कृष्ण के तीसरी आंख खोलने का एक प्रसंग महाभारत के कर्ण पर्व में आता है, जब वे अर्जुन को अपना विराट रूप दिखाते हैं. कुछ लोकप्रिय कथाओं और भागवत परंपराओं में इसका जिक्र है.
तब कृष्ण ने तीसरी आंख खोली
उसी क्षण का फायदा अर्जुन ने उठाया
इसी क्षण का फायदा उठाकर अर्जुन ने कर्ण पर प्रहार किया. उसका वध कर दिया. लेकिन अगर उस दिन वो अस्त्र चल गया होता तो शायद अर्जुन नहीं बच पाते. कृष्ण की तीसरी आंख ब्रह्मांडीय शक्ति और दिव्य ज्ञान का प्रतीक है. इस घटना में कृष्ण ने अपने विष्णु स्वरूप का आभास दिया, जिससे कर्ण समेत सभी योद्धा विस्मित हो गए.

महाभारत के युद्ध में अर्जुन के रथ के सारथी बने हुए भगवान कृष्ण ने कर्ण के अस्त्र को रोकने के लिए तीसरी आंख खोली. (News18 AI)
जब अश्वतथामा के खिलाफ तीसरा नेत्र खुला
महाभारत में अश्वत्थामा और कृष्ण के बीच एक ऐसा ही एक प्रसंग आता है, जहां कुछ कथाओं में कृष्ण अपना तीसरा नेत्र खोलते हैं. यह घटना सौप्तिक पर्व (रात्रि हत्याकांड) के बाद घटी, जब अश्वत्थामा ने ब्रह्मास्त्र छोड़कर पांडवों के वंश को नष्ट करने का प्रयास किया था. पहले तो अश्वतथामा ने पांडवों के कैंप में घुसकर शिखंडी और पांचों पांडवों पुत्रों की हत्या कर दी. फिर वह वहां से निकल भागा.
इससे बच गया पांडवों का वंश

भगवान कृष्ण ने अपना तीसरा नेत्र खोलकर अगर अश्वतथामा के ब्रह्मास्त्र को रोका नहीं होता तो गर्भ में पल रहा पांडवों का आखरी वंशज नष्ट हो गया होता. ( News18 AI)
तब कृष्ण को इसे रोकने के लिए अपनी तीसरी आंख खोलनी पड़ी. जब कृष्ण ने अश्वत्थामा के ब्रह्मास्त्र को रोकने के लिए तीसरा नेत्र खोला, तो उसकी ऊर्जा से पृथ्वी कांप उठी थी. हरिवंश पुराण और क्षेत्रीय लोककथाओं के साथ महाभारत में भी ये बताया गया है कि कृष्ण ने अपनी दिव्य शक्ति प्रकट की और तीसरा नेत्र खोला. कृष्ण ने नरकासुर के वध के लिए भी अपना तीसरा नेत्र खोला था.
कृष्ण अपना तीसरा नेत्र क्यों बंद रखते थे
भगवान कृष्ण के तीसरे नेत्र (दिव्य नेत्र) को बंद रखने के पीछे गहरे आध्यात्मिक और लौकिक कारण थे. कृष्ण का तीसरा नेत्र ब्रह्मांडीय शक्ति, ज्ञान और विनाशक ऊर्जा का प्रतीक है. इसे शिव के तीसरे नेत्र (ज्ञान और प्रलय का स्रोत) और विष्णु के सुदर्शन चक्र (संहारक शक्ति) का मिलाजुला रूप माना जाता था.
भगवान शिव ने कई बार खोला था तीसरा नेत्र
पौराणिक कथा के अनुसार, जब भगवान शिव गहन ध्यान में थे, तब कामदेव ने देवी पार्वती के अनुरोध पर उनके ध्यान को भंग करने की कोशिश की. इससे शिव क्रोधित हो गए और उन्होंने अपनी तीसरी आंख खोल दी, जिसकी ज्वाला से कामदेव भस्म हो गए. यह घटना बताती है कि तीसरी आंख क्रोध और अज्ञान के विनाश का प्रतीक है.
एक और कथा के अनुसार, अंधकासुर नाम के एक असुर ने घोर तपस्या करके यह वरदान प्राप्त कर लिया था कि उसके शरीर से निकलने वाले रक्त की हर बूंद से एक और अंधकासुर पैदा हो जाएगा. जब वह भगवान शिव से युद्ध कर रहा था, तब शिव ने अपनी तीसरी आंख का उपयोग करके उसके रक्त को सोख लिया, जिससे नए असुर पैदा नहीं हुए और शिव ने उसका वध कर दिया.
माता दुर्गा और माता काली को कभी-कभी उनकी संहारक शक्ति को दर्शाने के लिए तीसरी आंख के साथ दिखाया जाता है.





