खेल » ‘आना मेरी जान…’, 78 साल पहले आई ब्लॉकबस्टर फिल्म, 1 गाने ने खूब काटा था बवाल, लगा था अश्लीलता का ठप्पा

‘आना मेरी जान…’, 78 साल पहले आई ब्लॉकबस्टर फिल्म, 1 गाने ने खूब काटा था बवाल, लगा था अश्लीलता का ठप्पा

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15 अगस्त 1947… जब पूरा देश आजादी के जश्न में डूबा हुआ था. उसी दिन एक फिल्म रिलीज हुई जिसने हिंदी सिनेमा को एक नया मोड़ दिया. इसके गाने हो या फिल्म, सबकुछ छा गया. इस फिल्म के साथ लोगों ने आजादी के जश्न को मनाया. ये थी ‘शहनाई’, जो मनोरंजन की दुनिया में एक बड़ी हिट साबित हुई. यह फिल्म 133 मिनट लंबी थी और इसके संगीत निर्देशक सी. रामचंद्र थे, जिन्होंने अपने संगीत के अलग अंदाज से इस फिल्म को यादगार बना दिया.

इस फिल्म का सबसे चर्चित और हिट गाना था ‘आना मेरी जान संडे के संडे’. इस गाने को शमशाद बेगम और सी. रामचंद्र ने गाया था. इस गाने ने उस वक्त के युवाओं और आम लोगों को खूब लुभाया. यह गाना जल्द ही म्यूजिक चार्ट के टॉप पर पहुंच गया और साल 1947 के सबसे पसंदीदा गीतों में शामिल हो गया. उस समय जब देश विभाजन की त्रासदी और एक अनिश्चित भविष्य से गुजर रहा था, यह गीत एक हल्की-फुल्की राहत और खुशी का जरिया बना.

किस पर फिल्माया गया था गाना
इस गीत के बोल और संगीत में एक अलग ही ताजगी थी. निर्देशक पी. एल. संतोषी ने इस गाने को पर्दे पर फिल्माया था. इस गाने में अभिनेत्री दुलारी और अभिनेता मुमताज अली नजर आए. गाने में एक गांव की लड़की और एक विदेशी लड़के के बीच हल्का-फुल्का रोमांस दिखाया गया था, जो दर्शकों को काफी पसंद आया.

वेस्टर्न म्यूजिक का दिया टच
सी. रामचंद्र ने इस गाने में वेस्टर्न म्यूजिक का इस्तेमाल कर हमेशा के लिए यादगार बना दिया, जो उस समय के लिए बिल्कुल नया था. इस गाने की लोकप्रियता को देख इसी शैली का इस्तेमाल करते हुए ‘गोरे गोरे ओ बांके छोरे’ और ‘शोला जो भड़के’ जैसे गानों को बनाया गया.

हिट के साथ साथ विवादों में भी रहा गाना
हालांकि, ‘आना मेरी जान संडे के संडे’ गाना जितना लोकप्रिय हुआ, उतना ही विवादों में भी रहा. कुछ लोगों ने इस गाने को तुच्छ कहा, तो कुछ लोगों ने इस गाने को अश्लील करार दिया.

अश्लील बताते हुए गाने पर उठाए सवाल
उस समय की प्रसिद्ध फिल्म पत्रिका ‘फिल्म इंडिया’ को एक पाठक ने पत्र लिखकर इस गाने की आलोचना की थी और कहा था कि ऐसे गीत युवा मन को नैतिक रूप से बिगाड़ सकते हैं. इस तरह के गानों पर सवाल उठाए गए कि क्या आजादी के साथ आई अभिव्यक्ति की छूट कहीं सामाजिक मूल्यों पर असर डाल रही है?

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