अगर इजरायल को ईरान की मिसाइलों से डर लगता है तो इसकी वजहें भी हैं. ना केवल ईरान की मिसाइल तकनीक और ताकत का लोहा अब पूरी दुनिया मानती है बल्कि उससे भी आगे की बात ये है कि उसकी मिसाइल छोड़ने की क्षमता आधुनिक इंजीनियरिंग और सैन्य चालाकी का अनूठा मिश्रण भी है. ईरान अपनी मिसाइलों को लौह मुक्का कही जाने वाली सुरंगों में जमीन से बहुत नीचे ही नहीं रखता बल्कि वहीं से मिसाइलें दागकर दुश्मन को हक्का बक्का कर देता है, वो भी एक के बाद एक बड़े पैमाने पर.
ईरान ने ये अनूठी तकनीक पिछले 40 सालों में विकसित की है. इसकी जड़ें 40 साल पहले इराक से हुए उसके युद्ध से जुड़ी हैं. जिसके बाद उसको मिसाइल ताकत हासिल करने के साथ उन्हें जमीन के नीचे से छोड़ने में महारत हासिल करनी होगी. माना जाता है कि चीन और उत्तर कोरिया ने ईरान को इसमें मदद की. ईरान की ये तकनीक अगर आप पूरी तरह जानेंगे तो हैरान भी होंगे और प्रभावित भी.
ईरान के चारों तरफ अमेरिकी सैन्य ठिकाने और इज़रायल जैसे विरोधी देश हैं. चूंकि उसके पास परमाणु हथियार आधिकारिक रूप से नहीं हैं, इसलिए वह “मिसाइल डिटरेंस” पर भरोसा करता है.
जमीन के नीचे से मिसाइल छोड़ने की तकनीक को साइलो तकनीक कहा जाता है. लेकिन ईरान ने पारंपरिक साइलो (Silo) तकनीक से आगे बढ़कर कुछ नए तरीके विकसित किए हैं.
मिसाइल मैगजीन सिस्टम
इसे आप एक विशाल रिवॉल्वर की तरह समझ सकते हैं. सुरंगों के अंदर रेलवे ट्रैक बिछे होते हैं जिन पर मिसाइलें खड़ी अवस्था में रखी होती हैं. एक मिसाइल लांच होने के बाद दूसरी मिसाइल तुरंत ऑटोमेटेड सिस्टम के जरिए लांचिंग पॉइंट पर आ जाती है. इससे बहुत कम समय में एक साथ कई मिसाइलें दागी जा सकती हैं.
अदृश्य लांच पैड
सुरंगों के ऊपर के हिस्से में फ्लैप्स या छोटे द्वार होते हैं जो रडार और सैटेलाइट से छुपने के लिए मिट्टी और कंक्रीट से ढके रहते हैं. हमला करने के वक्त ये द्वार खुलते हैं, मिसाइल बाहर निकलती है और द्वार वापस बंद हो जाते हैं.
रैपिड-फायर रेल
ईरान ने 2020 के बाद से ऐसी तकनीक दिखाई है जहां मिसाइलों का पूरा गुच्छा एक साथ रेलगाड़ी की तरह सुरंगों में घूमता है. इससे उन्हें अलग-अलग लोकेशंस से हमला करने की सुविधा मिलती है.
कब ईरान ने इसे विकसित किया
इसकी शुरुआत होती है 1980–88 के ईरान – इराक युद्ध से. उस युद्ध में इराक ने ईरानी शहरों पर लगातार मिसाइल हमले किए. तब ईरान के पास जवाब देने की क्षमता बहुत सीमित थी. यहीं से ईरान को लंबी दूरी की मिसाइल और सुरक्षित लांच सिस्टम की जरूरत महसूस हुई.
उत्तर कोरिया और चीन ने शुरुआती मदद की. 1990 के दशक में ईरान ने उत्तर कोरिया से स्कड मिसाइल तकनीक हासिल की. बाद में इन्हीं के आधार पर अपनी मिसाइलें विकसित कीं. इसमें शहाब -3 और सेज्जिल जैसी मिसाइलें शामिल थीं. इन मिसाइलों को सुरक्षित रखने और दुश्मन की निगाह से बचाने के लिए ईरान ने अंडरग्राउंड साइलो और टनल नेटवर्क बनाना शुरू किया.
तकनीक काम कैसे करती है?
ज़मीन के नीचे गहरे कंक्रीट साइलो बनाए जाते हैं. ऊपर से वे साधारण ज़मीन जैसे दिखते हैं. मिसाइल अंदर तैयार रहती है. आदेश मिलते ही हाइड्रोलिक सिस्टम से दरवाज़ा खुलता है. मिसाइल सीधे ऊपर की ओर दागी जाती है. शुरुआती तरल ईंधन मिसाइलों को भरने में समय लगता था लेकिन सेज्जिल जैसी सॉलिड फ्यूल मिसाइलें पहले से तैयार रहती हैं, जिससे रिएक्शन टाइम बहुत कम हो जाता है.
क्या दूसरे देश भी ऐसा करते हैं?
हां. ईरान इस मामले में अकेला नहीं है. अमेरिका. रूस, चीन के पास भी ऐसी तकनीक है. अमेरिका के पास सैकड़ों साइलो तकनीक वाली मिसाइलें हैं. रूस के पास भी दुनिया का सबसे बड़ा साइलो नेटवर्क है. चीन ने हाल के वर्षों में पश्चिमी रेगिस्तान में दर्जनों नए साइलो बनाए हैं. उत्तर कोरिया ने पहाड़ों के अंदर सुरंगों से मिसाइल परीक्षण किए हैं.
चीन के पास सुरंगों का दुनिया का सबसे बड़ा नेटवर्क है (करीब 5,000 किमी लंबा), जिसे ‘अंडरग्राउंड ग्रेट वॉल’ कहा जाता है. वे अपनी परमाणु मिसाइलों को बचाने के लिए इन सुरंगों का इस्तेमाल करते हैं.
रूस के पास सबसे आधुनिक साइलो हैं. ये बहुत गहरे कंक्रीट के गड्ढे होते हैं जहां से मिसाइलें सीधे दागी जाती हैं. रूस की कुछ मिसाइलें तो परमाणु धमाके को झेलने वाले बंकरों में रहती हैं.
अमेरिका ने अपनी ‘मिनटमैन’ मिसाइलें जमीन के नीचे बने साइलो में रखी हैं, जो मोंटाना और नॉर्थ डकोटा जैसे राज्यों के खेतों के नीचे छिपी हैं. ईरान की तरह उत्तर कोरिया भी अपने पहाड़ी भूगोल का फायदा उठाता है और सुरंगों से मिसाइल दागने में माहिर है.
ईरान की मिसाइल तकनीक कितनी उन्नत
ईरान अमेरिका या रूस जितना उन्नत नहीं है, लेकिन क्षेत्रीय स्तर पर उसकी क्षमता काफी प्रभावी मानी जाती है. इसके पास 2000 किमी तक मार करने वाली मध्यम दूरी की मिसाइलें हैं. सॉलिड फ्यूल टेक्नोलॉजी की मिसाइल हैं. पहाड़ी इलाकों में ये छिपे हुए ठिकानों में रखी जाती हैं. वर्ष 2020 में ईरान ने इराक में अमेरिकी ठिकानों पर बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं, जिससे उसकी सटीकता पर दुनिया का ध्यान गया.
अंतर क्या है?
जहां अमेरिका और रूस जैसे देश स्थिर साइलो का ज्यादा उपयोग करते हैं, वहीं ईरान और चीन मोबाइल टनल सिस्टम (सुरंग के अंदर घूमती हुई मिसाइलें) पर ज्यादा भरोसा करते हैं। इसका कारण यह है कि स्थिर साइलो की लोकेशन दुश्मन को पता चल सकती है, लेकिन सुरंग के अंदर मिसाइल कहां खड़ी है, यह पता लगाना नामुमकिन होता है.





