दरअसल, इस्लामाबाद ने हाल ही में अपनी रॉकेट फोर्स बनाने की घोषणा की है, जिसने दक्षिण एशिया में सामरिक संतुलन को लेकर नई बहस छेड़ दी है. विशेषज्ञों के अनुसार, पाकिस्तान का यह कदम पारंपरिक एयर पावर में गिरावट और भारत के मुकाबले जेट विमानों की संख्या घटने के बाद अपनी सैन्य क्षमता को संतुलित करने की कोशिश है. भारतीय वायुसेना के पास वर्तमान में लगभग 600 से अधिक लड़ाकू जेट हैं, जबकि पाकिस्तान एयरफोर्स के पास लगभग 350 जेट हैं. हालांकि, भारत के पास इसके बावजूद फुल स्क्वाड्रन फाइटर जेट नहीं है. भारत ने हाल के वर्षों में राफेल जैसे आधुनिक जेट्स शामिल कर बढ़त बनाई है, वहीं पाकिस्तान चीन से मिले JF-17 और पुराने F-16 पर अधिक निर्भर है. ऐसे में रॉकेट फोर्स को पाकिस्तान अपनी क्विक-रिस्पॉन्स स्ट्राइक कैपेबिलिटी के तौर पर देख रहा है.

भारत को क्या खतरा?
मिलिट्री एक्सपर्ट का मानना है कि पाकिस्तान का रॉकेट फोर्स भारत के लिए सीधे तौर पर नया खतरा नहीं है, लेकिन यह टैक्टिकल मिसाइलों और शॉर्ट-रेंज स्ट्राइक के जरिये दबाव बनाने की रणनीति हो सकती है. चीन से पाकिस्तान की नजदीकी और उसकी रक्षा तकनीक पर निर्भरता भी भारत की चिंता बढ़ा सकती है.

क्या अमेरिका देगा टेक्नोलॉजी?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या अमेरिका पाकिस्तान को रॉकेट फोर्स प्रोजेक्ट में किसी तरह की तकनीकी मदद देगा? हाल के सालों में वाशिंगटन ने पाकिस्तान के साथ रक्षा सहयोग सीमित किया है और उसकी प्राथमिकता भारत के साथ रणनीतिक साझेदारी पर अधिक रही है. हालांकि, कुछ विश्लेषक मानते हैं कि चीन पहले से पाकिस्तान को मिसाइल और रॉकेट सिस्टम में मदद दे रहा है और भविष्य में अमेरिकी अप्रत्यक्ष सहयोग भी नकारा नहीं जा सकता.
क्षेत्रीय सुरक्षा पर असर
विशेषज्ञों के अनुसार, पाकिस्तान की यह पहल भारत के लिए तत्काल खतरे से ज्यादा मनोवैज्ञानिक दबाव और रणनीतिक संकेत है. भारत पहले से ही ब्रह्मोस जैसी सुपरसोनिक मिसाइल और बैलिस्टिक रॉकेट क्षमता रखता है, ऐसे में पाकिस्तान की नई रॉकेट फोर्स ज्यादा एक कैच-अप गेम लगती है, न कि क्षेत्रीय ताकत का संतुलन बदलने वाली पहल.





