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यूक्रेन के साथ युद्ध खत्म करने के लिए रूस की शर्तें काफी कठोर होंगी. वो ना केवल डोनेट्स्क का बाकी हिस्सा चाहता है, बल्कि उनकी मांग है कि यूक्रेन को नाटो की सदस्यता छोड़नी होगी.
पुतिन का लक्ष्य यूक्रेन के कम से कम चार प्रमुख क्षेत्रों को आधिकारिक तौर पर रूस में मिलाना है.यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोदिमीर ज़ेलेंस्की ने मंगलवार शाम को कहा कि पुतिन शेष डोनेट्स्क को युद्ध विराम योजना के भाग के रूप में चाहते हैं. लेकिन यूक्रेनी नेता ने कहा कि कीव इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर देगा. उन्होंने स्पष्ट किया कि इस तरह के कदम से उनकी रक्षात्मक रेखाएं समाप्त हो जाएंगी और मास्को के लिए आगे भी आक्रमण करने का रास्ता खुल जाएगा. रूस वर्तमान में यूक्रेन के लगभग 19 फीसदी हिस्से पर कब्जा कर चुका है. जिसमें क्रीमिया और डोनबास क्षेत्र के कुछ हिस्से शामिल हैं, जिन्हें उसने फरवरी 2022 में पूर्ण पैमाने पर आक्रमण से पहले हथिया लिया था. राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा है कि उन्हें यूक्रेन के लिए प्रमुख क्षेत्र वापस मिलने की उम्मीद है. हालांकि यह अनिश्चित है कि राष्ट्रपति पुतिन किस बात पर सहमत होंगे.
क्या चाहते हैं पुतिन
पुतिन का मानना है कि डोनेट्स्क, लुहांस्क समेत पूर्वी यूक्रेन के हिस्से रूस की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर हैं. जिन्हें वह रूस के प्रभाव क्षेत्र में देखना चाहते हैं. पुतिन का लक्ष्य यूक्रेन के कम से कम चार प्रमुख क्षेत्रों (डोनेट्स्क, लुहांस्क, खेरसन, ज़ापोरिज़िया) को आधिकारिक तौर पर रूस में मिलाना है. जिससे इन्हें भविष्य में कोई भी पश्चिमी समर्थन न मिल सके और रूस का आर्थिक-सामरिक दबदबा क्षेत्र में रहे.
रूस ने यूक्रेन के जिन क्षेत्रों पर कब्जा किया है उन्हें वह अपनी सुरक्षा मजबूत करने के एक हिस्से के रूप में देखता है.
डोनबास (डोनेट्स्क और लुहांस्क): ये पूर्वी यूक्रेन के औद्योगिक क्षेत्र हैं जहां एक बड़ी रूसी-भाषी आबादी रहती है. 2014 से ही यहां रूस-समर्थित अलगाववादी सक्रिय थे. रूस इन क्षेत्रों को एक ‘बफर जोन’ के रूप में देखता है. जो उसकी पश्चिमी सीमा से दूरी बनाए रखने में मदद करता है. रूस ने यूक्रेन पर आरोप लगाया है कि वह इन क्षेत्रों में रहने वाले रूसियों के अधिकारों का हनन कर रहा था, जिसे उसने युद्ध का एक कारण बताया.
रूस को लगता है कि नाटो के विस्तार के चलते अगर यूक्रेन पश्चिम के साथ जुड़ता है, तो उसकी सीमा असुरक्षित हो जाएगी. डोनबास, खेरसन, और ज़ापोरिज़िया जैसे क्षेत्र ले लेने से रूस की सुरक्षा बेल्ट मजबूत हो जाती है. शीत युद्ध के दौरान, नाटो (उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन) को सोवियत संघ के विस्तारवाद को रोकने के लिए बनाया गया था. 1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद रूस को उम्मीद थी कि नाटो का विस्तार नहीं होगा. हालांकि, नाटो ने धीरे-धीरे पूर्वी यूरोप के उन देशों को शामिल करना शुरू कर दिया, जो पहले सोवियत संघ के प्रभाव क्षेत्र में थे. रूस को नाटो के विस्तार से अपनी सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंताएं हैं. यह चिंता रूस-यूक्रेन संघर्ष का एक महत्वपूर्ण कारण है.
यूक्रेन को खेरसन, डोनेट्स्क, लुहांस्क और ज़ापोरिज़िया क्षेत्रों पर दावा छोड़कर इन्हें रूस के हवाले करना होगा. यूक्रेन को नाटो की सदस्य बनने की अपनी इच्छा हमेशा के लिए छोड़नी होगी. यूक्रेन को परमाणु हथियार विकसित न करने की गारंटी देनी होगी. रूस यूक्रेन के अंदर रह रहे रूसी समुदायों के अधिकारों और सुरक्षा की गारंटी चाहेगा. कब्जाए गए क्षेत्रों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कानूनी मान्यता देने की मांग करेगा. खासतौर से अमेरिका और पश्चिमी देशों से. रूस पर लगे आर्थिक और राजनीतिक प्रतिबंध (sanctions) हटाने की मांग रखी है. काला सागर वाले व्यापारिक मार्गों पर रूस को नियंत्रण चाहिए, ताकि यूक्रेन की अर्थव्यवस्था दबाव में रहे. इससे रूस का व्यावसायिक रास्तों का नियंत्रण बना रहेगा.
रूस चाहता है कि युद्ध के बाद यूक्रेन पूरी तरह से उसके नियंत्रण या प्रभाव क्षेत्र में रहे. ऐसा समझौता जिससे पश्चिमी देशों की रूस विरोधी नीति कमजोर पड़े या यूक्रेन अपने मुद्दों पर खुदबखुद मुश्किल में आ जाए. क्रीमिया और डोनबास का पूरा क्षेत्र देगा तो यूक्रेन का जमीनी और समुद्री कनेक्शन रूस पर निर्भर हो जाएगा, जो रूस के लिए रणनीतिक जीत होगी.
यूक्रेन व पश्चिमी देशों की प्रतिक्रिया
हालांकि यूक्रेनी राष्ट्रपति जेलेंस्की बार-बार कह चुके हैं कि वे अपनी एक इंच भी जमीन रूस को नहीं देंगे. वहीं, पश्चिम देशों ने पुतिन की शर्तों को सख्त और अस्वीकार्य बताया है. दोनों पक्षों में सुनियोजित समझौता कठिन है क्योंकि रूस की मांगें बहुत कठोर और यूक्रेन की संप्रभुता के खिलाफ हैं. पुतिन के यूक्रेन के कुछ हिस्सों पर नियंत्रण की मांग उसकी सुरक्षा, प्रभाव विस्तार और पश्चिमी देशों को कमजोर करने के लिए है. युद्ध रोकने के लिए रूस की शर्तें कठोर हैं जिनको मानना यूक्रेन के लिए बहुत मुश्किल है. इसलिए फिलहाल स्थायी शांति के आसार कम हैं.
New Delhi,Delhi
August 13, 2025, 12:47 IST





