रमजान के शुरू होने के बाद सोशल मीडिया में खबरें फैल रही हैं कि इजरायल के विध्वंस के बाद गाजा में एक भी मस्जिद नहीं बची है. जानते हैं सच्चाई क्या है. इजरायल जिस तरह गाजा पट्टी में तहस नहस करने का तांडव खेला, उसमें बहुत से धर्मस्थल तबाह हो गए, उसमें मस्जिदें भी थीं. तो ये जानते हैं कि क्या वाकई अब वहां कोई मस्जिद नहीं बची. अब जबकि ये तय हो चुका है कि अमेरिकी प्रेसीडेंट डोनाल्ड ट्रंप की अगुवाई में बोर्ड ऑफ पीस इसे नए तरीके से फिर से बनाएगा. इसे सुंदर रिविएरा बनाया जाएगा, तो क्या यहां धर्मस्थल भी होंगे .
जब तब गाजा अक्टूबर 2023 के इजरायली हमले से पहले महफूज थी, तब तक यहां काफी मस्जिदें थीं. वैसे थे तो चर्च भी लेकिन नाममात्र के. वर्ष 2025 के अंत तक चले इजरायली हमलों ने इस इलाके को करीब करीब जमींदोज ही कर दिया. यहां की रौनकें और इमारतें खंडहरों में बदल गईं. वैसे यहां एक बड़ी चुनौती यहां के मलबे को साफ करना भी है.
क्या गाजा में अब एक भी मस्जिद नहीं बची? अक्टूबर 2023 से पहले वहां कितनी मस्जिदें थीं
– यह धारणा पूरी तरह सही नहीं है कि गाजा में एक भी मस्जिद नहीं बची, ये जरूर कह सकते हैं ये अब अंगुली पर गिनी जा सकती हैं, उनकी भी हालत खस्ता है. गाजा में पहले करीब 1,200-1,300 मस्जिदें थीं, लेकिन इजराइल-हमास युद्ध के दौरान बड़ी संख्या में क्षति हुई है. हमास द्वारा संचालित गाजा मीडिया ऑफिस के अनुसार, इजराइली हमलों में 835 मस्जिदें पूरी तरह नष्ट हो गईं. 180 आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त हुईं. यानि 79% मस्जिदें तबाह हो गईं. कुछ मस्जिदें तो ऐतिहासिक और युूनेस्को हैरिटेज भी थीं. इसमें तीन चर्च भी पूरी तरह नष्ट हुए। हालांकि. कई मस्जिदें जो अभी मौजूद हैं, लोग रमजान में इन्हीं में नमाज पढ़ रहे हैं या उनके खंडहरों में .
आमतौर पर युद्ध में धर्मस्थल को निशाना नहीं बनाया जाता तो इजरायल ने गाजा पट्टी में क्यों ऐसा किया?
– इजराइल का दावा है कि हमास मस्जिदों, अस्पतालों और स्कूलों जैसे नागरिक स्थलों का इस्तेमाल सैन्य उद्देश्यों के लिए करता है, जैसे इनके नीचे से सुरंगें निकालकर उसमें छिपना या हथियार रखना. इसलिए कई मस्जिदें टारगेट बनीं. हालांकि इस हमले में गाजा की सबसे पुरानी और 7वीं सदी की ऐतिहासिक मस्जिद ग्रेट ओमारी नष्ट हुई. फिलिस्तीनी अधिकारियों और संगठनों के साथ युनेस्को का भी आरोप है ये सांस्कृतिक नरसंहार है, जहां ऐतिहासिक स्थलों को जानबूझकर नष्ट किया गया.
गाजा पट्टी में रमजान में लोग कहां नमाज अदा कर रहे हैं
– रमजान शुरू हो चुका है. यहां लोग खंडहरों में या टेंट्स या लकड़ी से बने अस्थायी प्रार्थना स्थलों में नमाज अदा कर रहे हैं. हमास मीडिया के अनुसार, 430 ऐसे अस्थायी प्रेयर एरिया बनाए गए हैं. X पर एक हालिया पोस्ट कहती है कि परिवार खंडहरों में इफ्तार कर रहे हैं और तरावीह पढ़ रहे हैं.
नया गाजा कैसा होगा?
गाजा को लक्जरी डेस्टिनेशन बनाने का प्लान है, जिसमें ग्लास टावर, औद्योगिक जोन, नया एयरपोर्ट और सीपोर्ट होगा. ये काम चार चरणों में होगा. काम गाजा पट्टी के दक्षिणी सिरे से शुरू होगा. इसमें एक लाख से ज्यादा घर होंगे, जो इसके बाशिंदों को ही दिए जाएंगे. 200 से ज्यादा स्कूल और 75 के आसपास मेडिकल सेंटर होंगे. ऐसा लगता है कि यहां की ऐतिहासिक ओल्ड सिटी को इंडस्ट्रियल जोन में बदला जा सकता है. इस पर फिलिस्तीनी कंट्रोल नहीं होग. हालांकि गाजा को नया बनाने में 20 साल लग सकते हैं. फिलिस्तीनी इतिहास और संस्कृति इसमें कितनी बची रहेगी, ये देखने वाली बात होगी.
क्या वहां मस्जिदें दोबारा बनेंगी?
– हां, मस्जिदों का पुनर्निर्माण नई योजनाओं का हिस्सा तो है. अमेरिकी प्लान में 180 मस्जिदें और कल्चरल सेंटर्स शामिल हैं. अरब प्लान में 50 ग्रैंड मस्जिदें और 200 लोकल मस्जिदें. टर्की यहां 3 मस्जिदें बनाना चाहता है. इंडोनेसियन मॉस्क काउंसिल 100 मस्जिदें बनाने की योजना बना रही है. फिलिस्तीनी संगठन जैसे सावेद पेलेस्टाइन मस्जिद रिकंस्ट्रक्शन कैंपेन चला रहे हैं, जिसमें बिजली, पानी जैसी सुविधाएं शामिल हैं. युनेस्को और फिलिस्तीनी अधिकारी ऐतिहासिक साइट्स को बचाने के लिए $133 मिलियन की योजना बना रहे हैं.
हालांकि कहना चाहिए कि गाजा का भविष्य अनिश्चित है, लेकिन पुनर्निर्माण में धार्मिक स्थलों को प्राथमिकता दी जा रही है.
नए निर्माण के बाद गाजा कुछ तरह होगा. उसे एक लग्जरी पर्यटनस्थल की तरह विकसित किया जाएगा.
गाजा के पुनर्निर्माण के लिए पैसा जुटने में देरी और कमी क्यों है?
– संयुक्त राष्ट्र, विश्व बैंक और यूरोपीय संघ की रिपोर्ट्स के अनुसार, गाजा के पुनर्निर्माण की कुल लागत $50-70 बिलियन तक आएगी. कुछ अनुमानों में 100 बिलियन डॉलर तक. इसमें घर, अस्पताल, स्कूल, बिजली-पानी, सड़कें और कचरा हटाना शामिल है.
19 फरवरी को ट्रंप प्रशासन के बोर्ड ऑफ पीस की पहली बैठक में 5-17 बिलियन डॉलर प्रतिबद्धताओं की घोषणा की गई. जिसमें 10 बिलियन डॉलर देगा, अन्य सदस्य देशों से 5-7 बिलियन डॉलर मिलेंगे. कुल जरूरत का ये 10-25% ही है.
खाड़ी के देश बड़े पैमाने पर पैसा देने को लेकर सतर्क क्यों हैं
– बड़े दानकर्ता खासकर गल्फ देश जैसे सऊदी अरब, यूएई, कतर अभी बड़े पैमाने पर पैसा नहीं दे रहे हैं, क्योंकि वे पहले सुरक्षा गारंटी चाहते हैं.अधिकांश दानकर्ता कह रहे हैं कि पैसा तभी आएगा जब हमास पूरी तरह निरस्त्र हो जाए. युद्ध पूरी तरह खत्म हो जाए. ट्रंप का बोर्ड फंड्स को नियंत्रित करना चाहता है, लेकिन कई दानकर्ता देश, जिसमें यूरोपीय देश और कुछ अरब देश शामिल हैं, वो चाहते हैं कि फंड्स संयुक्त राष्ट्र या विश्व बैंक के जरिए जाएं, न कि अमेरिकी नियंत्रित बोर्ड से. यूएन कहता है कि उनके पास फंड्स और क्षमता है, लेकिन इजरायल उनके कामों और इंट्री में रोड़े अटकाता रहा है.
क्या आपको मालूम है कि गाजा पट्टी में इजरायली विध्वंस के बाद कितना मलबा है, वो कब तक हट पाएगा
– इस मामले में काम धीमी गति से चल रहा है. अगर ऐसा ही रहा तो इसमें 7 साल लगेंगे. मलबा बहुत ज्यादा है और ये शायद बहुत बड़ा काम साबित होगा. युद्ध के चलते गाजा में 68 मिलियन टन मलबा जमा हो गया है, जो गीजा के पिरामिडों से 13 गुना ज्यादा है
जिस तरह इजरायल इस इलाके को तबाह किया, उसके बाद क्या वो इसके पुर्ननिर्माण में मदद कर रहा
– इजरायल ने गाजा के पुनर्निर्माण में प्रत्यक्ष रूप से वित्तीय मदद देने की प्रतिबद्धता जताई है, लेकिन यह सीमित और शर्तों पर आधारित है. इजरायल ने फरवरी में बोर्ड ऑफ पीस की पहली मीटिंग में $5 बिलियन (करीब ₹41,500 करोड़) की प्रतिबद्धता जताई. ये फंड मानवीय सहायता, पुनर्निर्माण और स्थिरता के लिए है, लेकिन कुल जरूरत ($70 बिलियन) का सिर्फ एक हिस्सा है. इस बोर्ड में इजरायल पिछले हफ्ते शामिल हुआ.





