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Gunned Down Book Review: पृथीपाल सिंह, भारतीय हॉकी के महान डिफेंडर और तीन बार के ओलिंपिक मेडलिस्ट, विभाजन से उभरे लेकिन यूनिवर्सिटी राजनीति की भेंट चढ़ गए. 1983 में कैंपस में गोली मारकर हत्या हुई, हत्यारे कभी प…और पढ़ें
बुक रिव्यूविभाजन की त्रासदी, हॉकी के मैदान की चमक-दमक और यूनिवर्सिटी पॉलिटिक्स की स्याही– यह तीनों परतें मिलकर एक ऐसी कहानी रचती हैं, जिसे पढ़कर पाठक स्तब्ध रह जाता है. यह कहानी है पृथीपाल सिंह की, भारतीय हॉकी के सुपरस्टार डिफेंडर की, जिनकी जिंदगी जितनी शानदार थी, उतनी ही दर्दनाक उनका अंत हुआ.
ओलिंपिक में जीते कई मेडल
तीन अलग-अलग ओलिंपिक में तीन पदक जीतकर उन्होंने वह कर दिखाया, जो विरले ही कर पाते हैं. 1960 रोम ओलिंपिक में रजत, 1964 टोक्यो ओलिंपिक में स्वर्ण और 1968 मेक्सिको ओलिंपिक में कांस्य. लंबे-चौड़े, दमदार, टिपिकल पंजाबी अंदाज़ वाले पृथीपाल उस दौर के असली सुपरस्टार थे. लेकिन मैदान पर मिली यह सफलता भी उनके जीवन की जटिलताओं को नहीं छिपा सकी.
हॉकी का मैदान ही नहीं, उसके बाहर की राजनीति भी पृथीपाल की जिंदगी का हिस्सा रही. 1960 का गोल्ड मेडल मिस करने का गम उन्हें अंदर तक सालता रहा. 1968 में कप्तानी की उनकी जिद इस हद तक चली गई कि उन्होंने कह दिया, “या तो कप्तानी या फिर टीम में जगह भी नहीं.” उनके ईगो, स्टारडम और जिद ने उन्हें जितना ऊंचाई दी, उतना ही विवादों के घेरे में भी खड़ा किया. संदीप मिश्रा की किताब की खूबसूरती यही है कि उन्होंने पृथीपाल को एकतरफा नहीं दिखाया, बल्कि उनकी अच्छाइयों और कमजोरियों दोनों को ईमानदारी से सामने रखा.
स्पोर्ट्स करियर के बाद पृथीपाल पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी, लुधियाना में डीन स्टूडेंट वेलफेयर बने. यहीं से उनकी जिंदगी ने नया मोड़ लिया. उन्होंने यूनिवर्सिटी कैंपस में फैले भ्रष्टाचार और अनुशासनहीनता के खिलाफ सख्त कदम उठाए और छात्र राजनीति को नियंत्रित करने की कोशिश की. लेकिन यही कोशिश उनकी जिद से टकराई और आखिरकार उनकी मौत का कारण बनी. 20 मई 1983 को यूनिवर्सिटी कैंपस में ही उन्हें गोली मार दी गई. हत्यारे कभी नहीं पकड़े गए. जो भी नाम आए, सबूतों की कमी से बच निकले. यह हत्या सिर्फ़ एक खिलाड़ी की मौत नहीं थी, बल्कि हमारे सिस्टम की नाकामी की गवाही थी.
Gunned Down दरअसल तीन कहानियों का संगम है– विभाजन की पीड़ा, खेल की राजनीति और यूनिवर्सिटी पॉलिटिक्स. लेखक संदीप मिश्रा ने पृथीपाल की जिंदगी को संतुलन के साथ बयान किया है. उन्होंने न सिर्फ़ उनके महान क्षणों को सामने रखा, बल्कि उन पहलुओं को भी उजागर किया जो उनकी गिरावट की वजह बने. साथ ही, हत्या के बाद की जांच में हुई गड़बड़ियों का भी विस्तार से ज़िक्र है, जो हमारे सिस्टम की नाकामी को उजागर करता है.
पृथीपाल की जिंदगी किसी फिल्मी स्क्रिप्ट से कम नहीं थी– विभाजन का दर्द, मैदान का गौरव और अंत में दर्दनाक मौत. लेकिन शायद फिल्म के बजाय किताब ही इस कहानी को कहने का सही माध्यम थी. संदीप मिश्रा की Gunned Down सिर्फ़ एक खिलाड़ी की जीवनी नहीं है, बल्कि भारत की सामाजिक, राजनीतिक और खेली हुई सच्चाइयों का दस्तावेज है. अगर आप हॉकी प्रेमी हैं, खेलों के इतिहास को समझना चाहते हैं या विभाजन और 80 के दशक के पंजाब की हकीकत जानना चाहते हैं, तो यह किताब ज़रूर पढ़नी चाहिए.
New Delhi,Delhi
August 29, 2025, 15:43 IST





