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Russia-Ukraine War | UN Ukraine ceasefire resolution | रूस-यूक्रेन युद्ध: UN में भारत, चीन, अमेरिका ने वोटिंग से किनारा किया

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Russia-Ukraine War: रूस-यूक्रेन जंग पर भारत,चीन और अमेरिका साथ-साथ हैं. संयुक्त राष्ट्र में रूस-यूक्रेन युद्ध पर यूक्रेन ने एक अहम प्रस्ताव पेश किया. मंगलवार को इस प्रस्ताव पर वोटिंग हुई. मगर दुनिया दो हिस्सों में बंट गई. यूक्रेन का मकसद युद्धविराम पर सपोर्ट लेना था. मगर भारत संयुक्त राष्ट्र महासभा में रूस-यूक्रेन युद्ध वाले प्रस्ताव पर हुए वोटिंग में शामिल नहीं हुआ. भारत वाली कतार में अमेरिका और चीन भी खड़ा हो गया. यानी इन देशों ने भी इस वोटिंग से खुद को दूर रखा. दरअसल, यूक्रेन के इस प्रस्ताव में पूरी तरह और बिना शर्त युद्धविराम की मांग की गई थी. इसे यूएन यानी संयुक्त राष्ट्र महासभा में 24 फरवरी को रूस-यूक्रेन युद्ध के चार साल पूरे होने पर पेश किया गया. रूस-यूक्रेन युद्ध पर शांति वाले प्रस्ताव को 193 सदस्यों वाली संयुक्त राष्ट्र महासभा में से 107 देशों का साथ मिला. जी हां, इस प्रस्ताव के पक्ष में 107 देशों ने वोट किया. 12 देश इसके खिलाफ रहे, जबकि 51 देशों ने वोट नहीं दिया. जिन देशों ने वोटिंग से खुद को दूर रखा, उसमें भारत, अमेरिका और चीन थे.

दरअसल, रूस और यूक्रेन जंग को चार साल हो गए. इस मौके पर संयुक्त राष्ट्र में यूक्रेन ने एक बड़ा दांव खेला. जंग खत्म कराने को लेकर उसने एक प्रस्ताव पेश किया. इसमें यूक्रेन ने रूस से तुरंत, पूरी तरह और बिना शर्त सीजफायर की मांग की गई थी. इसमें यूक्रेन की संप्रभुता, स्वतंत्रता और क्षेत्रीय अखंडता का समर्थन किया गया था. मगर जब वोटिंग हुई तो यूक्रेन के पैरों तले जमीन खिसक गई. उसने सोचा भी नहीं था कि उसका सबसे अहम साथी साथ छोड़ देगा, जिसके दम पर वह जंग लड़ रहा है. जी हां, यूएन में यूक्रेन को अमेरिका से केवल धोखा ही मिला. भारत और चीन की तरह अमेरिका ने भी वोटिंग से दूरी बना ली. इस तरह यूक्रेन को बड़ा झटका लगा और रूस के लिए यह किसी बड़ी जीत से कम नहीं है. अमेरिका का साथ यूक्रेन को नहीं मिलने से रूस पर इंटरनेशनल प्रेशर थोड़ा कम हो जाएगा.

यूएन में क्या हुआ?

संयुक्त राष्ट्र में 193 सदस्य देशों वाली महासभा में प्रस्ताव पर 107 देशों ने पक्ष में वोट दिया. इसमें यूरोपीय संघ के कई देश, ब्रिटेन और इजराइल शामिल थे. 12 देशों ने विरोध में वोट किया. इनमें रूस, बेलारूस, उत्तर कोरिया, ईरान और सूडान थे. मगर सबसे बड़ा ट्विस्ट 51 देशों के अलग रहने वाले फैसले में था. इनमें भारत, अमेरिका, चीन, ब्राजील, यूएई, सऊदी अरब, दक्षिण अफ्रीका, कजाकिस्तान और हंगरी जैसे देश थे. यूक्रेन को उम्मीद थी कि अमेरिका जैसे देश उसके साथ आएंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. इससे प्रस्ताव पास होने के बावजूद यूक्रेन की स्थिति कमजोर दिखी. यहां बताना जरूरी है कि अमेरिका यूक्रेन को जंग लड़ने के लिए पैसा और हथियार मुहैया कराता रहा है. मगर ट्रंप के आने के बाद अमेरिका के रूख में थोड़ा बदलाव दिखा है.

भारत की तरह अमेरिका ने भी यूक्रेन के प्रस्ताव से खुद को अलग रखा है.

भारत, चीन और अमेरिका के साथ आने का मतलब

अब सवाल है कि आखिर भारत, चीन और अमेरिका के एक साथ आने का क्या मतलब? भारत का स्टैंड शुरू से क्लियर है- बातचीत से युद्ध का खात्मा. भारत शुरू से तटस्थ और स्वतंत्र रहा है. वह युद्ध खत्म करवाना चाहता है, मगर बातचीत के जरिए. वह अपने पुराने दोस्त न तो रूस को नाराज करना चाहता और न यूक्रेन को. चीन का भी हाल कुछ ऐसा ही है. चीन भी रूस के विरोध में नहीं जाना चाहता. कारण कि उसे पता है यूक्रेन को हथियार अमेरिका ही दे रहा है. अब डोनाल्ड ट्रंप का यह बदलाव उसकी अमेरिका नीति को लेकर है. डोनाल्ड ट्रंप का मानना है कि अमेरिका ने यूक्रेन पर बहुत पैसे खर्च किए, मगर बदले में उसे कुछ नहीं मिला. वहीं, भारत और चीन से भी अमेरिका अब सीधे टकराव की स्थिति में नहीं आना चाहता है. डोनाल्ड ट्रंप भी रूस से बेहतर रिश्ते चाहते हैं. वह भी बातचीत के जरिए ही मसले को हल करना चाहते हैं. यही कारण है कि अमेरिका भी भारत और चीन वाली कतार में खड़ा हो गया है.

यूक्रेन का दांव उल्टा, रूस की जीत

आखिर यूक्रेन का दांव क्यों उल्टा पड़ा? दरअसल, यूक्रेन ने यह प्रस्ताव लाकर रूस पर दबाव बनाने की कोशिश की थी. मगर अमेरिका ने ही उसे चौंका दिया. अमेरिकी प्रतिनिधि टैमी ब्रूस के मुताबिक, प्रस्ताव में कुछ शब्द ऐसे थे, जो शांति वार्ता में बाधा डाल सकते हैं. वैसे भी डोनाल्ड ट्रंप के दोबारा राष्ट्रपति बनने के बाद अमेरिका की नीति बदली है. अमेरिका रूस से बातचीत पर जोर दे रहा है. चीन भी अलग इसलिए रहा, क्योंकि वह रूस के साथ मिलकर अमेरिकी वर्चस्व को टक्कर देना चाहता है. भारत के तटस्थ रुख से तो दुनिया वाकिफ है ही. कुल मिलाकर अमेरिका के अलावा, साउथ एशिया के के कई देशों ने यूक्रेन का साथ नहीं दिया. इससे उसका दांव फेल हो गया. वैसे भी जंग के मसले पर यूक्रेन के समर्थन में लगातार गिरावट आ रही है. यह घटनाक्रम एक तरह से रूस के लिए बड़ी जीत भी है. इससे साबित होता है कि रूस अब भी मजबूत है, क्योंकि अमेरिका जैसे देश अब सख्त रुख नहीं रख रहे. बता दें कि 2022 से ही रूस-यूक्रेन युद्ध जारी है.

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