मनोरंजन » शूल फिल्म में कुली बने थे राजपाल यादव, पुलिस अफसर बने मनोज बाजपेयी से भिड़ गए और बिहार के जंगलराज का सच दिखा दिया

शूल फिल्म में कुली बने थे राजपाल यादव, पुलिस अफसर बने मनोज बाजपेयी से भिड़ गए और बिहार के जंगलराज का सच दिखा दिया

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पटना. वर्ष 1997 में पटना हाई कोर्ट ने बिहार में ‘जंगलराज’ वाली एक टिप्पणी क्या की, यह तत्कालीन (1990-2005 के बीच का शासनकाल)  लालू-राबड़ी शासनकाल से चिपक गया.  बाद के दौर में इससे जोड़कर कई कहानियां फिल्मी पर्दे पर भी उतरीं. इसी कड़ी में वर्ष1999 में आई फिल्म शूल (Shool) आज भी बिहार की सामाजिक और राजनीतिक पृष्ठभूमि को फिल्म के माध्यम से समझने के लिए याद की जाती है. यह फिल्म अपराध, राजनीति और पुलिस के गठजोड़ को बिना किसी लाग लपेट के सामने रखती है. इसी फिल्म की शुरुआत में एक छोटा सा सीन आता है, जिसमें अभिनेता (Actor Rajpal Yadav) एक रेलवे स्टेशन के कुली की भूमिका में नजर आते हैं. रोल छोटा है, लेकिन उसका असर गहरा है. फिल्म की शुरुआत का यह सीन दर्शक को यह संकेत दे देता है कि यह कहानी सिर्फ एक ईमानदार पुलिस अफसर की नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की है.

फिल्म की पृष्ठभूमि-बिहार और जंगलराज

बता दें कि फिल्म शूल का निर्माण राम गोपाल वर्मा (Ram Gopal Varma) ने किया था और निर्देशन ईश्वर निवास (Eeshwar Nivas) का था. फिल्म की कहानी बिहार की पृष्ठभूमि पर आधारित है, जहां 90 के दशक में अपराध और राजनीति का घालमेल आम बात थी. फिल्म में यह दौर सीधे तौर पर नाम लेकर नहीं कहा जाता, लेकिन हर दृश्य उस अराजकता की याद दिलाता है, जिसे बिहार में आम तौर पर आम पब्लिक के द्वारा जंगलराज कहा गया . फिल्म की कहानी का केंद्र ईमानदार पुलिस अफसर समर प्रताप सिंह है, जिसका किरदार अभिनेता मनोज बाजपेयी (Actor Manoj Bajpayee) ने निभाया. उनका ट्रांसफर बिहार के मोतिहारी (Motihari) में होता है और यहीं से सिस्टम से उनकी सीधी टक्कर शुरू होती है.

स्टेशन का सीन- कुली और अफसर की टक्कर

फिल्म के शुरुआती हिस्से में रेलवे स्टेशन का सीन आता है. समर प्रताप सिंह स्टेशन पर उतरते हैं और सामान उठाने के लिए एक कूल्ही 30 रुपये मांगता है. अफसर इसे ज्यादा मानते हैं और मना कर देते हैं. यहीं से बहस शुरू होती है और देखते ही देखते मामला हाथापाई तक पहुंच जाता है. इस कुली के रोल में राजपाल यादव नजर आते हैं. उनका आक्रामक अंदाज, तेज आवाज और झगड़ालू बॉडी लैंग्वेज बिहार के उस आम आदमी को दिखाती है, जो रोज सिस्टम की मार झेलते झेलते खुद हिंसक हो गया है.

आम बिहारी की मजबूरी और आक्रामकता

शूल में यह कुली दरअसल आम बिहारी का प्रतीक है. वह अपराधी नहीं है, लेकिन हालात उसे अपराध जैसा व्यवहार करने पर मजबूर करते हैं. जब सिस्टम इंसाफ नहीं देता तो गुस्सा सड़क और स्टेशन पर फूटता है. यही वजह है कि राजपाल यादव का यह सीन कुछ मिनट का होने के बावजूद दर्शकों के दिमाग में बैठ जाता है. यह बताता है कि जंगलराज सिर्फ नेताओं और माफियाओं तक सीमित नहीं रहता, बल्कि आम आदमी के व्यवहार को भी बदल देता है.

बिहार का जंगलराज और राजनीति का अपराधीकरण

फिल्म में आगे चलकर बच्चू यादव जैसे किरदार दिखाए जाते हैं जो राजनीति और अपराध के खुले चेहरे हैं. लेकिन राजपाल का कुली यह समझाता है कि इस अपराधीकरण की जड़ें कितनी गहरी हैं. जब राजनीति अपराधियों को संरक्षण देती है और पुलिस कमजोर पड़ जाती है तो आम आदमी भी कानून पर भरोसा खो देता है. यह सीन बताता है कि बिहार में टकराव सिर्फ बड़े अपराधियों और नेताओं तक सीमित नहीं है, बल्कि आम मजदूर भी उसी सिस्टम की उपज है .

फिल्म में कुली का किरदार-आम बिहारी की मजबूरी

फिल्म में राजपाल यादव का यह किरदार किसी एक व्यक्ति की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस आम बिहारी की प्रतीकात्मक तस्वीर है, जो बेरोजगारी, गरीबी और भ्रष्ट व्यवस्था में फंसा हुआ है. छोटी सी बात पर गुस्सा, हिंसा और झगड़ा उसके स्वभाव का हिस्सा बन जाता है. फिल्म यह साफ दिखाती है कि जब कानून कमजोर हो, राजनीति अपराधियों के साथ खड़ी हो और पुलिस पर दबाव हो तो आम आदमी का व्यवहार भी असामान्य हो जाता है. कूली का गुस्सा दरअसल सिस्टम पर जमा हुआ गुस्सा है और इसके निशाने पर सरकार का ही पुलिस अफसर यानी सिस्टम ही है.

राजपाल यादव की जबरदस्त लोकप्रियता

शूल की शूटिंग के दौरान बिहार में राजपाल यादव को जबरदस्त लोकप्रियता मिली. सेट पर बड़ी संख्या में लोग जुट जाते थे और उनके किरदार को पहचानकर आवाज लगाते थे. राजपाल यादव को वहां इतना प्यार मिला कि लोग उन्हें उनके किरदार के नाम से पुकारने लगे. यह बताता है कि उनका अभिनय स्थानीय लोगों से गहराई से जुड़ गया था. बिहार के दर्शकों ने उस कुली में खुद को देखा. फिल्म शूल में राजपाल यादव का कुली वाला रोल भले ही कुछ मिनट का हो, लेकिन वह पूरी फिल्म की थीम को मजबूत करता है.

कुछ मिनट का रोल, पर पूरी कहानी का सार

शूल में राजपाल यादव का कुली वाला रोल छोटा जरूर है, लेकिन वह पूरी फिल्म की थीम को शुरू में ही सामने रख देता है. यह दिखाता है कि बिहार में क्रिमिनलाइजेशन ऑफ पॉलिटिक्स और जंगलराज का असर सिर्फ सत्ता के गलियारों तक सीमित नहीं था. उसका असर स्टेशन के एक कुली तक में दिखता है. यही वजह है कि शूल आज भी याद की जाती है और राजपाल यादव का वह छोटा सा रोल बिहार की सियासत और समाज का एक कड़वा सच बनकर सामने आता है .

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