई पार्टी बनाते हैं या निर्दलीय उम्मीदवार उतारते हैं तो बिहार की सियासत में बड़ा उलटफेर हो सकता है. उनकी सभाओं में दिख रहा जनसमर्थन और छोटे दलों के साथ गठजोड़ उनकी रणनीति को और पुख्ता करता हुआ दिख रहा है. दूसरी ओर असलियत यह भी है कि बिहार की सियासत हमेशा से जातिगत समीकरणों और गठबंधनों पर टिकी रही है और अब तेज प्रताप के इस बागी तेवर से नया रंग ले सकती है.वहीं, वरिष्ठ पत्रकार अशोक कुमार शर्मा का कहना है कि, तेज प्रताप का प्रभाव कुछ सीटों तक सीमित है फिर भी 2025 के विधानसभा चुनाव में तेज प्रताप का यह बागी कदम राजद के वोट बैंक को बांट सकता है, जिससे NDA को फायदा हो सकता है.

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