खेल » फिल्म की नाकामी से तड़प रहे थे शैलेंद्र, अचानक पहुंच गए राज कपूर, लिखवा लिया कालजयी गाना

फिल्म की नाकामी से तड़प रहे थे शैलेंद्र, अचानक पहुंच गए राज कपूर, लिखवा लिया कालजयी गाना

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नई दिल्ली: शैलेंद्र हिंदी सिनेमा के सुनहरे दौर के सबसे मशहूर गीतकारों में से एक थे. उनका जन्म 30 अगस्त 1923 को रावलपिंडी (अब पाकिस्तान में) हुआ था. वे सामान्य परिवार से ताल्लुक रखते थे. शैलेंद्र ने अपनी गहरी सोच, सरल मगर असरदार शब्दों और भावनाओं से भरे गीतों के जरिए फिल्मी दुनिया में अमिट छाप छोड़ी. गीतकार ने राज कपूर के साथ मिलकर कई यादगार गीत दिए, जिनमें ‘आवारा हूं’, ‘मेरा जूता है जापानी’, और ‘दिल का हाल सुने दिलवाला’ जैसे सदाबहार गाने शामिल हैं.

शैलेंद्र के गीत आम आदमी की संवेदनाओं से जुड़ते थे, यही वजह है कि उनके लिखे शब्द हर तबके के लोगों के दिलों को छू जाते थे. फिल्म इंडस्ट्री में शैलेंद्र को एक ऐसे गीतकार के रूप में जाना जाता है, जिन्होंने कविता को गीतों के रूप में ढाला और जिंदगी की सच्चाइयों को बेहद सहजता से शब्दों में पिरोया. उन्होंने न सिर्फ रोमांटिक और जोशीले गीत लिखे, बल्कि सामाजिक मुद्दों को भी अपने शब्दों के जरिए पर्दे पर उतारा. उनका पूरा नाम शंकरदास केसरीलाल शैलेंद्र था.

‘मेरा नाम जोकर’ के लिए लिखा कालजयी गाना
आज हम उनके एक सदाबहार गाने ‘जीना यहां मरना यहां’ की बात करेंगे. उन्होंने इसे राज कपूर के लिए लिखा था. इस गाने से जुड़ा एक मजेदार किस्सा है. इसमें जो दर्द है, वो असल में शैलेंद्र ने अपने जीवन में झेला था. भारतीय सिनेमा के इतिहास के सबसे मशहूर गीतों में से एक ‘जीना यहां मरना यहां’ 1970 की फिल्म ‘मेरा नाम जोकर’ का है. एक फिल्म की असफलता के बाद शैलेंद्र ने इसे लिखा था. इसका जिक्र ‘गीतों का जादूगर: शैलेंद्र’ किताब में है. इसे ब्रज भूषण तिवारी ने लिखा है.

भारी कर्ज में डूब गए थे शैलेंद्र
दरअसल, 1966 में शैलेंद्र ने अपनी पहली और आखिरी फिल्म ‘तीसरी कसम’ का निर्माण किया था. उन्हें इस फिल्म से बहुत उम्मीदें थीं, लेकिन यह बॉक्स-ऑफिस पर बुरी तरह फ्लॉप हो गई. फिल्म ने भले ही नेशनल अवॉर्ड जीता, पर इसकी कमर्शियल विफलता ने शैलेंद्र को आर्थिक और भावनात्मक रूप से तोड़ दिया. वे भारी कर्ज में डूब गए और गहरे सदमे में थे. इसी मुश्किल समय में उनके करीबी दोस्त राज कपूर ने उनसे फिल्म ‘मेरा नाम जोकर’ के लिए एक गीत लिखने को कहा. राज कपूर, जो शैलेंद्र के मन को अच्छी तरह समझते थे, एक ऐसा गीत चाहते थे जो फिल्म की आत्मा बने.

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गीतकार शैलेंद्र की फिल्म ‘तीसरी कसम’ बुरी तरह फ्लॉप रही थी. (फोटो साभार: IANS)

एक ही बार में लिख डाला पूरा गाना
जब शैलेंद्र राज कपूर से मिलने आए, तो वे बहुत थके हुए और परेशान लग रहे थे. राज कपूर ने उन्हें बिठाया और गाने की थीम समझाई. गाने को एक जोकर के जीवन के बारे में होना था, जिसे अपने अंदर के दर्द और दुख के बावजूद दर्शकों के लिए हमेशा मुस्कुराते रहना पड़ता है. यह गीत जीवन, मृत्यु और एक कलाकार के अस्तित्व के सच्चे अर्थ का सार बनने वाला था. शैलेंद्र ने खामोशी से सब कुछ सुना. राज कपूर ने देखा कि वे आज कुछ ज्यादा शांत थे. राज कपूर ने उन्हें गाने की शुरुआती लाइन दी, ‘जीना यहां मरना यहां.’ शैलेंद्र, जो अभी भी गहरी सोच में डूबे थे, इस लाइन को लेते हैं और एक ही प्रवाह में पूरा गाना लिख डालते हैं.

खुद के दर्द को गीत में पिरोया
जब शैलेंद्र ने कागज राज कपूर को थमाया, तो राज कपूर चकित रह गए. ये सिर्फ शब्द नहीं थे, बल्कि एक टूटे हुए इंसान की आत्मा की गहरी संवेदन थी. ‘कल खेल में हम हों न हों, गर्दिश में तारे रहेंगे सदा. भूलोगे तुम, भूलेंगे वो, पर हम तुम्हारे रहेंगे सदा. होंगे यहीं अपने निशां.’ ‘जोकर’ के लिए लिखी गई इन पंक्तियों में शैलेंद्र ने अपने स्ट्रगल को भी बयां कर दिया था. उन्होंने इसे अपने ही दर्द और निराशा की अभिव्यक्ति के रूप में लिखा था. उन्होंने ‘तीसरी कसम’ की असफलता और अपनी आर्थिक परेशानियों से मिली पीड़ा को इस सुंदर कविता में उड़ेल दिया था.

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