मनोरंजन » ‘एक्टिंग मत कर, उठ जा’, कोमा में थे राज कपूर, देख टूट गए थे दिलीप कुमार, रोते हुए बोले- माफ कर दे मुझे

‘एक्टिंग मत कर, उठ जा’, कोमा में थे राज कपूर, देख टूट गए थे दिलीप कुमार, रोते हुए बोले- माफ कर दे मुझे

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राज कपूर और दिलीप कुमार की दोस्ती हिंदी सिनेमा के इतिहास की सबसे भावुक और चर्चित कहानियों में से एक रही है. पेशेवर प्रतिस्पर्धा के बावजूद दोनों के बीच गहरा अपनापन था. जब राज कपूर कोमा में थे, तब दिलीप कुमार बुरी तरह टूट गए थे. कैसी थी दोनों की आखिरी मुलाकात, अस्पताल में उस रोज क्या हुआ था? ये सिर्फ एक मुलाकात नहीं थी, बल्कि सिनेमा के दो उस्तादों के बीच उस रिश्ते की दास्तान थी, जो परदे की चकाचौंध से परे, बचपन की गलियों और दोस्ती की गहराइयों में बसता था.

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नई दिल्ली. 2 जून साल 1988, अस्पताल के उस सन्नाटे भरे कमरे में वक्त जैसे ठहर गया था. शोमैन राज कपूर जिंदगी और मौत के बीच खामोश पड़े थे. तभी दरवाजा खुला और अंदर दाखिल हुए उनके सबसे करीबी दोस्त दिलीप कुमार. सामने अपने यार को कोमा में देख दिलीप साहब का दिल टूट गया. उन्होंने कांपते हाथों से राज कपूर का हाथ थामा और भर्राई आवाज में कहा- ‘राज, एक्टिंग मत कर… उठ जा. आज भी मैं देर से आया, माफ कर दे मुझे.’ यह सिर्फ एक डायलॉग नहीं था, बल्कि दशकों पुरानी दोस्ती की पुकार थी, जिसमें यादें थीं, मोहब्बत थी और बिछड़ने का डर भी. उस कमरे में मौजूद हर शख्स समझ रहा था कि यह लम्हा साधारण नहीं है… पर उस आखिरी मुलाकात की कहानी में अभी बहुत कुछ बाकी है. फाइल फोटो. 

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भारतीय सिनेमा के इतिहास में दो ऐसे सितारे हुए, जिनकी दोस्ती ने परदे की प्रतिद्वंद्विता को मात दे दी. ये थे ‘शोमैन’ राज कपूर और ‘ट्रेजेडी किंग’ दिलीप कुमार. 2 जून 1988 को जब राज कपूर ने आखिरी सांस ली तो उनके जाने से सिर्फ एक परिवार नहीं, बल्कि 58 साल पुरानी एक गहरी दोस्ती का भी अंत हुआ. उनकी आखिरी मुलाकात का किस्सा आज भी किसी के भी आंखों में नमी ला देता है. फाइल फोटो. 

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दिलीप कुमार अपने यार राज कपूर को प्यार से ‘लाले दी जान’ नाम से पुकारते थे. जून 1988 की शुरुआत में राज कपूर की तबीयत काफी खराब हो गई थी और उन्हें दिल्ली के अपोलो अस्पताल में भर्ती कराया गया था. उधर, उनके सबसे करीबी दोस्त दिलीप कुमार उन दिनों एक कार्यक्रम में शामिल होने पाकिस्तान गए हुए थे. फाइल फोटो. 

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‘लाले दी जान’ के बीमार होने की खबर लगी, वह तुरंत मुंबई लौटे और वहां से सीधे दिल्ली के लिए फ्लाइट पकड़ ली. अस्पताल पहुंचकर उन्होंने देखा कि राज कपूर कोमा में हैं, बेहोश हैं और परिवार वाले बिस्तर के आसपास मौजूद हैं. फाइल फोटो. 

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इस भावुक पल को राज कपूर के बेटे और ऋषि कपूर ने दिलीप कुमार की बायोग्राफी में अपने शब्दों में लिखा था. ऋषि कपूर ने लिखा, ‘मुझे साफ याद है कि कैसे वह (दिलीप कुमार) कमरे में दाखिल हुए जहां पापा बेहोश पड़े थे. उन्होंने एक कुर्सी खींची, पापा का हाथ अपने हाथों में लिया और बोलना शुरू किया, ‘राज, आज भी मैं देर से आया। माफ कर दे मुझे… मुझे पता है तुझे सुर्खियों में रहना पसंद है. काफी है, उठो और बैठो, मेरी बात सुनो’. फाइल फोटो. 

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उन्होंने अपने बचपन की यादों का सहारा लेते हुए राज कपूर से गुहार लगाई, ‘मैं अभी पेशावर से लौटा हूं और तेरे लिए चपली कबाब की खुशबू लाया हूं. हम दोनों साथ में बाजार चलेंगे, जैसे पुराने दिनों में जाया करते थे और कबाब-रोटियां खाएंगे. राज, उठो और ये एक्टिंग बंद करो. मैं जानता हूं तुम एक महान एक्टर हो.’ फाइल फोटो. 

दिलीप कुमार ने आखिरी कोशिश करते हुए कहा, ‘राज, मैनू लै जाणा है तुसी पेशावर दे घर दे आंगन विच’ (राज, मुझे अपने साथ पेशावर वाले घर के आंगन में ले चलो). ऋषि कपूर ने लिखा कि यह कहते-कहते उनकी आवाज भर्रा गई थी और आंखों से आंसू बह रहे थे. वह कमरे से बाहर निकलते वक्त दरवाजे पर रुके और एक आखिरी बार अपने बेजान दोस्त की तरफ देखा. उसी शाम, 2 जून 1988 को राज कपूर ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया. फाइल फोटो. 

दिलीप कुमार की वह गुहार, वह ‘माफ कर दे मुझे’ और पेशावर के आंगन की वह सैर हमेशा के लिए अधूरी रह गई . ये सिर्फ एक मुलाकात नहीं थी, बल्कि सिनेमा के दो उस्तादों के बीच उस रिश्ते की दास्तान थी, जो परदे की चकाचौंध से परे, बचपन की गलियों और दोस्ती की गहराइयों में बसता था. राज कपूर की मौत के बाद दिलीप कुमार हमेशा उन्हें याद करते रहे. फाइल फोटो. 

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