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क्या लिखे क्यों लिखे किसके लिये लिखे जानेजां

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कुछ खुरच दीवार से मिट्टी थोड़ी सी कुछ जमीन से उठा
मिला के देख रंग से रंग ना मिले धूप में ले जा और सुखा

मिट्टी हो या हो राख आग हो या धुआं हो मत उलझ और जा
आता रहा है बरसों से यहां सोच मत और आ फिर से आ

गिट्टियाँ खेलते कोई लिखने लगे आंगन जरा मत भरमा
अपने लिए हैं खेल अपने हैं मैदान कौन कहता है शरमा

मन नहीं है टूटते हैं पुल शब्दों के इधर और उधर वहाँ
सबके अपने खिलौने आयें सब और खेलें मिलकर यहां

खेलें दो या खेलें ग्यारह हजारों करोड़ों हैं तो सही मेहरबां
‘उलूक’ सत्तर निकल लिए सत्तर आने हैं साल अभी कद्रदां |

चित्र साभार:
https://www.facebook.com/photo/?fbid=1898646290178703&set=a.1894919707218028

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