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Kerala High Court | obscene material | IPC section 292 – जब जज ने ही नहीं देखी अश्लील कैसेट तो… हाईकोर्ट ने 20 साल बाद दोषी को किया बरी

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HC News: 20 साल बाद केरल हाईकोर्ट ने अश्लील कैसेट के साथ गिरफ्तार शख्स को बरी कर दिया है. हाईकोर्ट के जज ने कहा है कि लोअर और सेशन कोर्ट के जज ने एक बार भी उस कैसेट को चला कर नहीं देखा कि क्या सच में उसमें अश्ल…और पढ़ें

2-2 जज ने नहीं देखी अश्लील कैसेट तो... 20 साल बाद हाईकोर्ट ने क्यों किया बरी?हाईकोर्ट ने 20 साल बाद एक आरोपी को बरी किया. (AI Iamge)
कोच्चि: केरल हाईकोर्ट ने एक व्यक्ति को 20 साल बाद बरी कर दिया, जिसे अश्लील सामग्री वाले वीडियो कैसेट बेचने के आरोप में दोषी ठहराया गया था और दो साल की सजा सुनाई गई थी.

जस्टिस कौसर एडप्पागथ ने कोट्टायम निवासी हरिकुमार को इस आधार पर बरी कर दिया कि न तो मजिस्ट्रेट कोर्ट जिसने उसे दोषी ठहराया और दो साल की जेल की सजा सुनाई. न ही सेंशन कोर्ट जिसने उसकी सजा को बरकरार रखा उस वीडियो कैसेट को देखा ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि उसमें अश्लील सामग्री है या नहीं.

क्या है वो सेक्शन जिसमें सुनाई गई सजा?

हाईकोर्ट ने कहा कि जब एक वीडियो कैसेट जिसमें कथित तौर पर अश्लील दृश्य होते हैं इस अपराध को आईपीसी की धारा 292 (अश्लील किताबों आदि की बिक्री) के तहत किसी भी दोषी ठहराया जाता है, तो अदालत को इसे देखना और जांचना चाहिए ताकि ‘खुद को यह विश्वास दिला सके कि इसमें अश्लील दृश्य हैं’.

क्यों कोर्ट ने कहा, कैसेट को देखना चाहिए था?

हाईकोर्ट ने फैसले में कहा कि दूसरे शब्दों में जब तक अदालत या न्यायाधीश व्यक्तिगत रूप से वीडियो कैसेट को नहीं देखता और सामग्री में अश्लीलता के बारे में खुद को विश्वास नहीं दिलाते तब तक यह नहीं कहा जा सकता कि अदालत के सामने धारा 292 के तहत अपराध साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत हैं. इसने कहा कि इस मामले में, वीडियो कैसेट की सामग्री की सीधी जांच अदालत द्वारा आवश्यक थी ताकि यह साबित हो सके कि इसमें अश्लील सामग्री है.

हाईकोर्ट ने किया बरी

हाईकोर्ट ने नोट किया कि इस मामले में ऐसा नहीं किया गया था. हाईकोर्ट ने आगे कहा कि ट्रायल कोर्ट और सेशन कोर्ट का सबूत और कानून के बिंदु पर निपटने का पूरा दृष्टिकोण गलत था. कोर्ट ने कहा कि आपराधिक पुनरीक्षण याचिका स्वीकार की जाती है. दोषसिद्धि और सजा को रद्द किया जाता है. याचिकाकर्ता (हरिकुमार) को आईपीसी की धारा 292 के तहत अपराध के लिए दोषी नहीं पाया जाता है और उसे उक्त अपराध से बरी किया जाता है. हरिकुमार ने अपनी याचिका में मजिस्ट्रेट और सत्र अदालत दोनों के फैसलों को चुनौती दी थी.

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