यह निर्णय जस्टिस एचएन नागमोहन दास आयोग की सिफारिशों के बाद आया है, जिसने पहले एक अलग संरचना का सुझाव दिया था. आयोग ने छह फीसदी एससी लेफ्ट, पांच फीसदी एससी राइट, चार फीसदी लंबानी, भोवी, कोरमा और कोरचा जैसी स्पृश्य जातियों और एक फीसदी प्रत्येक खानाबदोश समुदायों जैसे- आदि कर्नाटक, आदि द्रविड़ और आदि आंध्र समुदायों के लिए सुझाया था. हालांकि, मंत्रिमंडल ने खानाबदोश और आदि कर्नाटक, आदि द्रविड़, आदि आंध्र के लिए अलग एक फीसदी आरक्षण को हटाकर तीन श्रेणियों का नया मैट्रिक्स स्वीकार किया.
नागमोहन दास आयोग ने किया सर्वेक्षण
नागमोहन दास आयोग ने मई से जुलाई 2025 तक व्यापक सर्वेक्षण किया, जिसमें कर्नाटक की अनुमानित 1.16 करोड़ अनुसूचित जाति आबादी में से 93 फीसदी को कवर किया गया. इस सर्वेक्षण में 27.24 लाख परिवारों से 1.07 करोड़ लोगों के आंकड़े एकत्र किए गए. हालांकि, बेंगलुरु शहर में केवल 54 फीसदी आबादी को कवर किया जा सका. आयोग ने सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ेपन के साथ-साथ सरकारी नौकरियों में प्रतिनिधित्व के आधार पर अपनी सिफारिशें तैयार कीं.
दलित लेफ्ट समुदाय ने इस फैसले का स्वागत किया है और इसे तत्काल लागू करने की मांग की है. सामाजिक न्याय के लिए फेडरेशन ऑफ दलित संगठनों ने 11 अगस्त से बेंगलुरु में अनिश्चितकालीन विरोध प्रदर्शन शुरू किया है. दूसरी ओर, कांग्रेस पार्टी के कुछ वरिष्ठ दलित नेता जैसे जी. परमेश्वर और मल्लिकार्जुन खड़गे आंतरिक आरक्षण के खिलाफ रहे हैं जिससे राजनीतिक तनाव बढ़ा है.
मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने कहा कि यह निर्णय सामाजिक न्याय की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है. उन्होंने सभी समुदायों से सर्वेक्षण में सहयोग करने की अपील की. सरकार जल्द ही इस संबंध में अध्यादेश लाने की योजना बना रही है. यह कदम कर्नाटक में अनुसूचित जातियों के बीच आरक्षण के समान वितरण को सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है.





