भारत » Radhakrisnan Birthday: आजादी के बाद डॉ. राधाकृष्णन ने कैसे रूस से ठीक किए थे रिश्ते, कश्मीर पर दिलाया समर्थन, स्टालिन को बनाया मुरीद

Radhakrisnan Birthday: आजादी के बाद डॉ. राधाकृष्णन ने कैसे रूस से ठीक किए थे रिश्ते, कश्मीर पर दिलाया समर्थन, स्टालिन को बनाया मुरीद

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Dr Sarvepalli Radhakrishnan: भारत के महान शिक्षाविद और दार्शनिक डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की ख्याति केवल भारत तक सीमित नहीं थी. दार्शनिक के तौर पर उन्हें विदेशों में भी खूब मान-सम्मान मिला. देश के दूसरे राष्ट्रपति डॉ. राधाकृष्णन एक कुशल और चतुर राजनयिक भी थे. कहा जाता है कि इस मामले में वे चाणक्य की परंपरा का पालन करते थे, जिन्हें पता था कि कब और कहां क्या करना है. जब उन्हें सोवियत संघ में राजदूत (1949-52) बनाकर भेजा गया, तो उन्होंने भारत के खिलाफ बनी नकारात्मक धारणा को बदलने का बेहतरीन काम किया. रूस में लंबे समय तक रहे अशोक कपूर ने अपनी किताब ‘द डिप्लोमेटिक आइडियाज एंड प्रैक्टिसेस ऑफ एशियन स्टेट्स’ में लिखा है कि 1949 में जब राधाकृष्णन को मॉस्को में राजदूत के रूप में भेजा गया तो उनका काम बेहद चुनौतीपूर्ण था.

उस समय सोवियत संघ और वहां के राष्ट्रपति जोसेफ स्टालिन की भारत के बारे में अच्छी राय नहीं थी. उस दौर में दोनों देशों के बीच रिश्ते बहुत अच्छे नहीं थे. मॉस्को में भारत की छवि नकारात्मक थी. सोवियत संघ का मानना था कि भारत अपनी आजादी के बाद भी साम्राज्यवादी ताकतों के इशारों पर काम कर रहा है. मॉस्को के समाचार पत्र भारत को साम्राज्यवादियों का पिछलग्गू बताकर खबरें लिखते थे. राधाकृष्णन को उनके जन्मदिन 5 सितंबर को याद किया जाता है. एक शिक्षाविद् के रूप में उनके बेदाग करियर और उनके सम्मान में 5 सितंबर को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है.

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विजयलक्ष्मी पंडित की असफलता
भारत ने स्वतंत्रता मिलने के बाद विजयलक्ष्मी पंडित को सोवियत संघ में अपना पहला राजदूत नियुक्त किया था. उन्होंने स्टालिन से मिलने के कई प्रयास किए, लेकिन उन्हें कभी अनुमति नहीं मिली. स्टालिन उन्हें अभिमानी और बहुत ज्यादा कुलीन मानते थे. इस वजह से विजयलक्ष्मी पंडित मॉस्को में दो साल तक केवल भारतीय दूतावास तक ही सीमित रहीं. आखिरकार उन्हें बिना किसी सफलता के वापस लौटना पड़ा. माना जाता है कि स्टालिन उनसे संतुष्ट नहीं थे.

जब राधाकृष्णन मास्को से लौटे तो स्टालिन उनके मुरीद बन चुके थे.
राधाकृष्णन के सामने कठिन चुनौती
ऐसे माहौल में यह समझना आसान है कि जब डॉ. राधाकृष्णन को विजयलक्ष्मी की जगह मॉस्को भेजा गया, तो उनके सामने कितनी बड़ी चुनौती थी. मॉस्को जाने से पहले राधाकृष्णन संयुक्त राष्ट्र में भारत के राजदूत थे. अब उन्हें स्टालिन से रिश्ते सुधारने थे, जो बहुत मूडी थे और अगर एक बार उनके मन में कोई धारणा बन जाती तो वह जल्दी नहीं बदलती थी. स्टालिन ने भारत और प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के खिलाफ एक नकारात्मक धारणा बना रखी थी.

सिर्फ दो घंटे की नींद और दर्शन का प्रचार
राधाकृष्णन एक चतुर दार्शनिक थे. उन दिनों रूस में दार्शनिकों को बहुत सम्मान दिया जाता था, इसलिए उन्होंने मॉस्को में अपनी इस छवि का पूरा फायदा उठाया. उन्होंने मॉस्को के राजनयिक हल्कों में यह प्रचार करवाया कि वे रात में सिर्फ दो घंटे सोते हैं और बाकी समय दर्शन की किताबें लिखने में बिताते हैं. दिन में वे एक राजनयिक के रूप में अपनी भूमिका निभाते थे. इससे वे एक रहस्यमयी व्यक्तित्व बन गए.

स्टालिन पर चल गया जादू
यह प्रचार बहुत कारगर साबित हुआ. राधाकृष्णन की सोवियत संघ में एक अलग छवि बनने लगी. जब उन्होंने स्टालिन से मिलने का समय मांगा, तो उन्हें तुरंत अनुमति मिल गयी. भारतीय दूतावास ने विदेश मंत्रालय को भेजे गए संदेश में बताया कि पहली मुलाकात बहुत उपयोगी रही, जिसने भारत के बारे में स्टालिन की कई धारणाओं को बदल दिया. राधाकृष्णन ने भारत के बारे में फैली कई गलतफहमियों को दूर किया. अपनी आदत के विपरीत इस मुलाकात में स्टालिन हंसे और उनका व्यवहार भी अनौपचारिक था.

डॉ. राधाकृष्णन के लिए राजदूत के रूप में मास्को में हालात आसान नहीं थे.
कश्मीर पर लिया स्टालिन का समर्थन
राधाकृष्णन ने न केवल सोवियत संघ के साथ घनिष्ठ संबंधों की नींव रखी, बल्कि कश्मीर पर भारत का अटूट समर्थन करने के लिए उसे राजी करने में भी कामयाब रहे. एक ऐसी प्रतिबद्धता जो सोवियत संघ के पतन के बाद भी कायम रही. अनुभवी राजनयिक महाराजा कृष्ण रसगोत्रा ​​ने अपने संस्मरण ‘ए लाइफ इन डिप्लोमेसी’ में राधाकृष्णन को मॉस्को भेजने के निर्णय को उस विशेष समय में इस पद के लिए (प्रधानमंत्री जवाहरलाल) नेहरू की सबसे कल्पनाशील पसंद बताया है. रसगोत्रा ने कहा, “स्टालिन को भारत की स्वतंत्रता की वास्तविकता, शीत युद्ध के तनावों पर भारत की गहरी चिंता और शांति तथा रूस के साथ मित्रता और सहयोग की उसकी इच्छा के बारे में आश्वस्त होना था. सामान्य कूटनीतिक दृष्टिकोण से कोई लाभ नहीं होता और राधाकृष्णन ही इस जटिल कार्य के लिए उपयुक्त व्यक्ति थे.”

सफलतापूर्वक मिशन पूरा कर लौटे
करीब ढाई साल बाद राधाकृष्णन मॉस्को से भारत लौटने वाले थे. उन्हें 8 अप्रैल को वापस जाना था. इसके ठीक तीन दिन पहले उन्होंने स्टालिन से मिलने का समय मांगा. स्टालिन, जो आमतौर पर विदेशी राजदूतों को लंबा इंतजार कराते थे, उन्होंने तुरंत समय दे दिया. तब तक राधाकृष्णन स्टालिन के सामने भारत की एक अलग ही सकारात्मक छवि बना चुके थे और नेहरू को मॉस्को के करीब लाने में भी कामयाब रहे थे. अपनी आखिरी मुलाकात में भी उन्होंने भारत के बारे में बची-खुची गलतफहमियों को दूर किया.

1954 में भारत रत्न से सम्मानित
राधाकृष्णन ने 1952 से उपराष्ट्रपति के रूप में दो कार्यकाल पूरे किए, उसके बाद उन्होंने दूसरे राष्ट्रपति (1962-67) के रूप में अपना कार्यकाल पूरा किया. उनके कार्यकाल में दो प्रधानमंत्रियों की मृत्यु हुई. 1931 में उन्हें नाइट की उपाधि दी गई थी, जिसे उन्होंने स्वतंत्रता के बाद त्याग दिया. लेकिन भारत ने उन्हें 1954 में राष्ट्र के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न की स्थापना के समय इसके प्रथम तीन प्राप्तकर्ताओं में शामिल करके उचित मान्यता दी. अन्य प्राप्तकर्ताओं में सी. राजगोपालाचारी और नोबेल पुरस्कार विजेता सी.वी. रमन शामिल थे.

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