विदेश » F-35 पर इतराता है अमेरिका, मगर रूस ने 60 साल पहले ही बना दिया था समंदर का सुल्‍तान, पर एक चूक पड़ी भारी – k222 fastest attack nuclear submarine 80 klometer per hour speed nato called papa class 107 meter long 82 personnel capacity

F-35 पर इतराता है अमेरिका, मगर रूस ने 60 साल पहले ही बना दिया था समंदर का सुल्‍तान, पर एक चूक पड़ी भारी – k222 fastest attack nuclear submarine 80 klometer per hour speed nato called papa class 107 meter long 82 personnel capacity

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K-222 Fastest Nuclear Submarine: मॉडर्न एज में वॉर का स्‍वरूप पूरी तरह से बदल चुका है. समंदर से लेकर जमीन और आसमान तक की सुरक्षा को लेकर मुकम्‍मल व्‍यवस्‍था की जा रही है. एयरक्राफ्ट कैरियर, तोप-टैंक, रडार, एयर डिफेंस सिस्‍टम आदि डेवलप किए जा रहे हैं, ताकि दुश्‍मनों को उसकी औकात में रखा जा सके. आज डिफेंस टेक्‍नोलॉजी उस मुकाम पर है, जिसकी कल्‍पना आज से पहले नहीं की जा सकती है. लेकिन, दशकों पहले भी ऐसे वेपन सिस्‍टम डेवलप किए जा चुके थे, जिसकी बराबरी आज तक नहीं की जा सकी है. पूर्व सोवियत संघ यानी USSR (विभाजन के बाद आज का रूस) ने 60 के दशक के अंतिम साल में समंदर का ऐसा सुल्‍तान बना डाला था, जिसके करीब आज तक अमेरिका भी नहीं पहुंच सका है. शीत युद्ध (Cold War) के दौर में जब अमेरिका और सोवियत संघ समुद्रों के नीचे भी एक-दूसरे पर नजर रखे हुए थे, तब सोवियत नेवी ने एक ऐसी पनडुब्बी तैयार की जिसने पानी के भीतर युद्ध की पारंपरिक सीमाओं को तोड़ दिया. इस सबमरीन का नाम था K-222. NATO देशों ने इसे पापा क्लास सबमरीन बताया था. यह आज भी इतिहास की सबसे तेज परमाणु पनडुब्बी के रूप में दर्ज है. 1971 में इसने 44.7 नॉट्स यानी करीब 82.8 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार हासिल की थी, जो आज तक किसी भी ऑपरेशनल सबमरीन द्वारा पार नहीं की जा सकी है.

हालांकि, इस अभूतपूर्व उपलब्धि के पीछे तकनीकी जोखिम, मानवीय चुनौतियां और सुरक्षा खामियां भी छिपी थीं, जिनकी वजह से K-222 का सैन्य करियर अपेक्षाकृत छोटा रहा. यह कहानी केवल एक मशीन की नहीं, बल्कि उस दौर की रणनीतिक सोच, तकनीकी प्रयोग और उनकी सीमाओं की भी है. 1960 के दशक के अंत में दुनिया परमाणु टकराव के खतरे से अभी उबरी ही थी. क्यूबा मिसाइल संकट की यादें ताजा थीं और दोनों महाशक्तियां (यूएसएसआर और अमेरिका) समुद्रों में अपने-अपने विमानवाहक पोत समूहों और पनडुब्बियों के जरिए शक्ति संतुलन बनाए रखने की कोशिश कर रही थीं. सोवियत नौसेना नेतृत्व को चिंता थी कि अमेरिकी एयरक्राफ्ट कैरियर और एस्कॉर्ट जहाजों के खिलाफ उनके पास पर्याप्त तेज और प्रभावी अंडर-सी विकल्प नहीं हैं. इसी संदर्भ में एक ऐसी पनडुब्बी की कल्पना की गई जो दुश्मन के बेड़े तक बहुत तेजी से पहुंच सके, मिसाइल दाग सके और दुश्मन की प्रतिक्रिया से पहले गायब हो जाए. यह विचार उस समय की पारंपरिक सोच से अलग था, जिसमें पनडुब्बियों की सबसे बड़ी ताकत उनकी चुप्पी और अदृश्यता मानी जाती थी. लेकिन सोवियत डिजाइनरों ने इस बार स्टील्थ के बजाय स्पीड को प्राथमिकता दी.

सबमरीन टाइप टॉप स्‍पीड डिजाइन प्रायरिटी
सोवियत K-222 44.7 नॉट्स (82.8 KMPH) एक्‍स्‍ट्रीम स्‍पीड, भारी हथियार
मॉडर्न न्‍यूक्लियर अटैक सबमरीन 25 नॉट्स (46 KMPH) स्‍टील्‍थ और लंबे समय तक ऑपरेशनल
हाई-स्‍पीड अमेरिकी डिजाइन वाली सबमरीन (जैसे सीवोल्‍फ) 35 नॉट्स (64 KPH) स्‍पीड संतुलन और कम आवाज

K-222 न्‍यूक्लियर सबमरीन

अमेरिका आज भले ही बमबर्षक विमान B-52 और 5th जेनरेशन फाइटर जेट F-35 पर इतराता हो, पर पूर्व सोवियत संघ ने आज से तकरीबन 60 साल पहले ही ऐसा सबमरीन बना लिया था, जिसका जोर आज तक कोई नहीं कर सका है. 1969 में कमीशन की गई K-222 कई मायनों में मिसाल है. यह परमाणु रिएक्टर से चलने वाली पनडुब्‍बी थी जो क्रूज मिसाइलों से लैस थी, जिनमें परमाणु वारहेड लगाने की क्षमता भी थी. इसका मकसद केवल टोही या गश्त नहीं, बल्कि जरूरत पड़ने पर वॉरशिप और कोस्‍टल टारगेट पर तेजी से हमला करना था. K-222 को असाधारण गति देने के लिए सोवियत इंजीनियरों ने इसके ढांचे में बड़े पैमाने पर टाइटेनियम का इस्तेमाल किया. टाइटेनियम स्टील से हल्का, मजबूत और समुद्री जंग के प्रति ज्यादा प्रतिरोधी होता है, लेकिन इसे ढालना और वेल्ड करना बेहद मुश्किल और महंगा होता है. उस समय इतनी बड़ी पनडुब्बी में टाइटेनियम का प्रयोग अपने आप में तकनीकी जोखिम था.

K-222 Fastest Nuclear Submarine
K-222 Fastest Nuclear Submarine: क्रूज मिसाइल और न्‍यूक्लियर वेपन से लैस K-222 सबमरीन जितनी स्‍पीड आज तक किसी पनडुब्‍बी की नहीं हो सकी है. (फाइल फोटो/Reuters)

समंदर के अंदर असाधारण रफ्तार

सोवियत इंजीनियरों ने शुरुआत में लगभग 38 नॉट्स की अधिकतम गति का लक्ष्य रखा था, जो पहले ही बेहद महत्वाकांक्षी माना जा रहा था. लेकिन 1971 में सी-ट्रायल (समुद्री परीक्षणों) के दौरान K-222 ने उम्मीदों से कहीं आगे निकलते हुए 44.7 नॉट्स (तकरीबन 83 किलोमीटर प्रति घंटा) की रफ्तार हासिल कर ली. यह गति न केवल उस दौर की अन्य पनडुब्बियों से कहीं ज्यादा थी, बल्कि कई सरफेस वॉरशिप से भी तेज थी. 106.6 मीटर लंबी इस पनडुब्बी में लगभग 82 नौसैनिकों का दल तैनात रहता था. इसके शक्तिशाली रिएक्टर और विशेष रूप से डिजाइन किए गए पतवार (हुल) ने इसे उस गति तक पहुंचाया, जिसे लंबे समय तक असंभव माना जाता रहा था. समुद्र के भीतर तेज गति हासिल करना सड़क या हवा की तुलना में कहीं ज्यादा कठिन होता है. पानी का घनत्व अधिक होने के कारण जैसे-जैसे गति बढ़ती है, प्रतिरोध भी तेजी से बढ़ता जाता है. इसका मतलब यह हुआ कि एक पनडुब्बी को 80 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार पर ले जाने के लिए बेहद शक्तिशाली प्रोपल्‍सन सिस्‍टम (प्रणोदन प्रणाली) और मजबूत ढांचे की जरूरत होती है. आधुनिक न्‍यूक्लियर अटैक सबमरीन आमतौर पर करीब 25 नॉट्स यानी 46 किमी/घंटा की गति से गश्त करती हैं, जो सैन्य मानकों के हिसाब से काफी मानी जाती है. अधिकांश वॉरशिप भी लंबे समय तक 30 नॉट्स से ज्यादा गति पर नहीं चलते हैं, ऐसे में K-222 का 44.7 नॉट्स तक पहुंचना रणनीतिक रूप से चौंकाने वाला था.

एक चूक पड़ी भारी

सोवियत नौसेना के लिए इसका मतलब यह था कि यह पनडुब्बी एयरक्राफ्ट कैरियर और वॉरशिप को तेजी से ट्रैक कर सकती है, विभिन्न थिएटर्स के बीच जल्दी स्थान बदल सकती है और यहां तक कि उस दौर की कई टॉरपीडो से भी तेज निकल सकती है. कागज पर यह एक आदर्श हंटर-किलर प्लेटफॉर्म दिखती थी, लेकिन जो विशेषता K-222 को प्रसिद्ध बनाती थी, वही इसकी सबसे बड़ी कमजोरी भी साबित हुई. तेज गति का मतलब ज्यादा कंपन, ज्यादा दबाव और ज्यादा शोर था. ट्रायल के दौरान पाया गया कि हाई-स्‍पीड पर पतवार और इंटरनल स्‍ट्रक्‍चर पर असाधारण स्‍ट्रेस यानी तनाव पड़ता है, जिससे लॉन्‍ग टर्म ऑपरेशन में तकनीकी जोखिम बढ़ जाते हैं. सबसे बड़ी समस्या आवाज की थी. रिपोर्टों के अनुसार, अधिकतम गति पर K-222 सबमरीन के भीतर शोर का स्तर लगभग 100 डेसिबल तक पहुंच जाता था, जो किसी रॉक कॉन्सर्ट या जैकहैमर के बराबर होता है. लंबे समय तक 80-100 डेसिबल के शोर में रहना मानव सुनने की क्षमता के लिए हानिकारक माना जाता है, जबकि 100 डेसिबल से ऊपर की आवाज खतरनाक हो सकती है. पनडुब्बी के चालक दल के लिए यह केवल असुविधा का सवाल नहीं था, बल्कि उनके स्वास्थ्य और मानसिक सहनशक्ति पर भी असर डालता था. इसके अलावा सैन्य दृष्टि से शोर का मतलब था स्टील्थ का नुकसान. पानी के भीतर किसी भी पनडुब्बी की सबसे बड़ी ताकत उसकी चुप्पी होती है. जैसे ही वह तेज चलती है, उसका ध्वनिक हस्ताक्षर बढ़ जाता है, जिससे दुश्मन के सोनार सिस्टम के लिए उसे पकड़ना आसान हो जाता है.

क्यों नहीं बनी ऐसी और पनडुब्बियां?

स्वाभाविक सवाल उठता है कि अगर K-222 इतनी तेज थी, तो सोवियत संघ या किसी अन्य देश ने इस तरह की और पनडुब्बियां क्यों नहीं बनाईं? इसका जवाब सबमरीन वॉर के मूल सिद्धांतों में छिपा है. शीत युद्ध के अनुभवों से यह स्पष्ट हुआ कि थोड़ी धीमी लेकिन बेहद शांत पनडुब्बी कहीं ज्यादा घातक होती है. आधुनिक नौसेनाएं अपनी अटैक सबमरीन को कम साउंड, बेहतर कंट्रोल और सोनार से बचने वाली डिजाइन पर केंद्रित करती हैं. इन सबका मकसद है दुश्मन को बिना पता चले लंबे समय तक ट्रैक करना और सही मौके पर हमला करना. आज की अधिकांश परमाणु पनडुब्बियां करीब 25 नॉट्स की गति पर आराम से ऑपरेट करती हैं, जो समुद्री गश्त, ट्रैकिंग और निगरानी मिशनों के लिए पर्याप्त है. अमेरिकी नौसेना की USS Seawolf (जिसे 1997 में कमीशन किया गया था) की अधिकतम गति लगभग 35 नॉट्स मानी जाती है, लेकिन उसकी असली ताकत उसकी उन्नत क्वाइटिंग टेक्नोलॉजी है, न कि केवल रफ्तार.

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