इन मेंढकों की चमड़ी में ऐसे ज़हर होते हैं जो किसी भी जानवर की नसों और कोशिकाओं को ठप कर सकते हैं. वैज्ञानिकों ने जब इन मेंढकों को सांपों के आगे रखा, तो यह देखना था कि क्या ये सांप ऐसे खतरनाक शिकार को खा पाएंगे या नहीं.
छह ने भूख से तौबा की, चार ने दिखाई हिम्मत
दस में से छह सांपों ने ज़हरीले मेंढकों को देखते ही खाना छोड़ दिया. लेकिन बाकी चार सांपों ने डर को किनारे रखकर हमला बोल दिया. दिलचस्प बात ये थी कि खाने से पहले उन्होंने मेंढकों को ज़मीन पर रगड़ना शुरू किया. मानो ज़हर को कुछ कम करने की कोशिश कर रहे हों.
वैज्ञानिकों ने बताया कि कुछ पक्षी भी ऐसा ही करते हैं, जहरीले शिकार को खाने से पहले उसे रगड़ते या मसलते हैं ताकि ज़हर उतर जाए. नतीजा ये रहा कि चार में से तीन सांप ज़िंदा बच गए. इसका मतलब साफ था, इन सांपों के शरीर में कोई ऐसी खास क्षमता है जो ज़हर के असर को कमजोर कर देती है.
ज़हर की दुनिया का पुराना खेल
धरती पर करोड़ों सालों से ज़हर का इस्तेमाल एक हथियार की तरह होता आया है. सबसे पहले यह काम माइक्रोब्स (सूक्ष्म जीवों) ने शुरू किया था, दूसरों को मारने या खुद को बचाने के लिए. फिर पौधे और जानवर भी इस खेल में उतर आए.
कुछ जीव जैसे टोड (toad) खुद ज़हर बनाते हैं. कुछ जैसे puffer fish अपने शरीर में ज़हर बनाने वाले बैक्टीरिया रखते हैं. वहीं poison dart frogs अपने खाने से ज़हर इकट्ठा करते हैं, जैसे जहरीले कीड़े या माइट्स खाकर.
लेकिन जब कुछ जीव ज़हरीले बने, तो बाकी ने भी बचने के तरीके खोज निकाले. कुछ ने अपने शरीर में ऐसे प्रोटीन बना लिए जिन पर ज़हर असर नहीं करता. कुछ ने ऐसे एंज़ाइम विकसित किए जो ज़हर को तोड़ देते हैं, जैसे इंसान का लीवर शराब या निकोटीन को तोड़ देता है.
कीड़ों का ज़हर से मुकाबला
जर्मनी की वैज्ञानिक सुज़ान डोब्लर ने मिल्कवीड बग नाम के कीड़े पर शोध किया. यह कीड़ा उन पौधों के बीज खाता है जिनमें जहरीले ग्लाइकोसाइड होते हैं.
डोब्लर ने पाया कि इस कीड़े के शरीर में मौजूद प्रोटीन इस ज़हर से खुद को बचा लेते हैं, लेकिन ऐसा करने से उसकी नर्व (तंत्रिका) की गति थोड़ी धीमी पड़ जाती है. यानी ज़हर से बचाव का फायदा मिला, लेकिन दिमाग़ की रफ्तार पर असर पड़ा. इस दिक्कत से बचने के लिए कीड़े ने नई चाल चली, उसने अपने दिमाग के हिस्से में थोड़ा कम रेसिस्टेंट प्रोटीन रखा, ताकि नर्व सिस्टम दुरुस्त रहे और बाकी शरीर ज़हर से सुरक्षित.
कुछ कीड़ों के शरीर में ABCB ट्रांसपोर्टर नामक प्रोटीन पाए गए हैं, जो ज़हरीले तत्वों को शरीर में घुसने ही नहीं देते. कुछ कीड़ों में तो ये टॉक्सिन पचा कर बाहर निकल जाते हैं, और उनकी पॉटी इतनी जहरीली होती है कि शिकारी चींटियां भी पास नहीं आतीं.
सांपों का लीवर बना ढाल
कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी, बर्कले की वैज्ञानिक रेबेका टारविन और उनकी टीम ने पाया कि रॉयल ग्राउंड स्नेक के लीवर में ऐसे एंज़ाइम मौजूद हैं जो ज़हरीले मेंढक के टॉक्सिन्स को तोड़कर नॉन-टॉक्सिक बना देते हैं. यानी इन सांपों के शरीर में ‘डिटॉक्स सिस्टम’ पहले से मौजूद है.
वैज्ञानिकों को शक है कि सांपों के लीवर में ऐसे प्रोटीन भी होते हैं जो ज़हर के अणुओं से चिपक जाते हैं और उन्हें बेअसर बना देते हैं. इन प्रोटीन को वैज्ञानिक ‘टॉक्सिन स्पंज’ कहते हैं, जो ज़हर को ऐसे सोख लेते हैं जैसे स्पंज पानी सोख लेता है. ऐसे ही प्रोटीन कुछ जहरीले मेंढकों के खून में भी पाए गए हैं, जिससे वे खुद अपने ही ज़हर से नहीं मरते.
गिलहरियों का एंटी-वेनम खून
कैलिफ़ोर्निया की ग्राउंड गिलहरियां भी कम चालाक नहीं हैं. उनके खून में ऐसे प्रोटीन पाए गए हैं जो रैटलस्नेक के ज़हर को बेअसर कर देते हैं. वैज्ञानिकों का मानना है कि जैसे हर इलाके के सांपों के ज़हर का केमिकल फॉर्म अलग होता है, वैसे ही गिलहरियों का खून भी उसी के हिसाब से ‘लोकल एंटीवेनम’ बन चुका है.





