अभी इस तकनीक को कमर्शियल प्रोजेक्टों के लिए बड़े स्तर पर इस्तेमाल के लिए तैयार किया जा रहा है. यह तकनीक इसलिए भी तहलका मचाने वाली है कि क्योंकि यह एक पंथ दो काज नहीं बल्कि कई उद्धेश्यों को एक ही लागत में पूरा करने की क्षमता रखती है. उदाहरण के लिए एक एसी की बिजली के खर्च में न केवल कूलिंग बल्कि एसी से निकलने वाली हीट को भी इस्तेमाल किया जा सकेगा. साथ ही गर्म गैसों के निकलने से पर्यावरण को होने वाले नुकसान और ग्लोबल वॉर्मिंग को भी कम करने में योगदान दिया जा सकेगा.
इस दौरान आईएसएचआरएई (इंडियन सोसायटी ऑफ हीटिंग, रेफ्रिजरेटिंग एंड एयर कंडीशनिंग इंजीनियर्स) और इन्फॉर्मा मार्केट्स इन इंडिया की ओर से बताया गया कि भारत सरकार लगातार कोल्ड-चेन उद्योग को बूस्ट कर रही है. इसी वजह से इसे सनराइज सेक्टर कहा जा रहा है.
रेफ्रिजरेशन की वजह से जलवायु और पर्यावरण को होने वाले नुकसान को रोकने को लेकर एक्सपर्ट और डैनफॉस इंडिया के मधुर सहगल ने बताया कि एसी जैसे प्रोडक्ट्स के फायदे के साथ नुकसान ये होता है कि ये गर्म गैसें बाहर छोड़ते हैं और पर्यावरण गर्म होता है लेकिन अब नई तकनीकें इस प्रभाव को घटाने और पर्यावरण को बचाने की ओर ही काम कर रही हैं. भारत में ग्रीन हाउस गैसेज, पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले तत्वों को घटाने वाली तकनीक के इस्तेमाल के लिए 2032 का लक्ष्य रखा गया था लेकिन अच्छी बात है कि यह अभी से हो रहा है और ऐसी नई-नई तकनीकें लाई जा रही हैं जो बेहद सकारात्मक प्रभाव रखती हैं.
वहीं रेफकोल्ड इंडिया 2025 के संयोजक आशीष गुप्ता ने कहा कि देश में 32–35 मिलियन टन की कोल्ड स्टोरेज क्षमता तो है, लेकिन पैक-हाउस, रिपनिंग चैम्बर्स और रीफर वाहनों की कमी अब भी चुनौती है. पीएमकेएसवाई जैसी योजनाएं और ऊर्जा दक्षता लेबलिंग टिकाऊ नेटवर्क के लिए बेहतर माहौल बना रही हैं.
एनसीसीडी के मुख्य परिचालन अधिकारी आशीष फोटेदार ने बताया कि यह सेक्टर कृषि से लेकर स्वास्थ्य सेवाओं तक हर क्षेत्र को नई दिशा दे रहा है. वहीं ISHRAE के राष्ट्रीय अध्यक्ष-निर्वाचित आर. सर्वनन ने इसे उद्योग के लिए मील का पत्थर बताया.





