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इस राज्य में वजूद तलाशने में जुटी थी भाजपा, लेकिन हिंदू संगठनों ने दिया 440 वोल्ट का झटका!

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दक्षिण के राज्य केरल में भाजपा लगातार खुद को मजबूत करने की कोशिश कर रही है. इसमें उसको कुछ हद तक सफलता भी मिली है. बीते 2024 के लोकसभा चुनाव में उसे एक सीट पर जीत भी मिली थी. राज्य में भाजपा का वोट प्रतिशत करीब 3.7 फीसदी है. पार्टी मुख्य रूप से हिंदू समुदाय से जुड़े मुद्दे उठाती है और इसके दम पर वह वामपंथ और कांग्रेस के गढ़ माने जाने वाले इस राज्य में अपना वजूद तलाशती रहती है. लेकिन, केरल की राजनीति में साबरीमाला मंदिर और भगवान अयप्पा से जुड़ा विवाद फिर से गरमा गया है. माकपा के नेतृत्व वाली एलडीएफ सरकार की ओर से 20 सितंबर को पंबा में आयोजित ग्लोबल अयप्पा संगमम को लेकर भाजपा ने तीखा विरोध जताया है, लेकिन प्रमुख हिंदू संगठनों ने इस आयोजन के लिए सरकार का समर्थन किया है.

नायर सर्विस सोसाइटी (एनएसएस) और एसएनडीपी योगम जैसे प्रभावशाली संगठनों के सरकार के साथ होने से भाजपा बैकफुट पर आ गई है. यह घटना आगामी स्थानीय निकाय चुनावों और 2026 में होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले एलडीएफ की हिंदू वोटरों तक पहुंच बनाने की रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है. ग्लोबल अयप्पा संगमम ट्रावणकोर देवास्वोम बोर्ड (टीडीबी) के 75 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में आयोजित किया जा रहा है.

मुख्यमंत्री पिनराई विजयन इसका उद्घाटन करेंगे, जिसमें मंत्रियों, आध्यात्मिक गुरुओं और दुनिया भर से अयप्पा भक्तों के प्रतिनिधि शामिल होंगे. कार्यक्रम का उद्देश्य साबरीमाला को वैश्विक तीर्थस्थल के रूप में स्थापित करना और मंदिर के विकास पर चर्चा करना बताया जा रहा है. देवास्वोम मंत्री वीएन वासवान ने कहा कि यह कार्यक्रम धार्मिक परंपराओं का उल्लंघन नहीं करेगा और इसमें 3,000 से अधिक प्रतिनिधि भाग लेंगे.

भाजपा ने राजनीति नाटक बताया

इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक भाजपा ने इस आयोजन को राजनीतिक नाटक करार दिया है. प्रदेश अध्यक्ष राजीव चंद्रशेखर ने कहा कि यह लोगों को बेवकूफ बनाने की रणनीति है, जो चुनावों से ठीक पहले हिंदू भावनाओं का शोषण करने का प्रयास है. उन्होंने विजयन और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन पर हिंदू धर्म का अपमान करने का आरोप लगाते हुए कहा कि दोनों को माफी मांगनी चाहिए. चंद्रशेखर ने 2018 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद एलडीएफ सरकार द्वारा भक्तों पर दमन और गिरफ्तारियों का जिक्र किया, जब महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति दी गई थी. भाजपा ने इस कार्यक्रम में स्टालिन को आमंत्रित करने पर भी सवाल उठाए, क्योंकि स्टालिन के बेटे डीएमके नेता उदयनिधि स्टालिन ने हिंदू धर्म को वायरस कहा था.

विरोध करेंगे भाजपा कार्यकर्ता

चंद्रशेखर ने चेतावनी दी कि यदि माफी नहीं मांगी गई तो भाजपा कार्यकर्ता विरोध करेंगे. हालांकि प्रमुख हिंदू संगठनों ने एलडीएफ का साथ देकर भाजपा के प्रयासों को झटका दिया है. एनएसएस 2018 में एलडीएफ के खिलाफ सबसे आक्रामक विरोध में शामिल था. अब उसने कहा कि यदि कार्यक्रम मंदिर की पवित्रता और परंपराओं को प्रभावित नहीं करता है तो इसका स्वागत है. एनएसएस महासचिव जी. सुकुमारन नायर ने कहा कि आयोजन समिति में केवल भक्तों को शामिल किया जाए और इसे राजनीति से दूर रखा जाए.

सरकार ने एनएसएस की मांग मान ली है कि राजनीतिक नेता समिति से बाहर रहें, जिसके बाद संगठन ने अपना प्रतिनिधि भेजने का फैसला किया है. एसएनडीपी योगम एझावा समुदाय का प्रमुख संगठन है. उसने भी पूर्ण समर्थन दिया है. महासचिव वेल्लापल्ली नाटेसन ने कहा कि महिलाओं के प्रवेश से जुड़ा पिछला विवाद अब खत्म हो चुका है.

परंपराओं का उल्लंघन नहीं करने का आश्वासन

उन्होंने जोर दिया कि सरकार ने परंपराओं का कोई उल्लंघन नहीं करने का आश्वासन दिया है, इसलिए चिंता की कोई बात नहीं. नाटेसन ने कहा कि यह कार्यक्रम साबरीमाला से जुड़े लोगों की आजीविका को बढ़ावा देगा और राज्य की सांस्कृतिक-आर्थिक प्रगति में योगदान देगा. एसएनडीपी ने भाजपा की आलोचना को खारिज करते हुए कहा कि आयोजन धार्मिक रीति-रिवाजों का पालन करेगा.

नाटेसन के बेटे थुषार वेल्लापल्ली भाजपा की सहयोगी भारत धर्म जन सेना के अध्यक्ष हैं, लेकिन थुषार ने कहा कि उनकी पार्टी का रुख तय नहीं हुआ है. यह मामला 2018 के सुप्रीम कोर्ट फैसले के बाद एलडीएफ के लिए राजनीतिक झटके को दर्शाता है, जब हिंदू समुदाय में असंतोष फैला था. 2019 लोकसभा चुनावों में एलडीएफ को भारी नुकसान हुआ, लेकिन 2021 विधानसभा में वापसी हुई. 2024 लोकसभा में फिर हार के बाद माकपा के राज्य सचिव एमवी गोविंदन ने कहा कि संगमम साबरीमाला के विकास के लिए है और भक्तों को साम्प्रदायिकता के खिलाफ लड़ाई में भूमिका निभानी चाहिए. विपक्षी कांग्रेस ने भी इसे बहुसंख्यक तुष्टिकरण बताया, लेकिन अब हिंदू संगठनों का समर्थन एलडीएफ को मजबूती दे रहा है.

दरअसल, एलडीएफ का परंपरागत रूप से धर्मनिरपेक्ष रहा है. लेकिन, वह भी अब हिंदू वोटरों को लुभाने के लिए धार्मिक आयोजनों का सहारा ले रही है. 2018 के साबरीमाला विवाद ने भाजपा को हिंदू एकता का मुद्दा दिया था, लेकिन एनएसएस और एसएनडीपी का समर्थन भाजपा की रणनीति को कमजोर कर रहा है. एनएसएस नायर समुदाय का प्रतिनिधित्व करता है. नायर प्रभावी जाति समूह है. पिछड़ी जातियों के संगठन एसएनडीपी एलडीएफ के साथ है. भाजपा खुद को केरल में मजबूत करने कोशिश कर रही है. वह हिंदू समुदाय से जुड़े मुद्दे उठाती है. लेकिन हिंदू धार्मिक संगठनों के एलडीएफ के साथ जाने से उसके मुहिम को चोट पहुंची है. यह उसके लिए 440 वोल्ट से झटके जैसा है.

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