मनोरंजन » बाप थिएटर मालिक, बेटे बनना चाहता था आईएएस, खोलनी पड़ी चाय की दुकान, बेचे लॉटरी टिकट, 22 में बना 70 साल का बूढ़ा

बाप थिएटर मालिक, बेटे बनना चाहता था आईएएस, खोलनी पड़ी चाय की दुकान, बेचे लॉटरी टिकट, 22 में बना 70 साल का बूढ़ा

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एक समय था जब वे प्रशासनिक सेवा में जाकर देश की सेवा करना चाहते थे. साफ-सुथरी वर्दी में आईएएस अधिकारी बनने का सपना देखने वाला यह होनहार छात्र परिस्थितियों के आगे मजबूर हो गया. आर्थिक तंगी ने पढ़ाई बीच में ही रुकवा दी और जीवन की दिशा बदल गई. यह कहानी है उस दिग्गज एक्टर की है, जिनकी रगों में थिएटर बचपन से था. उनकी जिंदगी की कहानी बताती है कि हालात चाहे कितने भी कठिन क्यों न हों, जुनून और मेहनत से किस्मत बदली जा सकती है.

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नई दिल्ली. घर में बचपन से घर में रंगमंच का माहौल था, क्योंकि पिता थिएटर कंपनी चलाते थे. कला की समझ विरासत में मिली, लेकिन दिल में सपना था आईएएस बनकर देश की सेवा करने का. पढ़ाई में तेज ये एक्टर बड़े अरमान संजोए आगे बढ़ रहा था, तभी आर्थिक तंगी ने राह बदल दी. हालात इतने कठिन हुए कि पढ़ाई बीच में छोड़नी पड़ी और परिवार का हाथ बंटाने के लिए चाय की दुकान तक खोलनी पड़ी. रंगमंच तो बचपन से साथ था तो संघर्षों के बीच में वो फिर सहारा बना. आईएएस बनने का सपना पीछे छूट गया और थिएटर पहचान बनने लगा. महज 22 साल की उम्र में जब उन्होंने मंच पर 70 साल के बुजुर्ग का किरदार निभाया, तो दर्शक हैरान रह गए. उस एक अभिनय ने साबित कर दिया कि उम्र नहीं, हुनर मायने रखता है. जानते हैं कौन है ये एक्टर? फोटो साभार-@nfdcindia/Instagram

As a child, he did not grow up in comfort. Instead of focusing only on studies, he found himself juggling responsibilities far beyond his age. From helping the family survive to taking up small jobs, survival became more important than ambition. At one point, he even ran a tea stall and sold lottery tickets to support his household.

ये एक्टर और कोई नहीं बल्कि अनु कपूर हैं. मध्य प्रदेश के भोपाल के इटवारा इलाके में जन्में अनु कपूर आज अपनी अदाकारी के दम पर लाखों दिलों पर राज करते हैं, लेकिन उनकी जिंदगी का सफर संघर्षों से भरा रहा है. संघर्ष ने उन्हें मजबूत बनाया और आज वे बॉलीवुड, टेलीविजन और रेडियो के एक बड़े नाम हैं, जिन्होंने लाखों दिलों पर राज किया है. फाइल फोटो

Can you guess who the young dreamer is? Well, he was none other than veteran actor Annu Kapoor, who was born on February 20, 1956, in Itwara, Bhopal. Known today for his powerful performances in cinema, television and radio, Kapoor’s early life was marked by struggle, resilience and a dramatic shift in destiny.

अन्नू कपूर के पिता मदनलाल कपूर पंजाबी मूल के थे, जो एक यात्रा करने वाली पारसी थिएटर कंपनी चलाते थे. मां कमल शबनम कपूर बंगाली ब्राह्मण परिवार से थीं, उर्दू शिक्षिका और प्रशिक्षित शास्त्रीय गायिका भी थी. परिवार में कला की जड़ें थीं, लेकिन आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर थी. मां की सैलरी सिर्फ 40 रुपये महीना थी. कई लोगों को अन्नू कपूर के पिता ने नौकरी दे रखी थी, लेकिन फिर एक दौरा ऐसा आया कि अपनी रोटी के भी लाले पड़ गए. फाइल फोटो

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His father, Madanlal Kapoor, ran a Parsi theatre company, while his mother was an Urdu teacher. Although the family had artistic roots, their financial situation was unstable. Due to economic pressure, Kapoor had to drop out of school, which effectively ended his path toward becoming an IAS officer.

दरअसल, दौर बदला तो थिएटर्स की डिमांड कम होने लगी. ऐसे में धीरे-धीरे उनके पिता का कामधाम कम होने लगा और बचपन से ही अनु को पढ़ाई के साथ परिवार की जिम्मेदारियां निभानी पड़ीं. माध्यमिक शिक्षा के बाद आर्थिक तंगी के कारण स्कूल छोड़ना पड़ा, जिससे आईएएस का सपना अधूरा रह गया. वे कभी एक्टिंग नहीं करना चाहते थे. उन्होंने खुद कहा था, ‘मैं कभी एक्टर नहीं बनना चाहता था.’ गरीबी में उन्होंने चाय की दुकान चलाई, चूरन के नोट बेचे और लॉटरी टिकट बेचे. फाइल फोटो

The turning point came when he stepped into the theatre. Working in his father’s company, he began learning the craft of acting there. As the life happened, the stage became both his classroom and his opportunity. Over time, he honed his skills and discovered a talent that went on to redefine his future plans.

पिता के कहने पर वे उनके थिएटर कंपनी में शामिल हुए. छोटे-छोटे गांवों और शहरों में नाटक करते हुए यात्रा की. उन्होंने 250 से ज्यादा पारसी और फोक थिएटर प्ले में लीड रोल किए. 1976 में भाई रंजीत कपूर के कहने पर नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (एनएसडी) में दाखिला लिया, जहां उन्होंने विश्व थिएटर और साहित्य से रूबरू हुए. प्रमुख नाटकों में ‘अंतिम यात्रा’ (बैरी जॉन), ‘थ्री सिस्टर्स’ (एब्राहम अलकाजी), ‘द ग्रेट गॉड ब्राउन’ और ‘एक रुका हुआ फैसला’ (भाई रंजीत निर्देशित) शामिल हैं. फाइल फोटो

At just 22 years old, Kapoor played the role of a 70-year-old man in a stage production. The performance demanded maturity, depth and transformation. The way he portrayed the role was so convincing that audiences were left stunned. The role did not just earn him applause but it changed the path of his life.

सिर्फ 22 साल की उम्र में उन्होंने एक नाटक में 70 वर्षीय बुजुर्ग का किरदार निभाया, जो उनके करियर का टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ. इस प्रदर्शन ने न सिर्फ दर्शकों का दिल जीता, बल्कि मशहूर फिल्मकार श्याम बेनेगल का ध्यान भी अपनी ओर खींचा. दरअसल, अन्नू कपूर के अभिनय से प्रभावित होकर श्याम बेनेगल ने उन्हें अपनी फिल्म ‘मंडी’ में काम करने का ऑफर दिया. शशि कपूर, नसीरुद्दीन शाह और स्मिता पाटिल जैसे कलाकारों से सजी इस फिल्म के जरिए अन्नू कपूर की मुख्यधारा के सिनेमा में औपचारिक एंट्री हुई. फाइल फोटो

Among those impressed was filmmaker Shyam Benegal, who noticed Kapoor’s performance and recognised the depth and authenticity he brought to the stage. Benegal offered him a role in the film Mandi, a critically acclaimed project that featured an ensemble cast. For Kapoor, this opportunity was his formal entry into mainstream cinema.

इसके बाद 1980 और 1990 के दशक में उन्होंने ‘मिस्टर इंडिया’, ‘तेजाब’, ‘राम लखन’ और ‘घायल’ जैसी कई बड़ी फिल्मों में काम किया. करेक्टर एक्टर के रूप में उन्होंने अपनी एक अलग पहचान बनाई. ‘विक्की डोनर’में उनके सपोर्टिंग रोल के लिए उन्हें फिल्मफेयर और नेशनल फिल्म अवॉर्ड मिला. उन्होंने 100 से ज्यादा फिल्मों में काम किया है. फाइल फोटो

Following this breakthrough, Kapoor went on to appear in several significant films across the 1980s and 1990s. He was seen in Mr India, Tezaab, Ram Lakhan and Ghayal, among others. Over the years, he built a reputation for playing diverse supporting and character roles. His filmography expanded steadily, reflecting his flexibility across genres.

फिल्मों के अलावा अन्नू कपूर ने रेडियो और टेलीविजन पर भी अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई. उनका रेडियो कार्यक्रम ‘सुहाना सफर’ पुरानी यादों को ताजा करने वाला बेहद लोकप्रिय हुआ. वहीं, टेलीविजन पर ‘अंताक्षरी’ की मेजबानी कर उन्होंने हर घर में अपनी पहचान बनाई. ये कार्यक्रम सालों तक चले और हर सप्ताहांत भारतीय परिवारों की पसंद बने रहे. अनु कपूर ने सिंगर, डायरेक्टर, प्रोड्यूसर और कंपोजर के रूप में भी काम किया. फाइल फोटो

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