चीन का “विक्ट्री डे” यानि विजय दिवस दूसरे विश्व युद्ध से जुड़ा हुआ है. दरअसल में जापान ने हमला करके चीन के बड़े भूभाग पर कब्जा कर लिया। फिर आठ साल तक चीन उससे युद्ध करता रहा, जिसमें बहुत से लोगों की जानें गईं. दूसरे विश्व युद्ध में हार के बाद जापान ने 2 सितंबर को आत्म समर्पण किया तो चीन ने 3 सितंबर को विजय दिवस मनाया. बाद में चीन में इसको मनाया जाना बंद ही कर दिया गया था. मौजूदा चीनी प्रेसीडेंट शी जिनपिंग के आने के बाद वर्ष 2015 से इस दिन को फिर धूमधाम से मनाया जाना शुरू हुआ.
दरअसल दूसरा वर्ल्ड वार एशिया में 1937 से ही शुरू हो चुका था, जब जापान ने चीन पर हमला किया, इसे दूसरा चीन-जापान युद्ध भी कहा जाता है. चीन का बहुत सा हिस्सा जापान के कब्जे में चला गया. चीन इसे पाने के लिए 8 साल तक मुकाबला करता रहा. वास्तव में उसको जो जीत मिली, उसमें उसकी भूमिक कम और अमेरिका के साथ फ्रांसीसी सेना की ज्यादा थी.
चीन विक्ट्री डे का इस्तेमाल यह दिखाने के लिए करता है कि वह जापानी साम्राज्यवाद जैसी विदेशी आक्रामकता का डटकर मुकाबला कर चुका है. भविष्य में भी बाहरी दबाव के आगे नहीं झुकेगा.
जब जापान ने 2 सितंबर को मित्र सेनाओं के सामने आत्मसमर्पण किया तो ये चीन के लिए यह जापानी आक्रामकता पर जीत थी, हालांकि पश्चिमी दुनिया इसे वर्ल्ड वार सेकेंड जीत मानती है.जब 2 सितंबर 1945 को जापान ने औपचारिक रूप से आत्मसमर्पण किया तो चीन ने अगले दिन यानि 3 सितंबर को, अपनी विजय तिथि घोषित की.
चीन परेड के जरिए ताकत दिखाता है
इस दिन चीन अपनी ताकत का प्रदर्शन परेड के जरिए करता है. पिछले 11 सालों से विजय दिवस को बहुत धूमधाम से बड़े पैमाने पर मनाया जाने लगा है, इसके जरिए चीन अपनी ताकत को दुनिया के सामने शोकेज करने की कोशिश करता है.
चीन के करोड़ों सैनिक और लोग मारे गए थे
चीन की जापान के खिलाफ लड़ाई में करोड़ों चीनी नागरिक और सैनिक मारे गए. केवल 1937 के नानकिंग नरसंहार में ही लाखों मारे गए. चीन इस दिन पर यह भी बताता है कि अमेरिका, ब्रिटेन और सोवियत संघ जैसे सहयोगी देशों ने उसकी मदद की. इसी वजह से चीन के रिश्ते हमेशा से जापान से तनावपूर्ण रहे हैं और आज भी उनके रिश्तों में तनातनी का भाव ही रहता है. चीन के लिए जापान कभी अच्छा पड़ोसी नहीं रहा है.
जिनपिंग ने इसे धूमधाम से मनवाना शुरू किया
जब इस युद्ध विजय की 70वीं वर्षगांठ वर्ष 2015 में हुई तो बहुत सालों बाद इस आयोजन को फिर से शुरू करते हुए भव्य सैन्य परेड आयोजित की, जिसमें राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने कहा था कि यह जीत “विश्व फासीवाद पर जीत” थी. जिसमें चीन का मुख्य योगदान था.
जापान ने चीन के एक तिहाई हिस्से पर कब्जा कर लिया था
आइए अब ये जानते हैं कि किस तरह जापान ने 30 के दशक में चीन के इलाकों पर कब्जा शुरू कर दिया था. और दोनों पड़ोसी देशों के बीच जबरदस्त तनाव की शुरुआत हो चुकी थी. 1931 में जापान ने मंचूरिया (उत्तर-पूर्वी चीन) पर कब्ज़ा कर लिया. वहां अपना कठपुतली “मंचुकुओ” शासन स्थापिक कर दिया. यह इलाका लगभग 10 लाख वर्ग किलोमीटर था. यहां जापान ने अपनी कुआतुंग आर्मी यहां तैनात कर दी. प्राकृतिक संसाधनों का दोहन शुरू कर दिया. चीन ने इसका विरोध किया लेकिन तब जापान कहीं ज्यादा ताकतवर था.
चीन के साथ जापान का दूसरा युद्ध 1937 में शुरू हुआ, जिसको दूसरे विश्व युद्ध से भी जोड़ा जाता है. जुलाई 1937 में मार्को पोलो ब्रिज घटना के बाद जापान ने चीन पर बड़े पैमाने पर हमला शुरू कर दिया. धीरे-धीरे जापान ने चीन के पूरब और उत्तर के औद्योगिक और शहरी इलाकों पर कब्ज़ा कर लिया. तब बीजिंग और उत्तरी चीन जापान के कब्जे में चला गया. शंघाई भी जापानी हाथों में चला गया. फिर दिसंबर 1937 में नानजिंग भी चीन के हाथों से निकला. वहां कुख्यात नरसंहार हुआ.
चीन के प्रमुख शहर जापान के कब्जे में चले गए
1938 में जापान ने चीन के प्रमुख औद्योगिक शहर वुहान पर कब्जा कर लिया. चीन के प्रमुख व्यापारिक केंद्र और बड़े बंदरगाह शहर कैंटन पर भी जापानी सेना का कब्जा हो गया. 1940 तक जापान चीन के करीब 25 से 30 फीसदी इलाके को अपने कंट्रोल में ले चुका था. नानजिंग में भी जापान ने कठपुतली सरकार बना दी. ये चीन के लिए बहुत संकट वाली स्थिति थी, क्योंकि उसकी फौजें सारी कोशिश के बाद भी जापान को रोक नहीं पा रहीं थीं.
तब चीन का साथ अमेरिका ने दिया
चीन के पास चोंगकिंग, पश्चिमी और दक्षिण-पश्चिमी चीन जैसे इलाके थे, जहां से चीन ने अमेरिकी मदद लेकर प्रतिरोध जारी रखा. जापान इसके बाद भी बढ़त बनाए हुए था. कुल मिलाकर चीन का लगभग एक-तिहाई हिस्सा जापानी नियंत्रण में था, जिसमें देश का सबसे समृद्ध और रणनीतिक इलाका शामिल था. ये तो चीन की खुशकिस्मत थी कि जापान को मित्र सेनाओं के हाथों हार का सामना करना पड़ा. तब उसकी सेनाओं को उन सारे इलाकों से वापस होने पर मजबूर होना पड़ा, जहां उसने कब्जा किया हुआ था.
जिनपिंग ने इस दिन को फिर तरीके से शुरू किया
3 सितंबर 1945 को चीन की राष्ट्रवादी सरकार ने इस जीत का जश्न मनाने के लिए एक राष्ट्रीय अवकाश की घोषणा की. तब से यह दिन एक प्रतीक बन गया. वैसे इसके बाद इसे हल्के फुल्के तरीके से मनाया जाता रहा गया. 2014 में चीनी सरकार ने इसे एक प्रमुख राष्ट्रीय स्मरण दिवस के रूप में फिर से स्थापित किया. 2015 बहुत बड़े पैमाने पर इसका आयोजन हुआ. इसका उद्देश्य देशभक्ति की भावना को बढ़ावा देना, इतिहास को याद रखना और शहीदों का सम्मान करना है.
अब ये चीन का सबसे प्रमुख राष्ट्रीय समारोह बन चुका है. इसमें चीन के शीर्ष नेता मसलन राष्ट्रपति और पोलित ब्यूरो के सदस्य हिस्सा लेते हैं. राष्ट्रीय ध्वज फहराया जाता है और राष्ट्रगान होता है.
चीन आज भी जापान से घृणा करता है
चीन आज भी जापानी के आक्रमण को “मूल पाप” के रूप में देखता है. चीन का मानना है कि जापान ने कभी भी अपने युद्ध अपराधों के लिए पर्याप्त और ईमानदारी से पश्चाताप नहीं किया.
जापान के तत्कालीन प्रधानमंत्रियों का यासुकुनी मंदिर में जाना चीन में भारी आक्रोश पैदा करता है. चीन मानता है कि चीनी प्रधानमंत्री इस मंदिर में उन जापानी सैन्य अधिकारियों की आत्माओं की पूजा करने जाते हैं, जिन्हें चीन शीर्ष युद्ध अपराधी मानता आया है.चीन इसे जापान के सैन्यवादी और साम्राज्यवादी अतीत को गौरवान्वित करना मानता है.
चीन आरोप लगाता है कि जापान अपनी स्कूली पाठ्यपुस्तकों में नानजिंग नरसंहार जैसी घटनाओं को हल्के ढंग से पेश करता है या उसे विकृत करता है, जिससे युवा पीढ़ी सही इतिहास नहीं जान पाती. दोनों ही एशिया के प्रमुख शक्तिशाली देश हैं. क्षेत्र में प्रभुत्व के लिए एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी हैं. दिलचस्प बात यह है कि इतने तनाव के बावजूद चीन और जापान एक-दूसरे के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण आर्थिक साझीदार हैं. जापान चीन के लिए एक प्रमुख निवेशक और उन्नत प्रौद्योगिकी का स्रोत है.