जस्टिस ज्योतिमा बागची ने सुनवाई के दौरान कहा कि पाकिस्तान में पंजाबी बोलने वाले और बांग्लादेश में बंगाली भाषी नागरिक रहते हैं. ऐसे में सिर्फ भाषा के आधार पर किसी को विदेशी मान लेना सही नहीं है. अदालत ने केंद्र और 10 राज्यों से एक हफ्ते में जवाब मांगा है.
बंगाली भाषी मुसलमानों की ‘मनमानी डिपोर्टेशन’ का आरोप
सुप्रीम कोर्ट यह टिप्पणी उस याचिका पर सुनवाई के दौरान कर रहा था जिसमें आरोप लगाया गया है कि बंगाली भाषी मुसलमानों को बिना कानूनी प्रक्रिया अपनाए बांग्लादेश भेजा जा रहा है. याचिका वेस्ट बंगाल माइग्रेंट वर्कर्स वेलफेयर बोर्ड ने दायर की है. याचिकाकर्ता ने दावा किया कि मई 2025 में गृह मंत्रालय द्वारा जारी सर्कुलर के आधार पर प्रवासी मजदूरों को मनमाने ढंग से हिरासत में लिया जा रहा है और सीधे डिपोर्ट कर दिया जा रहा है.
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में पहले ही केंद्र और ओडिशा, राजस्थान, महाराष्ट्र, दिल्ली, बिहार, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, हरियाणा और पश्चिम बंगाल को नोटिस जारी किया था. इस सुनवाई में अदालत ने गुजरात को भी पक्षकार बनाया, जिससे अब कुल 10 राज्य इस मामले में शामिल हो गए हैं.
पथरगाम आतंकी हमले के बाद आया था सर्कुलर
यह पूरा विवाद 22 अप्रैल को पहलगाम आतंकी हमले के बाद सामने आया था जिसमें 26 लोगों की जान गई थी. इसके बाद गृह मंत्रालय ने अवैध प्रवासियों को चिन्हित कर “पुश-बैक” की कार्रवाई तेज करने का सर्कुलर जारी किया था. याचिकाकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने अदालत को बताया कि कई बार BSF के जवान प्रवासियों से कहते हैं, “या तो भाग जाओ, नहीं तो गोली मार देंगे.”
जस्टिस बागची ने कहा कि अगर कोई व्यक्ति भारतीय सीमा के अंदर आ चुका है तो उसे वापस भेजने के लिए एक ठोस प्रक्रिया होनी चाहिए. केवल भाषा के आधार पर उसे विदेशी मान लेना पक्षपातपूर्ण होगा. जस्टिस सूर्यकांत ने केंद्र से पूछा कि अवैध प्रवासियों को पकड़ने और बांग्लादेश भेजने में कौन-सा SOP अपनाया जा रहा है. अदालत ने साफ किया कि सुरक्षा और मानवीय अधिकार– दोनों पहलुओं को संतुलित करना जरूरी है.
केंद्र की दलील: ‘भारत अवैध प्रवासियों की राजधानी नहीं’
केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि यह याचिका संगठन की ओर से नहीं, बल्कि प्रभावित व्यक्तियों को लानी चाहिए थी. उन्होंने कहा-
भारत दुनिया का अवैध प्रवासियों का राजधानी नहीं बन सकता. यह सुनियोजित घुसपैठ है और ऐसे एजेंट भी हैं जो इन्हें अंदर लाते हैं.
मेहता ने कहा कि सरकार केवल यह सुनिश्चित करना चाहती है कि प्रवासी हमारी संसाधनों पर बोझ न बनें. सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से एक हफ्ते में रिपोर्ट मांगी है और साफ किया है कि अदालत यह जानना चाहती है कि अवैध प्रवासियों के खिलाफ उठाए जा रहे कदम कानूनी दायरे में हैं या नहीं. अब सबकी निगाहें केंद्र सरकार के उस जवाब पर टिकी हैं जिसमें बताएगा कि डिटेंशन, जांच और डिपोर्टेशन की क्या प्रक्रिया अपनाई जाती है.





