नई दिल्ली. करीब डेढ़ दशक तक बनती रही उस क्लासिक फिल्म की कहानी अपने आप में किसी दास्तान से कम नहीं. भव्य सेट, नफासत से भरे कॉस्ट्यूम, अदब-ओ-अंदाज और परफेक्शन की जिद ने इसकी रिलीज को सालों तक टाल दिया. मगर जब ये परदे पर उतरी तो दर्शकों ने इसे सिर-आंखों पर बैठा लिया. इसकी असली धड़कन बना लता मंगेशकर की आवाज में रिकॉर्ड हुआ वो गीत, जिसे सुनते ही मोहब्बत, तड़प और इंतजार की पूरी दुनिया जीवित हो उठती है. बला की खूबसूरत हसीना ने परदे पर दर्द को जिस सच्चाई से जिया, उसने किरदार को अमर कर दिया. रिलीज के बाद फिल्म ने टिकट खिड़की पर रिकॉर्डतोड़ कारोबार किया और 1972 की सबसे बड़ी सफल फिल्मों में गिनी गई. वक्त बीतता गया, मगर उस आवाज की खनक और उस अदाकारा की आंखों की नमी आज भी सिनेप्रेमियों के दिलों में ताजा है.
भारतीय सिनेमा की दुनिया में गीत-संगीत हमेशा से भावनाओं, यादों और पीढ़ियों को जोड़ने का माध्यम रहा है. हिंदी फिल्मों की शुरुआत से ही संगीत ने दर्शकों के दिलों को छुआ है. इन्हीं संगीतमय खजानों में से एक है 1972 की फिल्म ‘पाकीजा’ है, जिसमें मीना कुमारी और राज कुमार लीड रोल में हैं. यह फिल्म अपनी अमर गीतों जैसे ‘इन्हीं लोगों ने’, ‘चलते चलते’, ‘ठारे रहियो’, ‘मौसम है आशिकाना’ और ‘तीर-ए-नजर’ के लिए जानी जाती है, जो हिंदी सिनेमा के सर्वश्रेष्ठ एलबमों में शुमार है.
‘चलते-चलते यूं ही कोई मिल गया था’ आज भी है अमर
यह फिल्म न सिर्फ अपनी कहानी बल्कि अपनी संगीत विरासत के कारण भारतीय सिनेमा की एक क्लासिक रचना मानी जाती है. खासकर गीत ‘चलते-चलते यूं ही कोई मिल गया था’. इन गाने को ‘नाईटिंगेल ऑफ इंडिया’ यानी लता मंगेशकर ने अपनी जादुई आवाज से सजाया था. इस गीत को यूट्यूब-देखने वालों के बीच आज भी लोकप्रिय बना रखा है.
जब कमाल अमरोही ने रचा ‘पाकीजा’ का सपना
1956 में कमाल अमरोही ने ‘पाकीजा’ का सपना देखा था. उनकी पत्नी मीना कुमारी इस फिल्म की हीरोइन थीं. यह फिल्म सिर्फ कहानी नहीं, बल्कि प्रेम, शायरी और कला के प्रति श्रद्धांजलि थी. इस फिल्म के लिए सेट्स, लोकेशन और वेशभूषा पर आठ सालों तक काम हुआ. कमाल अमरोही हर फ्रेम में बारीकी चाहते थे मुगलकालीन सौंदर्य, लखनऊ की तहजीब और तवायफ संस्कृति की वास्तविक झलक. इसी परफेक्शन ने निर्माण में सालों जोड़ दिए.
जब फिल्म बन रही थी तो निर्देशक कमाल अमरोही और मीना कुमारी तब पति-पत्नी थे, लेकिन अलगाव के बाद भी उन्होंने फिल्म पूरी की.
15 साल में बनी अमर फिल्म
फिल्म की शूटिंग और निर्माण कार्य लगभग 15 सालों तक चलता रहा, जो कि उस दौर के किसी भी बॉलीवुड प्रोजेक्ट की तुलना में बेहद लंबा समय था. यह देरी कलाकारों के व्यक्तिगत जीवन पर भी असर डालती चली गई. निर्देशक कमाल अमरोही और एक्ट्रेस मीना कुमारी के बीच वैवाहिक तनावों ने भी फिल्म को प्रभावित किया.मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो जब फिल्म बन रही थी, तब तक मीना कुमारी और कमाल अमरोही के रिश्ते में दरार आने लगी थी. निजी मतभेद और अलगाव ने फिल्म के निर्माण को कई बार रोक दिया. उनके बीच भावनात्मक दूरी बढ़ती गई, जिसने ‘पाकीजा’ के लंबे विलंब का कारण बना. फिल्म आखिरकार 1971 में पूरी हो सकी. 1972 में रिलीज़ हुई ‘पाकीजा’, जिसमें मीना कुमारी ने साहिबजान का किरदार निभाया. एक ऐसी तवायफ जो इज्जत और प्यार की तलाश में जी रही है. राज कुमार ने उस व्यक्ति की भूमिका निभाई जो उसे बेपनाह मोहब्बत करता है.
1972 में मेकर्स ने की थी झामफाड़ कमाई
लगभग 1.25–1.5 करोड़ रुपये की लागत से बनी ‘पाकीजा’ ने बॉक्स ऑफिस पर करीब 6 करोड़ रुपये कमाए. यह 1972 की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली हिंदी फिल्म साबित हुई और लगातार 50 हफ्ते सिनेमाघरों में चली. हालांकि, शुरुआती समीक्षाएं मिली-जुली रहीं, लेकिन मीना कुमारी के निधन के बाद फिल्म ने रफ्तार पकड़ी और साल की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म बन गई. इस सफलता के पीछे एक गहरा दर्द छिपा था.
एक दर्दनाक विदाई
मीना कुमारी उस वक्त लिवर सिरोसिस की बीमारी से जूझ रही थीं. स्विट्जरलैंड और लंदन में इलाज के बावजूद वे बच नहीं सकीं. फिल्म के रिलीज़ के तीन हफ्ते बाद, 31 मार्च 1972 को सिर्फ 38 साल की उम्र में उनका निधन हो गया और ‘पाकीजा’ उनकी आखिरी विरासत बनकर रह गई.
लता मंगेशकर की आवाज और दिल छू लेने वाले बोल
‘चलते चलते’ आज भी उतनी ही ताजगी से सुना जाता है. यह गीत न सिर्फ एक फिल्म का हिस्सा है, बल्कि भारतीय संगीत की आत्मा का हिस्सा बन चुका है. आज डिजिटल दौर में यही गीत यूट्यूब पर 2.7 करोड़ (27 मिलियन) से अधिक बार देखा जा चुका है, जो इसकी अमरता का प्रमाण है.





